पंडित विरजू महाराज: जीवनी
पंडित विरजू महाराज: जीवनी
"धा ताके थोंगा,
धागे दिगे ता,
धा धेनता,
धेत् धा किट धा,
ताक् का थोंगा, ताकि तिटका,
तिटकत गदिघन, धा, धा धा,
ताकि तिटका
तिटकत् गदिघन, धाधा, धाधा , धाधा
ताकि तिटका
तिटकत् गदिघन, धाधाधाधाधा ----"
"बेटा, उठ जा। जल्दी से हाथ-मुँह धो ले, बाबूजी रियाज़ के लिए बुला रहे हैं।"
"नहीं अम्माजी, थोड़ी देर और! बोल को सम् पर आ तो जाने दीजिए।"
नींद में भी बोल और तालों का साथ न छोड़ने वाले बालक ने उत्तर दिया।
दोस्तों, हम बात कर रहे हैं, नृत्यप्रेमी एवं शास्त्रीय कत्थक नृत्य के गुरु पंडित बिरजू महाराज जी की, जिनका बचपन से न केवल पूरा ध्यान , बल्कि सपना भी कत्थक था। इनके घर में कत्थक का रियाज सुबह चार बजे से ही प्रारंभ हो जाता था। और घंटों तक चलता रहता था।
कत्थक नृत्य की आज जो तीन घरानाएँ मौजूद हैं-- लखनऊ, जयपुर और बनारस, उनमें से बिरजू महाराज जी लखनऊ घराना के सर्वोज्ज्वल नक्षत्र हैं।
कौन हैं?
इनका असली नाम बृजमोहन मिश्र था। ये भारत के सुप्रसिद्ध कत्थक नर्तक होने के साथ-साथ एक सफल शास्त्रीय गायक भी हैं। वे कत्थक के लखनऊ के कालिका-बिन्दादिन घराने के अग्रणी नर्तक हैं। पंडित जी कत्थक नर्तकों के उस महाराज परिवार के वंशज हैं जिनमें अनेक दिग्गजों ने जन्म लिया हैं और नाम कमाया है जैसे--
ईश्वरी प्रसाद जी, ठाकुर प्रसाद जी, बिन्दादीन महाराज जी, कालिकाप्रसाद जी, अच्छन महाराज जी, शंभू महाराज जी, लच्छू महाराज जी का नाम विशेष आदरपूर्वक लिया जाता रहा है।
इस प्रकार हम पाते हैं कि पंडित बिरजू महाराज ईश्वरी प्रसाद जी के वंशज हैं। ईश्वरी प्रसाद जी सर्वप्रथम कत्थक गुरु थे। वे इलाहाबाद के हांडिया तहसील के मिश्र, जाति के ब्राह्मण थे।
जनश्रुति, है कि एकबार भगवान श्रीकृष्ण स्वयं उनके सपने में आए और उन्हें कत्थक नृत्य को जनता के बीच पुनर्स्थापित करने का आदेश दिया। इसलिए कत्थक में मूलतः श्रीकृष्ण की लीलाओं को दर्शाया जाता हैं। राधा- कृष्ण ही कत्थक के नायक एवं नायिकाएँ हैं। इन्हीं कृष्ण एवं राधा जी के हाव, भाव, हास्य, नटखटपन, लीलाएँ इत्यादि को गत् भाव एवं गत् निकास के माध्यम से व्यक्त किया जाता है।
सपनादेश पाकर ईश्वरीप्रसाद जी ने यह कला अपने बेटे अद्गुजी को सीखाया। अद्गुजी ने फिर अपने बेटे को। और इसी प्रकार परिवार के अंदर ही गुरु- शिष्य की एक नृत्य- परंपरा सी चल पड़ी, जो आज भी बरकरार है। पीढ़ी दर पीढ़ी इन्हीं ईश्वरी प्रसाद जी के वंशज कत्थक के इस शास्त्रीय परंपरा के धरोहर है।
हालांकि बिरजू जी का प्रथम जुड़ाव नृत्य से ही है, परंतु वे एक बहुमुखी प्रतिभा के धनी कलाकार हैं। हिन्दुस्तानी शास्त्रीय गायन पर भी इनकी बहुत अच्छी पकड़ है, एवं वे एक अच्छे शास्त्रीय संगीतज्ञ भी हैं। ठुमरी गायन और तबला वादन में ये विशेष रूप से दक्ष हैं। साथ ही दादरा, भजन और गजल के क्षेत्र में भी अपना सानी नहीं रखते हैं। इसके अलावा वे एक संवेदनशील कवि एवं अच्छे वक्ता भी हैं। इन्होंने कविता लिखने की भी कोशिश की हैं और अनेक बैले कम्पोजीशन का भी निर्माण किया है। कई गीतों के लिरिक्स भी इन्होंने बनाए हैं। इन्होंने कत्थक नृत्य में नृत्य नाटिकाओं को जोड़कर उसे एक नया आयाम देकर उन्हें नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया है।
