पुनर्मिलन भाग २१
पुनर्मिलन भाग २१
अहंकार जल्द मिटना नहीं जानता। विवेक जरूर एक बार जाग्रत होने लगे पर अहंकार उस विवेक को भी नजरंदाज करने लगता है। कभी कभी अहंकार विवेक पर इस तरह हावी होने लगता है कि लगता ही नहीं कि विवेक का कुछ अस्तित्व भी है। विवेक भी अपनी हार नहीं मानता। बार बार अहंकार को जताता है कि तुझमें कुछ भी सत्यता नहीं, तू खुद एक भ्रम है, तू अज्ञानी है। विवेक के उलाहने सुन फिर अहंकार भी मदमस्त गजराज की तरह विवेक का दमन करने लगता है। पर विवेक का दमन हो ही नहीं सकता। वह तो अमर है। ऐसी स्थिति में अहंकार मन को विवेक के खिलाफ भड़काने लगता है। भले ही कुछ समय के लिये, एक बार तो वह मन को पूरी तरह अपने आधीन कर लेता है।
राधा जी की ज्ञान की बातें सुन एक बार को उद्धव अपनी बुद्धि से बाहर के ज्ञान को जानने को बैचैन हो उठे। पर अहंकार उसके संकल्प पर भारी पड़ा। अनपढ बालाओं से ज्ञान गृहण करना उन्हें अपना अपमान लगा। ठीक है कि इन बालाओं ने ज्ञान की कुछ बातें कहीं से सुन लीं। पर उस ज्ञान को आत्मसात तो कर नहीं पायीं। मोह के बंधन से कब स्वतंत्र हो पायीं हैं। सांसारिक दुखों से दुखी भी हो रहीं हैं।
" देवियों। यह सत्य है कि विभिन्न प्रकृति में, विभिन्न जीवों में, जड़ और चेतन सभी में वही ब्रह्म समाया हुआ है। फिर भी सत्य है कि ईश्वर का कोई रूप नहीं। वह गुणातीत है। जो इस सत्य को जान जाता है, वही मोह के बंधनों से मुक्त होता है।"
" भैय्या । वह निर्गुण और निराकार होकर भी विभिन्न रूपों को रखने में सक्षम है। प्रकृति के विभिन्न रूपों में वही है, विभिन्न जीवों के भीतर वही है, विभिन्न देवों के रूप में भी वही है। फिर वह निर्गुण होकर भी सगुण है। निराकार होकर भी साकार किस तरह नहीं है। सच्ची बात है कि ज्ञानी प्रत्येक जीव के साकार रूप में उस निराकार का दर्शन करते हैं। तभी तो ज्ञानियों के लिये गौ, श्वान, इंद्र और चांडाल सभी एक समान होते हैं। " राधा ने प्रतिउत्तर दिया।
" देवी। जब आपको इतना ज्ञान है, फिर यह शोक कैसा। विरह की वेदना क्यों। ज्ञान तो दुखों का नाश करने बाला होता है। फिर भी यदि दुख दूर नहीं हुए तो इसका तो यही आशय है कि उस ज्ञान में कुछ तो कमी है। बुद्धि चातुर्य से किसी भी बात को सिद्ध करना कब ज्ञान है। ज्ञान तो परिणाम पर निर्भर करता है। यदि समत्व बुद्धि जाग्रत हो, तभी तो ज्ञान है। अन्यथा वह ज्ञान न होकर केवल भ्रम ही तो है। इसलिये मेरी बातों पर गहराई से विचार करें ताकि आपका यह सांसारिक दुख दूर हो। आपको आलोकिक सुख की प्राप्ति हो सके। उसके बाद फिर कभी भी किसी का विरह आपको दुखी नहीं कर पायेगा। "
" भैय्या। विरह में दुखी यहाँ कौन है। हम तो विरह का आनंद मना रहे हैं। जब विरह की वेदना मन को जलाती है, जब प्रतिपल अपने प्रियतम की याद सताती है, जब हर पल प्रिय का ही ध्यान रहता है, जब प्रिय की याद में खुद को भी भूलने की प्रक्रिया होती है, तब उस पीड़ा का भी एक अलग आनंद होता है। भैय्या। क्या आपको मेरी बात झूठ लग रही है। आप तो परम ज्ञानी, आपको तो यही लगता है कि पीड़ा में आनंद नहीं होता। पर सच्ची बात है कि मन का स्नेह ही वह घटक है जो पीड़ा को भी आनंद में बदल देता है। हे परम ज्ञानी। पीड़ा में आनंदित होना सत्य घटना है तथा इसे साक्ष्य द्वारा भी सिद्ध किया जा सकता है। "
" देवी राधा। तथ्यहीन बातों पर विश्वास करने का मन तो नहीं है, फिर भी उस साक्ष्य के विषय में जानना चाहता हूँ जिसमें पीड़ा में भी आनंद की बात सिद्ध हो सके। मेरी जानकारी में तो निर्गुण और निराकार के चिंतन के अतिरिक्त कहीं भी आनंद नहीं। शेष सब मोह है जो दुखी ही करता है। "
क्रमशः अगले भाग में
