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सीमा शर्मा पाठक

Inspirational


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सीमा शर्मा पाठक

Inspirational


पहचान- अपने अस्तित्व की

पहचान- अपने अस्तित्व की

4 mins 367 4 mins 367


निधि जैसे ही कमरे के बाहर तक पहुंची अन्दर से आवाज आ रही थी "औरतों को पढा़ लिखा दिया जाये तो उनका दिमाग खराब हो जाता है ।हर बात का विरोध करने लगती हैं ।अपनी चलाने लगती हैं । पुरूषों की बराबरी करने लगती हैं और अधिकार मांगने लगती हैं।"

।बहुत अजीब लगा निधि को अपने जमाने में अध्यापक रह चुके व्यक्ति के मुख से ये सब बात सुनकर ।दरअसल निधि के दादा जी और उनके दोस्त आपस में बात कर रहे थे ।चाय लेकर पहुंची निधि दरवाजे पर खडी़ उनकी बातें सुनने लगी ।वो कह रहे थे -

"पहले का जमाना ठीक था महिलायें घर के काम काज करती थी ।साडी़ पहनती थी ।अपने से बडो़ से जबान नहीं लडा़ती थी ,हमारा हर रीति रिवाज दिल से निभाती थी और सबका सम्मान करती थी ।कितनी शालीनता थी, कितनी संस्कारी हुआ करती थी वो हमारे जमाने की महिलायें ।"

अब निधि से नहीं रहा गया और वह बोल गई -" सही तो कह रहे हैं दादा जी दिमाग खराब हो गये हैं हम लड़कियों के पढ़ लिखकर, हम भूल गये कि ईश्वर ने हमें बनाकर हमारे लिए मापदंडो को तय करने की जिम्मेदारी आप पुरूषों को ही तो दी है ।हमें क्या पहनना चाहिए, कितना बोलना चाहिए, किससे दोस्ती करनी चाहिए यहां तक कि कब कब सांसे लेनी चाहिए ये सब आप लोगों को ही तय करना है ।हम भूल जाते हैं हम आपकी तरह इन्सान थोड़े ही है हम तो कठपुतलियां होती हैं जैसा आप नचायेगें वैसा ही नाचना चाहिए हमें ।चाहे इसके लिए हम घुट घुटकर क्यों न मर जाये ।आप हमारे सर्वेसर्वा है आप लोगों का अधिकार बनता है हमारे लिए नियम बनाने का ।"

दादा जी और दादा जी के मित्र दोनों खामोश थे और निधि के चेहरे पर आक्रोश झलक रहा था ।वह फिर बोली -

"आपके जमाने की औरतें खुश नहीं थी दादा जी वो मजबूर थी ।गलत सामाजिक प्रथाओं और रीतियों के नाम पर कुचल दिया जाता था उनका हर अरमान ।लेकिन आज की नारी शिक्षित है और यह समझती है ईश्वर ने और संविधान ने महिला और पुरूष को बराबरी का अधिकार दिया है और अपने इस अधिकार को प्राप्त करना उन्हें आ गया है ।वो समझ चुकी है कि उनका भी अपना स्वयं का अस्तित्व है ।किसी की मां, बहन, बेटी,पत्नी और किसी भी रिश्ते से पहले वह एक नारी है जिसके बिना जीवन व्यर्थ है ।जो पुरूष समाज आज तक ये सोचता आया कि उसके बिना नारी का कोई अस्तित्व नहीं है उसी पुरूष समाज को यह समझाने लगी है कि नारी के बिना भी पुरूष का कोई अस्तित्व नहीं है ।स्त्री और पुरूष दोनों ही एक दूसरे के पूरक हैं और दोनों में से किसी एक के बिना भी दुनिया की कल्पना नहीं की जा सकती ।आज की नारी को अपने पंखों की पहचान हो गई है वह जान चुकी है कि वह केवल और केवल रसोई और बच्चे पैदा करने के लिए नहीं बनी, ऊंची उडा़न भरने के लिए बनी है, अपने सपने पूरे करने के लिए बनी है और खुलकर हंसने मुस्कराने के लिए बनी है ।पढ़ लिखकर औरतों का दिमाग खराब नहीं होता बल्कि उनके दिमाग पर पडा़ गलत परम्पराओं और नीतियों का पर्दा हट जाता है और दुनिया को समान भाव से देखने की शक्ति प्राप्त होती है ।दादा जी आप भूल रहे हैं आप और हम उसी देश में रहते हैं जहां नारियों को देवी की तरह पूजा जाता था ।नारियों को देवी का स्थान दिया जाता था ।आज भी होता है नवदुर्गा के नौ दिन लेकिन महज दिखावे के लिए ।"

निधि बोले जा रही थी उसके चेहरे पर एक तेज था और उसके दादा जी के मित्र ये कहते हुये वहां से निकल लिये - " शर्मा तुने अपनी पोती को ज्यादा पढा़ लिखा दिया है इसलिए इसका भी दिमाग खराब हो गया है ।"

शर्मा जी मुस्करा रहे थे क्योंकि अपनी निधि में वे नारी शक्ति के दर्शन कर पा रहे थे जो अपने अधिकारों के लिए अब वास्तव में विरोध करने लगी है और उसका ये विरोध शत प्रतिशत सही है और आने वाले समय में एक सशक्त नारी और सशक्त समाज के लिए एक सीढी़ है ।



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