जन्म एवं आरंभिक जीवन
बिरजू महाराज का जन्म 4 फरवरी, 1938 ई• में कत्थक नृत्य के लिए प्रसिद्ध जगन्नाथ महाराज के घर पर, (लखनऊ में) हुआ था, जिन्हें लखनऊ घराने के अच्छन महाराज कहा जाता था। ये रायगढ़ रजवाड़े में दरबारी नर्तक हुआ करते थे। बिरजू महाराज का नाम पहले दुःखहरण रखा गया था, क्योंकि ये जिस अस्पताल में पैदा हुए थे, उसदिन वहाँ उनके अलावा बाकी सब कन्याओं का ही जन्म हुआ था। जिसके कारण इनका नाम बदलकर बृजमोहन रख दिया गया । बृजमोहन ही आगे चलकर लोगों के बीच प्यारसूचक बिरजू हो गया।इनकी माता जी का नाम अम्माजी महाराज था। ये अपने माता-पिता की इकलौती संतान हैं।
उनकी माँ
जैसा कि उस समय का नियम था,औरतों को परदें में रहना होता था। अतः नृत्य से उनका दूर दूर तक कोई संबंध न होता था। बिरजू जी की अम्मा भी परदे में ही रहती थी। परंतु संगीतमय वातावरण का तो असर पड़ना ही था। अतः संगीत के परिवेश में रहकर, केवल कानों से सुनसुनकर उन्होंने उस जमाने में गाई जानेवाली कई रागे, कई सारी ठुमरी , गजल और गीत सीख लिए थे। फुर्सत में बैठकर बिरजू महाराज उन्हें सुना करते थे। इस प्रकार बिरजू जी को अनेक भूले-बिसरे गीतों के प्रकार और शैली, जो आज विलुप्त हो चुकी है, की शिक्षा अपनी माता जी से मिली थी।
पिता महाराज
बिरजू महाराज जी को नृत्य सीखने की प्रेरणा अपने पिता से मिली थी। घर का वातावरण आरंभ से ही नृत्यमय था। रूढ़िगत परंपरा के अनुसार इन्होंने अपने पिता से गंडा बंधवाया और तब इनका विधिवत् नृत्य का प्रशिक्षण घर पर ही आरंभ हुआ। इनके बचपन में, इनके पिता अच्छन महाराज जी का अधिकांश समय छोटे बिरजू को कत्थक नृत्य के बारे में छोटी मोटी बारीकियाँ सीखाने में बीतता था।
जहाँ भी पिता जी नृत्य प्रदर्शन के लिए जाते, बिरजू को भी वे साथ लेकर जाते थे। परंतु सन् 1947 में एक दुखद् घटना के चलते जब बिरजू केवल नौ वर्ष के थे तभी इनके पिता की असामयिक निधन हो गया।
इनके पिता के मृत्यु के पश्चात् इनकी माँ इन्हें बंबई ले गई। उनदिनों बंबई में इनके दोनो चाचाएँ-- लच्छू महाराज और शंभू महाराज फिल्मों में कोरियोग्राफी का काम करके अच्छा-खासा नाम कमा चुके थे। ये वहीं बंबई में रहकर दोनों चाचाओं से नृत्य - शिक्षा लेने लगे।
सात साल की छोटी सी अवस्था में इन्होंने नृत्य का प्रथम प्रदर्शन देहरादून में दिया था जो जनता को बेहद पसंद आई थी। कहते हैं-- होनहार बिरवान के होत चिकने चिकने पात। इनकी अगाध प्रतिभा की झलक इसी छोटी सी आयु में ही परिलक्षित होने लग गया था।
अपने पिता के साथ-साथ ये कानपुर, इलाहाबाद, गोरखपूर, जौनपूर और दूर-दरांजों जैसे कलकत्ता, मुंबई और मधुबनी भी गए। पिताजी के साथ साथ अपनी छोटी सी उम्र में इनको भी अपनी कला का प्रदर्शन करने का अवसर मिला।
