परिवार से बड़ी कोई दौलत नहीं
परिवार से बड़ी कोई दौलत नहीं
रिया घर आते ही खुशी से उछलती हुई" मां-पापा कहां हो आप? चलो जल्दी से मुँह मीठा कीजिए और मुझे अपना आशीर्वाद दीजिए। आखिर जिस दिन का मुझे इंतजार था वो आ ही गया।
राजेश जी: बिटिया! हमारा आशीर्वाद तो सदैव तुम्हारे साथ है पर ये तो बताओ हुआ क्या है जो तुम इतने खुश हो रही हो?
रिया: पापा! मेरी प्रमोशन के साथ-साथ कंपनी मुझे दो सालों के लिए विदेश भेज रही हैं। सच इसी दिन का तो इंतजार था मुझे। कितने सपने देख रखे थे मैंने जिन्हें पूरा करने का वक्त आ गया है। बहुत खुश हूं आज मैं पापा। रिया अपनी खुशी में लगातार बोले जा रही थी लेकिन इस दौरान एक बार भी उसकी नजर माँ पापा के उतरे चेहरों पर न गई। बेटी की प्रमोशन की खबर सुनकर एक पल के लिए तो उनके चेहरे भी खिल उठे परन्तु दूसरे ही पल अपनी इकलौती बेटी को विदेश भेजने के ख्याल मात्र से ही मुरझा उठे।
उधर माँ-पापा के मन में क्या चल रहा है इससे बेखबर रिया विदेश के सपने संजोने लगा। इधर राजेश जी व उनकी पत्नी सुषमा जी बिटिया की खुशियों के रास्ते में नहीं आना चाहते थे। शुरू से ही अपनी बेटी की परवरिश बेटों की तरह की। उसे पढ़ा लिखाकर आत्मनिर्भर बनाया। बेटी का हंसता मुस्कुराता चेहरा ही उनकी जिंदगी की सबसे बड़ी उपलब्धि रही लेकिन अब भावनाओं में बहकर उसकी सफलता के आड़े नहीं आना चाहते थे। बस इसीलिए दिल पर पत्थर रख रिया के जाने की तैयारियां करने लगे। कभी कभी माँ की लाल आँखें देखकर रिया ने पूछा भी पर सुषमा जी ने बड़ी सफाई से जवाब दे दिया। कभी पापा का उतरा चेहरा देख पूछती तो वे भी हल्का सा सीने में दर्द है कहकर टाल देते।
तैयारियों में समय का पता न चला और रिया के जाने का दिन आ गया। अपने दिल पर पत्थर रख मां-पापा ने पहली बार अपने कलेजे के टुकड़े को अपने से दूर किया। जब तक रिया आँखों के सामने थी जैसे-तैसे खुद को संभाले रखा लेकिन उसके जाते ही दोनों पति-पत्नी एक दूसरे के गले लग फूट फूट कर रोए। फिर खुद ही एक दूसरे को समझाया बेटी है कल को ससुराल भी तो जायेगी न। हमें खुद को मजबूत बनाना पड़ेगा और फिर यह सब उसके उज्ज्वल भविष्य के लिए ही सब कर रहे है। इधर रिया भी खुशी खुशी विदेश पहुँच तो गई लेकिन अब उसे माँ-पापा से दूर होने का एहसास सताने लगा। काम से लौटने पर मां भूख लगी हैं बस इतना कहने भर के बाद वो माँ का स्नेह, पापा से पूरे दिन की रूटीन पर बात करना जो उसकी आदत में था परन्तु अब ऐसा न हो पाता। लौटते ही उसे अपने लिए खुद खाना बनाना पड़ता। चाहे कितनी भी थकान क्यों न हो अपने सारे काम खुद करने पड़ते। कुछ ही दिनों में उसे माँ-पापा और अपने प्यारे घर की यादें सताने लगी। बात करने के लिए फोन लगाती तो जहां माँ-पापा अपने दिल को समझाते हुए हंसते हुए बात करते वहीं रिया अपनी भावनाओं पर नियंत्रण खो बैठती।
एक दिन ऑफिस से वापिस आई तो उसे बुखार था। बिस्तर से उठने की हिम्मत नहीं हो रही थी। मां-पापा के साथ रहते हुए बिताए पल आने लगे कैसे मां उसे हल्का सा बुखार होने पर पूरा घर सिर पर उठा लेती। कभी दवाई कभी काढ़ा बनाकर देती। थोड़ी थोड़ी देर बाद कुछ न कुछ खाने को देती रहती। वह भी छोटी बच्ची बन मां की गोद में सिर रख सो जाती और मां का प्यार से उसके बालों को सहलाना ऐसा आनंद अब कहाँ। वो पापा का बार बार आकर माथे पर स्पर्श कर बुखार चैक करने पर जो आनंद मिलता शायद दुनिया के किसी आनंद में नहीं। सचमुच आज बहुत याद आ रही थी मां पापा की और फिर एक एक करके पुरानी तस्वीरें उसके सामने घूमने लगी। वो मां की आँखों का बार बार लाल होना, पूछने पर कुछ चला गया कहना, पापा का सीने का दर्द और फिर कुछ उल्टा सीधा खा लिया था कहकर आँखें बचाना। अब उसको अच्छी तरह समझ आ चुका था विदेश की चकाचौंध के बहकावे में आकर जिस खुशी को पाने की चाहत उसे यहां खींच लाई थी वह खुशी तो मात्र एक भ्रम है जबकि असली खुशी हमारे अपनों के बीच बसी हैं। सचमुच परिवार से बड़ी कोई दौलत नहीं और अपनों से दूर कोई जिंदगी नहीं। अब एक पल की भी देरी किए बिना सब कुछ भूल रिया निकल पड़ी अपनों के पास जाने के लिए जहां उसकी असली खुशी छिपी है।
