shaifali khaitan

Tragedy


4.3  

shaifali khaitan

Tragedy


पारिवारिक एकता

पारिवारिक एकता

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दीपक आज अपने बच्चपन के दिन याद कर रहा था, जब उसका परिवार बहुत बड़ा हुआ करता था । बच्चपन में वो अपने सभी चचेरे भाई-बहनों के साथ रहा करता था । सभी भाई-बहन एक साथ खाना खाते, एक साथ खेलते, एक साथ पढ़ाई करते सब में बहुत प्यार था । दीपक के पिताजी, उसके ताउजी, चाचा सभी का व्यापार भी एक साथ था । घर में खाना भी एकसाथ बनता था । सभी में बहुत प्यार था । सभी हर एक दुसरे का साथ देते थे । परिवार में खुशियां तो मानो वही अपना घर बसा के बैठी हो ।

किन्तु, वक्त को बदलते हुए समय नहीं लगता । पता नहीं ये कब किसके साथ क्या कर बैठे ? ना जाने परिवार की खुशियों को किसकी नजर लगी धीरे-धीरे छोटी-छोटी कलह बढ़ने लगी, परिवार टूट कर बिखरने लग गया ।

फिर एक दिन सब तरह से विभाजन करके सब कुछ अलग कर दिया गया । सब में आपस में बैरबढ़ गया । अब सब अलग-अलग रहने लग गए थे । किसी को किसी से कोई मतलब नहीं था सब अपने आप में मस्त हो गए थे । न कोई किसी का खुशियों में साथ दे रहा है, न कोई किसी का गम में । अब सब अपने आप में अकेले पड़ चुके हैं ।

अब व्यापार भी कुछ खास नहीं रहा है,सब बिखर चुका है । दिन प्रतिदिन खर्चें बढ़ते ही जा रहे हैं । बच्चे भी बड़े हो गए हैं, तो बच्चों की पढाई का भी खर्चा बढ़ गया है । जितना कमा रहे हैं, बस उससे अपना परिवार पाल रहे हैं ।



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