पिता की अकाल मृत्यु के कारण इनको अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा और उदरपूर्ति के लिए अनेक कार्य भी करना पड़ा था। किन्तु इन सब मुसीबतों के होते हुए भी इनमें नृत्यकार बनने की इच्छा बड़ी प्रबल थी। जब कभी वे कोई चलचित्र देखते तो उसी प्रकार नृत्य करने की इच्छा इनके मन में होती थी। उन्होंने मन में यह ठान ली थी कि बड़े होकर वे भी एकदिन इसी प्रकार चलचित्रों के लिए नृत्य का निर्देशन दिया करेंगे।
बंबई में, कुछ वर्षों के अथक परिश्रम के बाद जब वे केवल तेरह वर्ष के थे तो इनको दिल्ली में " संगीत भारती" नामक एक संस्था में बतौर शिक्षक काम करने का मौका मिला। यहीं पर इन्होंने कुमार संभव, फाग लीला, गोवर्धन लीला, मालती-माधव और शाने अवध जैसी नृत्य नाट्य प्रस्तुत किए जो जनता द्वारा काफी सराहे गए।
नृत्य प्रशिक्षक के रूप में
संगीत भारती से इन्होंने अपना कैरियर शुरु किया था। यहाँ के अपने सफल कार्यकाल के समापन के बाद इन्हें प्रसिद्ध भारतीय कला केन्द्र में शिक्षण का कार्य मिला।
कुछ समय बाद संगीत नाटक अकादमी की एक इकाई कत्थक केन्द्र में प्रशिक्षकों के एक ग्रुप में इन्हें शामिल कर लिया गया। कहते हैं कि भारतीय कला केन्द्र का नाम बदलकर ही बाद में कत्थक केन्द्र नाम रख दिया गया था। फिर कत्थक केन्द्र में वे नृत्य का प्रशिक्षण देने लगे। यहाँ पर इन्होंने लंबे समय तक काम किया। यहाँ ये संकाय के अध्यक्ष थे तथा आगे चलकर निदेशक भी रहे।
तत्पश्चात् 1988 में साठ साल के होने के उपरांत वे यहाँ से सेवा निवृत्त हुए।
उनका सपना
स्वयं का एक नृत्य -स्कूल खोलना-- बिरजू महाराज जी का बचपन का सपना था। उनका यह सपना उनके सेवानिवृत्त होने के बाद कलाश्रम के रूप में अस्तित्व में आया। उनके कलाश्रम में शिक्षार्थियों को कत्थक नृत्य के अलावा शास्त्रीय संगीत गायन, चित्रकला, वाद्य यंत्रों का प्रशिक्षण, योगा, संस्कृत नृत्य नाटिका और स्टेज शिल्प पर भी विधिवत प्रशिक्षण दिया जाता है।
महाराज जी का यह मानना है कि एक कुशल नर्तक को नृत्य कला के साथ -साथ संगीत का भी सम्यक ज्ञान होना चाहिए। साथ ही नृत्य के दौरान साँसों पर उचित नियंत्रण पाने के लिए योग का जानना भी जरूरी है। अतएव योगा-प्रशिक्षण से एक नर्तक को खास लाभ हो सकता है। इस हेतु उनके कलाश्रम में इन सबके प्रशिक्षण का भी उचित प्रावधान रखा गया है।
महाराज जी का स्वाभाव बड़ा ही सरल और मृदुल है। ये बहुत ही मिलनसार हैं तथा दूसरों के प्रति दया की भावना रखते है।
महाराज जी बड़े आध्यात्मिक स्वभाव के भी हैं। उन्हें प्रकृति से नृत्य की प्रेरणा मिलती है-- उनके अनुसार पवन के चलने की आवाज में, बादलों के उमड़ने, घुमड़ने में, हवा के झोंकों से वृक्षों की शाखाओं का नर्तन इत्यादि सभी में प्रकृति का नृत्य छुपा हुआ है। वे आध्यात्म के साथ नृत्य का सीधा संबंध मानते हैं। उनका कहना है कि नृत्य के माध्यम से ईश्वर से सीधा संबंध स्थापित किया जा सकता है।
