पुनर्मिलन भाग २६
पुनर्मिलन भाग २६
उत्सव तो मन के आनंद को व्यक्त करने का आधार होते हैं। यदि मन प्रसन्न तो हर दिन ही उत्सव का दिन है। यदि मन खिन्न हो तो उत्सव का दिन भी व्यर्थ ही लगता है। कभी उत्सव मन की खिन्नता का दमन करते हैं। तो कभी उत्सव मन के अतिशय आनंद को व्यक्त करते हैं। इन सबके अतिरिक्त बहुत बार उत्सव मात्र प्रदर्शन का आधार होते हैं जो बहुधा शक्ति, प्रेम, ओहदा, रुतबा और वैभव का प्रदर्शन करने का जरिया बन जाते हैं।
द्वारिका में मनाये जा रहे उत्सव के कितने ही कारण थे। मुख्य रूप से तो भौमासुर संहार इस उत्सव का प्रमुख कारण था। परम शक्तिशाली भौमासुर का अंत कर श्री कृष्ण ने सोलह हजार एक सौ राजकुमारियों को उसकी अमानवीय कैद से आजाद किया था। खुद पटरानी देवी सत्यभामा ने श्री कृष्ण से अनुरोध किया कि वह इन निराश्रित राजबालाओं का आश्रय बनें। जिनका विश्व में अब कोई नहीं है, उन्हें अपने जीवन में स्थान दें। सचमुच यह प्रेम की महत्ता ही तो है जबकि देवी सत्यभामा ने अपने जीवनधन श्री कृष्ण को उन निराश्रित बालाओं को सौंप दिया। द्वारिका में श्री कृष्ण उन निराश्रित बालाओं से विधिवत विवाह कर रहे थे।
उत्सव का अगला कारण था देवी सत्यभामा द्वारा आयोजित पारिजात व्रत। दान देने बाला हमेशा बड़ा होता है। फिर जिसने अपने प्रेम का ही दान कर दिया हो, वह खुद को सबसे बड़ा क्यों न माने। वैसे श्री कृष्ण के साथ ने सभी रानियों के मन को कुछ विशाल किया ही था। श्री कृष्ण द्वारा सोलह हजार एक सौ कन्याओं से सामूहिक विवाह का अनुमोदन सभी ने किया था। पर अनुमोदकों की अपेक्षा प्रस्तावक की भूमिका हमेशा बड़ी मानी जाती है। बहुत बार परिस्थितियों से विवश होकर अनुमोदकों को उस बात का समर्थन करना होता है, जिसे उनका मन पूरी तरह स्वीकार ही नहीं करता। फिर उनका समर्थन मात्र दिखावा हो जाता है। विशाल समुदाय में खुद को छिपाना हो जाता है।
सर्वस्व दान के बाद भी उस सर्वस्व की प्राप्ति की आशा मन में रखने का आशय यही है कि दान संभवतः पूरे मन से किया ही नहीं गया। संभव है कि दान की भूमिका भी सर्वस्व प्राप्ति की आशा का ही परिणाम हो।
यदि अपने प्रेम का दान करना, प्रेम की सर्वोच्च अवस्था है तो द्वारिकाधीश की रानियों का द्वारिकाधीश के प्रेम में इतराना कोई गलत तो नहीं। पर गलत था - उनका श्री कृष्ण से सर्वोच्च प्रेम करने बाली श्री राधा और गोपियों के प्रेम से अपरिचित होना। जिससे परिचय के उपरांत मन में प्रेम का अहंकार उसी तरह नष्ट हो जायेगा , जिस तरह सूर्य के उदय होते ही अंधकार नष्ट हो जाता है।
" स्वामी। सुरसरि भागीरथी के समक्ष किसी सरोवर का अहंकार करना तो उचित नहीं। प्रेमावतार देवी श्री राधा के समक्ष किसी का अपने प्रेम के प्रदर्शन द्वारा अहंकार प्रगट करने का क्या अधिकार। दुखद है कि अहंकार के जाल में फंसने बाले आपके अपने हैं। फिर उनके अहंकार का दमन क्यों आवश्यक नहीं है। " अवसर मिलते ही देवी कालिंदी ने द्वारिकाधीश से अनुरोध कर दिया।
" हाॅ देवी। आपका विचार सर्वदा सत्य है। मेरे प्रेम की अधिकारिणी रानियों को प्रेम के यथार्थ रूप से परिचित कराना आवश्यक है। इसमें आपके सहयोग की अपेक्षा है। "
" आपकी आज्ञा शिरोधार्य है स्वामी। वैसे मेरी तो हमेशा से इच्छा रही है कि मेरी बहनें भी एक बार उस प्रेम से परिचित हो जायें जिसका दर्शन मैं नित्य करती हूँ। जिन प्रेम लीलाओं को मैं साक्षात देखती आयीं हूँ, जिन्हें देखने के बाद मेरा आपके प्रति अनुराग उत्तरोत्तर बढ़ता जा रहा है, जिन लीलाओं के चिंतन मात्र से मनुष्य का जीवन धन्य हो जाता है, उन लीलाओं से मेरी बहनों का अपरिचित रहना, यह तो निश्चित ही अनुचित है। "
श्री कृष्ण और माता कालिंदी के मानस में भावी योजना तैयार हो गयी। दोनों के मानस आह्वान से भगवान शिव और देवर्षि नारद भी इस लीला में अपनी भूमिका के लिये तैयार हो गये।
क्रमशः अगले भाग में
