पिता की सीख
पिता की सीख
"पिता जी बहुत बीमार है:-जल्दी आ जाओ"। भाई के मुँह से ये बात सुन रो-रो के मेरा बुरा हाल हो गया। मैं घर में सबसे छोटी जो थी। मेरा बहुत खयाल रखा उन्होंने, किसी चीज़ की कमी नहीं होने दी।
मेरी उम्र जब 20 वर्ष की हुई तो पिता जी ने मुझे बहुत से शहर दिखाए। सिर्फ इसलिए कि शादी के बाद बेटी पता नहीं घूमने जा सके या नहीं??
पर ..…"अपने घर में खुश रहो...हम कब तक हैं। ये शब्द सुन मैं उकता गयी थी।
ससुराल की किसी भी समस्या में कभी तरफदारी नहीं की मेरी....इस बात से मैं पापा से कुछ सालों से बहुत नाराज़ थी। ज्यादा बात भी नही करती थी। ये सब सोचते- सोचते हम अस्पताल पहुँचे। जाते ही पिता जी ने मुस्कुरा कर आशीर्वाद दिया और एक पत्र मेरे हाथ मे दे दिया। कुछ देर बाद सदा के लिए उन्होंने आँखे मूँद ली। "हाथ में रखे पत्र में... मेरी अस्पष्ट आँखों को कुछ स्पष्ट पढ़ने को मिला"।
"बेटी तुमसे बहुत प्यार करता हूँ न...इसीलिए तेरा कभी साथ नहीं दिया"। तेरे ससुराल में 20 साल पहले जो लड़ाई हुई थी। मेरे तेरा साथ देने से ज्यादा बढ़ जाती और आज जो तुम अपने बच्चों के साथ खुशहाल जीवन बिता रही हो कभी ना बिता पाती।
समय सदा एक सा नहीं रहता। वक़्त के हिसाब से इंसान की सोच भी बदलती है। बीता वक़्त तब हाथ नहीं आता जब समझ आती है। मेरे नीम से भी कड़वे शब्द तेरे जीवन में मिठास भरने के लिए थे। सिर्फ मेरा घर बसा रहे। कितनी पीड़ा उठाई होगी उन्होंने। स्नेह का समन्दर तो था उनके अन्दर लेकिन छलकाया नहीं। कितना गलत समझ लिया मैने अपने पिता को जो मेरी खुशहाल ज़िंदगी का सितारा थे। "मेरा सारा गुस्सा काफ़ूर हो गया और पत्र को स्नेह से माथे लगाती हुई बोली। "पिता जी सिर्फ एक बार आँखें खोल कर अपनी नादान बिटिया को माफ़ कर दीजिए।"