दिल्ली प्रवास
पिछले कई दशकों से महाराज जी दिल्ली में रहते हैं।
परंतु तेरह वर्ष की उम्र में जब वे पहली बार दिल्ली आए थे तो उस समय स्थिति कुछ और ही थी। एक छोटे से बालक के लिए लखनऊ से दिल्ली आकर बसना आसान काम न था। उन दिनों उन्हें बहुत तकलीफों का सामना करना पड़ा था, जिनमें से एक था कि वे रास्ते याद नहीं रख सकते थे, और अकसर भटक जाते थे।
अपने एक इंटरव्यू के दौरान उन्होंने स्वयं बताया है कि वे अकसर दिल्ली के रास्ते में खो जाते थे। इस समस्या से बचने के लिए एकदिन उन्होंने एक तरकीब सोची। काॅनट प्लेस के रिगल सिनेमा को उन्होंने अपना लैंडमार्क बनाया। इसके बाद जब भी उन्हें घर जाना होता अथवा इंस्टिट्यूट, वे पहले रिगल सिनेमा पहुँच जाते । फिर क्या था, वहाँ से वे अपना रास्ता आसानी से ढूंढ निकाल लेते थे!
अपने काफी वर्षों के दिल्लीवास के चलते आजकल वे दिल्ली को काफी हद तक पहचान चुके हैं, अतः उन्हें अब असुविधा नहीं होती। और इसलिए ल्यूटियन दिल्ली में जहाँ उनका घर हैं वे वहाँ बड़े आराम से रहते हैं।
बिरजू महाराज जी की सदा यह कोशिश रही है कि लोग कत्थक को जाने, देखे और सराहे। इसके लिए उन्होंने इस नृत्य शैली का प्रदर्शन न केवल हमारे देश में बल्कि विदेशों में भी विभिन्न कार्यक्रमों और वाॅर्क शाॅपों के जरिए कत्थक की इस शैली का भरपूर प्रचार करके उसे इतना प्रसिद्ध बनाया है कि आज कत्थक नृत्य के लखनऊ घराना का नाम लेते ही सबसे पहले उन्हीं का नाम जेहन में उभरकर आता है। अपने अद्भुत् मुखाभिनय, जिसे भाव कहते हैं और असामान्य फूटवर्क के लिए वे विशेष रूप से जाने जाते हैं।
ये ताल और लयकारी के बड़े पक्के हैं और कमाल के अभिनेय क्षमता का इनमें वह अद्भुत संगम देखने को मिलता है जो उनके दोनों चाचाओं और पिता महाराज के कत्थक - शिक्षा का मिलाजुला प्रतिरूप है। इन्होंने कत्थक जैसे एक मुश्किल शास्त्रीय नृत्य की आसान व्याख्या प्रस्तुत कर उसे जन-जन के लिए साध्य बना दिया है। कत्थक को राजदरबारों से निकालकर, जो कि कभी केवल नाचने वालियों के बीच ही लोकप्रिय हुआ करती थी, उसे जनता के बीच पहुँचाने का श्रेय इन्हीं महाराज जी का है।
फिल्मी कैरियर
बाॅलीउड फिल्म इंडस्ट्री में महाराज जी एक जाने माने फिल्मी हस्ती हैं। उन्होंने कई फिल्मों को अपने नृत्य से नवाजा है। इनका कहना है कि प्रत्येक भारतीय फिल्म को भारत के शास्त्रीय नृत्य का प्रदर्शन जरूर करना चाहिए। हर फिल्म में कम से कम एक गीत ऐसा होना चाहिए जो शास्त्रीय नृत्य पर आधारित हो।
वी शांताराम जैसे दिग्गज निदेशकों ने तो पूरी की पूरी फिल्म ही शास्त्रीय नृत्य पर बनाया है जैसे-- झनक झनक पायल बजे और नवरंग , गीत गाया पत्थरों ने आदि। महाराज जी को लगता है कि हर युग में एक ऐसा निदेशक होना चाहिए जो दस में कम से कम दो फिल्म ऐसी बनाए जो नृत्य को समर्पित हो ताकि लोग उसे देखें तो कहे कि यह होता है एक भारतीय फिल्म!
