पलटन पांडे जी का जूता
पलटन पांडे जी का जूता
हमारे देश की व्यवस्था पर एक नजर डाली जाए तो गुस्सा आता है पर कभी कभी हँसी भी आती है। जिनमें से एक है स्वच्छता व्यवस्था, कहीं सड़के टूटी हुई तो कहीं गटर के खुले ढ़क्कन है, लाइन तोड़ती पब्लिक, मेलों में भीड़-भड़क्का, सड़क पर फैली गंदगी, छज्जे पर टपकते कपड़े सुखा देना, ताकि आने जाने वालों पर पानी गिरा कर होली का आनंद ले सके, लोगों द्वारा छत से ही पोलिथीन में भरकर कचरा फेंक देना, कई बार तो सर पर ही गिर जाता है कचरा, चलते चलते सड़क पर थूक देना, घर की सफाई कर कुड़ा सड़क के बीचो बीच लगा देना, अगर पड़ोसन के घर के बगल में करेगे तो पड़ोसन युद्ध का बीगुल बजाती आएगी और दहाड़ेगी, मेरे घर के आगे कुड़ा किसने डाला। हा हा हा। चरमराती अर्थव्यवस्था, इन सबके साथ जीना तो हम हिंदुस्तानियों की नियती है पर क्या करे जब पैदा हिन्दुस्तान में हुए हैं तो दुख उठाने अब अमेरिका थोड़े न जाएगे। चाहे कितने ही दुखी हो जाए हम पर प्रशासन तो चैन की नींद ही सोएगी जी। दुख से याद आया....
ऐसे ही हमारे देश के एक भद्र पुरुष है दुखीराम, नाम है पलटन पांडे। काम दूसरों के काम में टांग अड़ाना। बनते काम बिगाड़ना और चाल, चाल तो बस पूछो मत मासा-अल्लाह है। देखते किधर है चलते किधर है, पलटन जी पर तो बहुत पुरानी कहावत एकदम जचँती है। ”फुहड़ चले नो गढ़ हले।” हा हा हा हा। जिस गली से वो गुजरते हँसी के फव्वारे छुट जाते वहाँ। एकदम जोकर...हाँ उनको जोकर कह सकते है।
एक दिन बाजार जाते समय ठोकर लगी उनको।
ठोकर खाने से वे गिर ग, और उनके जूते का तल्ला उतर गया। पास ही गटर का ढक्कन खुला पड़ा था। वो जूता उनके पाँव से निकल कर कलाबाजियाँ खाता हुआ गटर में गिर गया। अब समस्या थी कि जूता कैसे निकाला जाए। अगर न निकाल सके तो घर आज नंगे पाँव ही जाना पड़ेगा। समस्या विकट थी, रात निकट थी, क्या करे पलटन जी, उनका दिमाग चकरा रहा था, तभी पास में एक लकड़ी की फट्टी पड़ी दिखाई दी। बस फिर क्या था, झट उठाई और चल दिये जूता गटर से निकालने ऐसे जैसे एक राजा दूसरे देश पर चढ़ाई करने जा रहा हो। शुक्र था वो जूता गटर में डुबा नहीं था। तैर रहा था लेकिन वो जूता उल्टा पड़ा था पानी में। अब उलटे जूते में वो फट्टी कैसे घुसेगी जिससे जूता फँसा कर बाहर लाया जाए। फिर एक समस्या और, चलो किसी तरह जूते को सीधा कर लिया गया, अब समस्या यह थी कि कहीं बीच में ही न गिर जाए जूता बाहर लाते हुए। अब जब समस्या थी वहाँ तो जाहिर सी बात है, आस-पास भी बच्चे बुढ़े खड़े होगे और अपनी अपनी तरकीबें लड़ा रहे होगे। कोई कुछ कह रहा था, कोई कुछ। जैसे ही लकड़ी की फट्टी को ऊपर लाया गया वैसे ही एक बच्चा चिल्लाया, आ गया. आ गया जूता बाहर आ गया, पलटन जी का ध्यान हटा और जूता फिर गटर में, हा हा हा हाके ठहाके गुंजने लगे।
बार बार यही क्रिया दोहराई जा रही थी, आखिरकार सफलता हाथ लग ही गई। जूता बाहर आ गया। अब फिर समस्या उत्पन हो गई, पुछिए क्या... तो सुनिये जूता पुरी तरह से भींग चुका था गटर का कचरा जूते से चिपका हुआ था। इतनी गंदगी भरा जूता देखने के बाद उसे साफ कर पहनने को भी मन न करें। आखिर में यही फैसला हुआ कि जूते को वापस गटर में ही फेंक दिया जाए। इतनी मेहनत मशक्कत के बाद भी नंगे पाँव ही जाना पड़ा पलटन जी को।
तो ऐसे हैं हमारे पलटन पांडे जी !
