STORYMIRROR

Kanchan Pandey

Drama

2  

Kanchan Pandey

Drama

प्रवासी – अपनत्व की खोज

प्रवासी – अपनत्व की खोज

5 mins
530

आज ममता बहुत परेशान थी। बेचारी घर का सारा काम करते करवाते थक गई थी। उसकी परेशानी चेहरे पर झलक रही थी। रामदीन [माली ] ने कहा मालकिन क्या बात है, तबियत तो ठीक है न, कहो तो वैद्ध को बुला लाएं, नहींं कहो तो बाजार के डाक्टर के पास चले चलते हैं।

लखिया बोल पड़ी- हाँ मालकिन सही तो कह रहे हैं रामदीन काका। अब आप की हालत देखी नहीं जा रही है देख लखिया जा अपना काम कर मेरी बीमारी का इलाज न कोई वेदध के पास है न कोई डाक्टर के पास। ममता बुदबुदाते हुए बोली जिसके पास है वह तो... लखिया बीच में रोकते हुए कहा - का बात है गाली तो नाही देत हो। ममता अरे पगली तुम्हीं लोग तो सहारा हो इस बुढ़िया की जा काम कर आज भूखे मारेगी क्या ?

ममता दरवाजे पर जाते हुए दरवाजे पर लगे हुए पेड़- पौधो को ऐसे निहार रही थी मानो अपने पति के लगाए पेड़ –पौधे के माध्यम से अपने पति को कुछ कहना चाहती हो फिर बोल पड़ी किसके लिए लगाए थे देखो इसको सम्भालने वाला तो दूर विदेश में जा बैठा है। न जाने मेरे बाद इसको कौन देखेगा कि खंडहर बन कर रह जाएगा।

उधर रमेश के गए पांच वर्ष बीत गए थे, अपनी पत्नी और दोनों बच्चों के साथ विदेश में नई दुनिया बसा ली थी। भीड़ के बीच चार हीं लोग का संसार था। सीता तो अब बात -बात पर झुंझला जाती थी और बोल पड़ती थी, माँ जी ने कितना कहा था कितने तरीके से समझाया था कि अपने -अपने होते हैं लेकिन जनाब कहाँ सुनने वाले थे। किसी की नहीं सुने चले आए न कोई यहाँ अपना है न हीं अपनत्व की भावना हीं।

यहाँ सुख की खोज में आए थे अपना अस्तित्व हीं खो चुकी हूँ। रमेश जोर से चिल्लाया- चुप करो तुम जले पर नमक मत छिड़को।

सीता को तो जैसे आग लगी थी, बोली- हाँ -हाँ मुझे चुप कराने से मन की पीड़ा समाप्त नहीं हो जाएगी। अपना रमेश से रैम बन गए और मुझे सीता से सी-सी बना दिया और बंद कर दिए इस शीशीनुमा परिवेश में। तभी बाहर से किसी के आने की आवाज सुनकर सभी सम्भल गए। ओ मिस्टर मैक कैसे हैं ? एक आप के कारण तो हमें अकेलापन नहीं लगता है। नो मैंन ऐसी बात नहींं है, आज मेरे बेटे विल्सन का बर्थडे है, सभी आना उसके जाते हीं सीता बोली- मैं नहीं जाऊँगी, तुम चले जाना लेकिन शाम होने पर दोनों बच्चों के साथ पहुँचे, लेकिन वहाँ सभी लाल रंग में डूबे थे।

जैसे सभी पार्टी में एक कोने में बैठे रहते थे, उसी तरह इस पार्टी में भी एक कोना में बैठे –बैठे सीता थक गई और बोली चलो अब, कोई न हीं बात कर रहा है सभी मस्त हैं सीता गुस्से से निकल आई। जिसके कारण सभी ने बहुत तरह की बातें बनाई। रमेश मैक साहब से माफी मांगी और घर पहुंच कर सीता पर बरसने लगे- यह कौन -सा तरीका है बेज्जत कर दी। कितना बुरा लगा मिस्टर मैक को, सीता आज साक्षात् काली रूप ली हुई थी। उसने कहा -क्या बुरा ?