महाराज जी ने कई फिल्मों में प्लेबैक भी किया है। इस श्रृंखला में सबसे पहले जिस फिल्म का नाम याद आता है वह है 1977 में सुप्रसिद्ध निदेशक सत्यजीत राय द्वारा निर्मित फिल्म " शतरंज के खिलाड़ी"।
शतरंज के खिलाड़ी फिल्म मुंशी प्रेमचंद की उसी नाम से लिखी एक कहानी पर आधारित थी जिसमें नवाब वाजिद अली शाह के ज़माने के लखनऊ का सुंदर वर्णन मिलता है। इस फिल्म में दो नृत्य- श्रृंखलाएँ स्वयं बिरजू महाराज द्वारा बनाई गई थी। इसके साथ ही उन्होंने इस फिल्म को अपनी आवाज भी दी थी। कान्हा मैं तोसे हारी गीत उन्होंने गाया है। और उसमें जो कत्थक का पढ़ंत है, वह भी उन्हीं ने किया है।
स्वर्गीय सत्यजीत राय के बारे में महाराज जी बताते हैं ,
"मेरी फिल्मी यात्रा दादा के वजह से शुरु हुआ था। दादा बहुत ही जानकर थे। मुझे इस फिल्म के दौरान एकाधिक बार उनके साथ काम करने का मौका मिला। एकबार मुझे अपने नृत्य के लिए ऐसा सेट चाहिए था जिनमें नर्तकों के नाखून तक नजर आए। दादा को फिल्मों की बहुत अच्छी समझ थी।"
सन् 2002 में आई संजय लीला भंसाली की फिल्म देवदास में "काहे छेड़ छेड़ मोहे" का कोरियोग्राफी महाराज जी का किया हुआ है। इस गीत में कविता कृष्णमूर्ति जी के साथ महाराज ने गाया भी है और पढ़ंत भी किया है। इसे माधुरी दीक्षित पर फिल्माया गया था। माधुरी जी जानी मानी नृत्यांगना है। महाराज जी स्वयं के शब्दों में,
" माधुरी के साथ काम करने का मेरा अच्छा अनुभव रहा है। उनके पास भाव है, आंखों में भावनाएँ है और मूवमेंट में ग्रेस भी है। "
महाराज जी ने इन दो फिल्मों के अलावा डेढ़ इश्किया, उमराव जान ( 2006) जैसी फिल्मों के लिए भी सफल और सुंदर कोरियोग्राफी की है।
डेढ़ इश्किया का गीत जगावे सारी रैना इन्हीं के बेमिसाल कोरियोग्राफी का सबूत है, जिसे माधूरी जी ने अपनी अदाओं से चार चाँद लगा दिया है। श्रीमती रेखा भारद्वाज ने इस गीत को गाया है। इसमें भी महाराज जी ने पढ़ंत किया है।
इस सिलसिले में विशेष उल्लेखनीय है उनके कोरियोग्राफी में बनी 2017 की संजय लीला भंसाली की फिल्म बाजीराव मस्तानी जिसका गीत मोहे रंग दो लाल । दीपिका पादुकोण पर फिल्माया गया था यह गीत। महाराज जी के पढ़ंत और श्रेया घोषाल की आवाज और दीपिका के नृत्य ने इस गीत में ऐसा समां बांधा था कि वह लोगों के हृदय में उतर गई।
संजय लीला भंसाली के बारे में महाराज जी का कहना है--" भंसाली स्वयं ओडीशी नृत्य में ट्रेनड् हैं। इसलिए वे जानते थे कि कहाँ आंखों का क्लोज ऑप शाँट लेना है और कहाँ हाथों को दर्शाना है। अतः उनके साथ काम करने में कभी कोई दिक्कत न हुई।"
दीपिका पादुकोण महाराज जी के साथ अपने प्रशिक्षण के विषय में कहती हैं कि उन्हें मोहे रंग दो लाल के ट्रेनिंग हेतु महाराज जी के घर दिल्ली जाना पड़ा था।
