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Bhunesh Chaurasia

Inspirational

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Bhunesh Chaurasia

Inspirational

प्रेरक प्रसंग

प्रेरक प्रसंग

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मेरा एक मित्र अपने बेटे की पढ़ाई से इतना संतुष्ट था कि प्रसंशा करते नहीं थकता था।मिले हुए कई दिन बीत गए तो मिलने पहुंचा।बातों का सिलसिला चल निकला, अभी चाय पीना शुरू ही किया था कि तभी मित्र का बबुआ आ धमका। "नमस्ते अंकल" औपचारिकता निभाने के क्रम में मैं भी उसे नमस्ते नमस्ते कह कर संबोधित किया।


बातों बातों में पढ़ाई-लिखाई की बात निकल पड़ी कौन सी कक्षा में पढ़ते हो यह पूछना वाजिब नहीं लगा।तारीफ तो मित्र ने पहले ही कर दिया था। मित्र के बेटे से कहा- पाठ्य पुस्तकों में साहित्य तो अवश्य पढ़ते होंगे।मित्र के बेटे ने हामी भरी "जी अंकल।"


मैं ने कहा- "मेरे दिमाग में एक प्रश्न दौड़ लगा रहा है पूछूं उत्तर दोगे।"

मित्र के बेटे ने हामी भरी "जी अंकल।"


मैं ने कहा- "हिन्दी के दो ऐसे प्रसिद्ध साहित्यकारों के नाम बताओ जिनके नाम के आगे 'काका' लगा हो।"


मित्र बीच में बोल पड़ा इतना छोटा सवाल ये तो मेरा बेटा चुटकी में हल कर देगा।मित्र का बबुआ काफी देर तक इधर-उधर नज़र दौड़ाता रहा लेकिन उत्तर न दे सका।मित्र अपने बेटे को लगा अनाप-शनाप बकने।बड़ी मुश्किल से चुप कराया, हालांकि उत्तर मित्र के पास भी नहीं था चूंकि वह अनपढ़ था।


मित्र के बेटे ने बड़ी हिम्मत जुटा कर एक दो साहित्यकारों का नाम लिया लेकिन उनमें काका कहीं नहीं था।तब मैंने उसे कहा- "कोई बात नहीं बेटे मैं बता देता हूॅं‌ याद रखना।जिंदगी में पठन-पाठन के अलावा भी सामान्य ज्ञान बहुत जरूरी है।अब उत्तर सुनो।पहले साहित्यकार का नाम 'काका साहेब कालेलकर' और दूसरे साहित्यकार का नाम 'काका हाथरसी।" इतना सुनते ही मित्र का लड़का जी अंकल मुंह में था पर जुबान पर नहीं आ रहा था।


मैं ने कहा- "कोई बात नहीं बेटे यादाश्त है कभी हमारे पास रहता है कभी किसी और के पास चली जाती है।मन लगाकर पढ़ना। पढ़ाई बहुत काम की चीज है।"

अब मित्र से विदा होने का वक्त हो गया था लेकिन मित्र का चेहरा बहुत उदास था।



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