रमेश - चिल्लाओ मत,

सीता बोली नहीं -नहीं अब बोलना छोड़कर यहाँ इशारों में हीं बात शुरू कर दो, अब यही बांकी रहा है। इन लोगों के कारण रहन –सहन बदल दिए यहाँ यह खाते हैं, ऐसे कहते हैं, ऐसे बैठते हैं, ऐसे उठते हैं, इतना कर लेने पर भी पानी में कंकड़ की तरह हैं सभी बह रहे हैं और हम एक हीं जगह सबसे अलग।

बात –बात पर विदेशी होने का ताना अब सहा नहीं जा रहा है माँ ने कितना ...

रमेश- अब चुप करो पीछे की बात मत कुरेदो 

सीता- क्यों न कुरेंदुं जो घाव सूखा हीं नहीं उसको कुरेदने की बात करते हो रो- रो कर आँखें सूज गई थी उन्होंने कितना कहा था मत जाओ विदेश अपने जैसे मिलेंगे अपनत्व नहीं मिलेगा लेकिन तुम्हारे ऊपर तो भूत सवार था राम जाने ,रमेश बोला क्या करता इतने मेहनत से पढ़ा इंजिनियर बना मुझे पढ़ाने में खेत गिरवी रखना पड़ा पिता जी की मेहनत से खेत तो छुट गई लेकिन पिता का साया ना रहा सीता बोल पड़ी ओ इसलिए माँ को अकेले छोड़ आए रमेश बस करो सीता पैसे कमाने की ललक ने मुझे अपनों से इतनी दूर ले आया। सीता बोली जानते हो आज राजू जब उनके बच्चों के साथ खेलने गया तब दौड़ा –दौड़ाकर गेंद उठवाई लेकिन खेलने नहींं दिया

राजू से रैक बना दिए और उनके बच्चे रैट कहते नहीं थकते हैं यह सुनकर उनके माता –पिता भी मजे लेते हैं। मैं अब नहीं रहूंगी यहाँ। उनके जैसे बनने की चेष्टा में मैं कहीं की नहीं रही हूँ। मैं अपने देश जाना चाहती हूँ। अपनों के बीच तभी अचानक फोन की घंटी ने दोनों के बीच की वार्तालाप को रोक दिया। फोन उठाते हीं रमेश अचंभित हो गया। ममता खुश रहो बेटा कैसे हो कई दिनों से बात नहीं हुई थी मन व्याकुल था इस लिए फोन किया।

अभी तो वहाँ रात होगी माफ करना बेटा रमेश का गला भर आया, नहीं माँ प्रणाम,

माँ- मेरा आशीर्वाद तो तुम लोगों के साथ है। तुम रो रहे हो,

रमेश -नहीं माँ,

माँ- तुम सही कहती थी, पढ़ लिखकर अपनों के लिए, अपने देश के लिए करने में जो सुकून है वह पराए देश में नहीं, आज मैं समझ गया माँ।

आ जाओ रमेश,आज भी तुम्हारी माँ, तुम्हारा देश बाँहे फैलाए वहीं खड़ा है जहाँ तुम छोड़ गए थे।

अब ममता की आँखों से खुशी के आंसू छलक गए। उन्होंने फोन रखते हुए लखिया से कहा- मेरा राम आ रहा है। लखिया समझ नहीं पाई, मालकिन यह का कहत हो राम ममता ने कहा हाँ- हाँ राम लखिया फिर पूछी तबियत ठीक है न मालकिन ? रमेश लौटकर सदा -सदा के लिए अपने देश आ रहा है पगली सच्ची मालकिन , हाँ वह दिन आ गया जब रमेश सपरिवार पहुँचा और माँ की चरणों में गिरकर कहा माफ कर दो माँ मैं तुम्हारी बात मान जाता तो आज वह दिन देखना नहीं पड़ता ममता अपने बांहों में भर कर अपने परिवार को बोली बेटा जब जागो तब सवेरा और तुम तो बहुत जल्दी जग गए मेरे लाल। यही मेरे लिए बहुत है।


Rate this content
Log in

Similar hindi story from Drama