पहली मुलाकात में उन्होंने महाराज जी को कहा ," माधुरी जी एक टेन्ड डान्सर है, पर मैं उनकी तरह नहीं हूँ।" इस पर महाराज जी ने उनसे कहा, " कोशिश करो"।
और सिर्फ तीन दिन के प्रशिक्षण और कोशिश का नतीजा आप सबके सामने है। ठुमरी मोहे रंग दो लाल का डांस माधुरी जी के काहे छेड़ छेड़ मोहे जितना ही प्रसिद्ध हुआ था।
सन् 2013 में महाराज जी ने दक्षिण भारतीय फिल्मों में भी डेब्यू किया और कमल हसन द्वारा अभिनीत फिल्म विश्वरूपम में उन्नई कनाथू नान गीत पर भी कोरियोग्राफी की हैं।
कमल हसन जी के बारे में महाराज जी कहते हैं ," कमल ने इस नृत्य हेतु बहुत कड़ी मेहनत की थी। ईश्वर की कृपा से सबकुछ ठीकठाक हो गया और मुझे भी एक नेशनल अवार्ड मिल गया।"
परंतु हिन्दी फिल्मों में डांस की स्थिति को लेकर महाराज जी चिंतित हैं। वे स्वयं सच्चे कृष्ण भक्त हैं और नृत्य को किसी ईश्वरीय अराधना से कम नहीं मानते। अतः जब बाॅलिउड का कोई डाइरेक्टर उनके पास आइटम करना है की अर्जी लेकर आते हैं तो उन्हें बड़ा दुःख होता है।
उनका कहना है," मेरा परिवार पिछली आठ पीढ़ियों से इस कत्थक की लीगेसी को वहन कर रहे हैं। और आजकल लोग मेरे पास आकर कहते हैं कि पाँच मिनट का आइटम करना है। अर्थात् आपका पूरा ध्यान उन पाँच मिनटों पर होना चाहिए जिसके अंत में लोग ताली बजाए और सराहे। परंतु एक नर्तक का लक्ष्य केवल इन तालियों और सराहनाएँ की प्राप्ति में नहीं होनी चाहिए। उसे नृत्य के प्रति समर्पित भी होना चाहिए।"
पुरस्कार एवं उपलब्धियाँ
बिरजू महाराज को अपने लंबे कत्थक कैरियर के लिए अनेक पुरस्कारों से नवाजा गया। उन्हें भारत के राष्ट्रपति से 1986 में पद्म विभूषण के पुरस्कार से नवाजा गया।
था। यह देश का दूसरा सर्वोच्च सीविलियन अवार्ड है।
इसी वर्ष अर्थात् 1986 में उन्हें श्रीकृष्ण गण सभा द्वारा नृत्य चूड़ामणि अवार्ड भी उनको मिला। सन् 2002 में उन्हें लता मंगेशकर पुरस्कार दिया गया। सन् 2012 में विश्वरूपम फिल्म के उन्नैय कानाथू की कोरियोग्राफी हेतु नेशनल फिल्म अवार्ड से इन्हें नवाज़ा गया। साथ ही तमिल नाडू सरकार द्वारा प्रदत्त राज्य फिल्म पुरस्कार भी इन्हीं को मिला। 2016 में मोहे रंग दो लाल के लिए उन्हें फिल्म फेयर अवार्ड से भी नवाजा गया। मध्यप्रदेश सरकार द्वारा कालिदास सम्मान भी इनको मिला है।
इन सब पुरस्कारों के अलावा बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय तथा खैरागढ़ विश्वविद्यालय द्वारा उन्हें सामान्निक पी एच डी की उपाधी प्रदान की गई। साथ ही अनेक अन्य अवार्डों की सूची में शामिल है-
संगम कला अवार्ड, भरतमुनी सम्मान, अंध्र-रत्न अवार्ड, नृत्य विलास अवार्ड, आधारशिला शिखर सम्मान, सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार, नेशनल नृत्य शिरोमणि अवार्ड, राजीव गांधी नेशनल सद्भावना पुरस्कार आदि।
महाराज जी का प्रथम सोलो पाॅरफाॅर्मेंस बंगाल में मन्मथ नाथ घोष की स्मृति में आयोजित एक कार्यक्रम में हुआ था। जहाँ उनको काफी पहचान मिली। इसके पश्चात् उन्होंने देश एवं विदेश के विभिन्न स्थानों पर अपना स्टेज शो और परफाॅमेंस दिया है। उनका नृत्य किसी भी संगीत सम्मेलन का अनिवार्य अंग रहा है। अतः कोई भी सम्मेलन उनके पाॅरफर्मेंस के बिना अधूरा हुआ करता था।
अपने कैरियर के शुरुआती दौर में उन्होंने भारत सरकार द्वारा आयोजित विभिन्न सांस्कृतिक दौरों में भाग लिया है। सरकार की ओर से उन्हे अनेक सांस्कृतिक त्यौहारों में भारत का प्रतिनिधित्व करने का अवसर मिला।
इसी दौरान उन्हें विश्व के अनेक देशों में अपनी कला को प्रदर्शित करने का मौका मिला। उन्होंने रशिया, यू एस ए, जापान, यू ए ई, यू के, फ्रांस, जर्मनी, इटली, अस्ट्रीया, चेज्क रिप्बलिक, वर्मा ( आधुनिक मयानमार), श्रीलंका, आदि कई कई देशों का दौरा किया और अपनी कला के प्रदर्शन के साथ- साथ अनेक व्याख्यान भी दिए हैं।
विदेशी उच्चपदाधिकारियो के भारत दौरे के समय उन्हें कई बार राष्ट्रपति भवन से अपने कला प्रदर्शन एवं व्याख्यान हेतु भी आमंत्रण प्राप्त हुआ है।
अगली पीढ़ी
महाराज जी के पाँच संताने हैं जिनमें तीन बेटियाँ हैं, जिनके नाम--कविता, अनिता और ममता, तथा दो बेटे हैं-- जयकिशन और दीपक। इनमें से कविता जी अत्यंत प्रतिभाशाली नर्तक होने के बावजूद भी उन्होंने केवल अपनी सृजनात्मकता के लिए नृत्य सीखा है। कभी उसे आजीविका के रूप में नहीं लिया। अनिता जी चित्रकार और आर्टिस्ट हैं, जबकि ममता जी ने कत्थक सीखकर प्रशिक्षण देने लगी हैं। जयकिशन जी जाने माने नर्तक हैं और सबसे छोटे दीपक महाराज सोलो डांसर हैं।
जब उनसे पूछा गया कि 82 वर्ष के उम्र में भी वह कौन-सी चीज है जो उन्हें चलते रहने की प्रेरणा देती हैं? इस पर उन्होंने कहा कि वह है ईश्वर की कृपा है।
"जो कला है न, वह ताज़ा रखती हैं हमें। देखिए पंडित हरिप्रसाद चौरासिया, स्वर्गीय भीमसेन जोशी जी, पंडित रविशंकर जी, इन लोगों ने अपना संपूर्ण जीवन कला को समर्पित किया है।"
महाराज जी का कहना है कि वे भी अपनी आखिरी श्वास तक काम करते रहेंगे और शास्त्रीय नृत्य के प्रति अपने प्यार को जन जन में फैलाते रहेंगे।
हम उनके और उनकी इस अद्भुत नृत्य शैली की दीर्घायु की कामना करते हैं। ऐसे लोग हमारी माँ भारती के रत्न हैं। उनके लिए हमें खुद भारतीय होने पर गर्व महसूस होता है।
** अभी हाल ही में हुई उनकी मृत्यु से समस्त कला जगत् शोकसंतप्त है। उनकी मृत्यु से कत्थक के जीवंत नटराज के न रहने से हम भारतीय नृत्य शास्त्र की जो अपूरणीय क्षति हुई है-- उसकी भरपाई आनेवाली पीढ़ी द्वारा शायद ही कभी हो पाएगी!
( तथ्य आभार: गूगल, हरिश्चन्द्र श्रीवास्तव द्वारा रचित पुस्तक-- कत्थक नृत्य परिचय।)
