राजनारायण बोहरे

Inspirational


4.5  

राजनारायण बोहरे

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पानी वाले सरपंच - विलास राव

पानी वाले सरपंच - विलास राव

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 उस इलाके में हरियाली का नामोनिशान न था। दूर दूर तक कोई पेड़ नहीं बचे थे। जहां तक नजरें फेंको वहां तक काले काले पहाड़ खड़े दीखते थे। धूल भरी हवा चल रही थी। कुंये तालाब सूख गये थे। परिन्दे, खेती में मदद करने वाले जानवर और खुद आदमी पानी की तलाश में कुछ भी करने को तैयार था। पानी नही मिलने से किसी भी खेत में किसी तरह का कोई पौधा नही दिखता था।

महाराष्ट्र के पुणे तालुके के इस इलाके में दर्जन भर गांव अकाल की चपेट में थे। आसपास के दूसरे तालुकों में भी लोग भूखों मर रहे थे। पीने तक को पानी न था। सप्ताह भर में जब नहाने को पानी मिलता तो खटिया पर बैठ कर नहाते और खाट के नीचे बड़ा सा तसला रख लेते जिससे नहाने वाले के बदन से बहता हुआ पानी नीचे तसला में इकट्ठा हो जाता। ऐसे पानी का फिर फिर उपयोग किया जाता। जिस गांव वाले को जो काम मिलता, वही करने लगता। पहाड़ पर पत्थर तोड़ने जैसा तन तोड़ देने वाला काम मिला तो मजबूरी में सब लोग वही करने लगेे थे, छोटे बड़े, आदमी औरत सब वही कर रहे थे। पसीने में डूबे और कानों को फोड़ देने वाली आवाज गूंज रही थी। तभी सहसा एक दिन पहाड़ पर विलास राव सालुंके चले आये। उन्होने वहां के लोगों के इतने खराब हाल देखे तो दुखी हो गये और गांव वालों की मदद के लिये पूरी ताकत से खड़े हो गये। उसी दिन से इलाके के दिन बदलना शुरू हो गये। विलास राव सालुंके एक बहुत बड़े उद्योग के मालिक थे लेकिन अकाल के हालात देख कर उनके मन में किसानों की मदद करने की बात ऐसी बैठी कि सब छोड़ छाड़ के वे पानी को तरसते लोगों को हरा भरा करने में जुट गये और उसी का परिणाम है कि आज यह इलाका महाराष्ट्र राज्य के पहाड़ी इलाकों में सबसे हरा भरा और सुखी इलाका है।

यह बात सन 1972 के मार्च महीने के तीसरे सप्ताह की है। महाराष्ट्र के शहर पुणे से केवल चौतीस किलोमीटर दूर सासवड़-नेजरी के पहाड़ो के बीच का इलाका पानी की बूंद बूंद को मोहताज था। इस बरस पानी की एक बूंद भी नही बरसी थी सो कहीं पानी नही था। कोई खेती नही थी। लोगों के पास पेट भरने के लिए रोजी-रोजी का कोई जरिया नही बचा था। इलाके के विधायक ने अकाल से परेशान लोगों की सहायता के लिए जिलाधिकारी से बात की। अपने यहां के कागज पत्तर देख कर जिलाधिकारी ने बताया कि सरकार किसी को भूख से नही मरने देगी। जब जब अकाल पड़ता है सरकार मदद के काम शुरू कराती है, इस साल भी काम खोलने की योजना है। विधायक ने यह संदेश जनता का सुनाया। जिलाधिकारी ने अपने मातहतों को हुक्म दिया और अप्रेल महीने की पहली तारीख से काम आरंभ हो गया। अकाल पीड़ित किसानों की मदद के वास्ते सरकार ने हमेशा की तरह पहाड़ में से पत्थर तोड़ कर उसकी गिट्टी बनाने का काम खोल दिया। काम की निगरानी को सरकारी कर्मचारियों को बैठा दिया गया।

वास्तव हुआ यह था कि महाराष्ट्र में रोज रोज अखबारों में अकाल की खबरें छपतीं तो शहर में रहने वाले लोगों को उत्सुकता होती कि ये अकाल क्या होता है, जिसकी वजह से सब लोग बेहाल हो जाते हैं और सरकारी कर्मचारी उन्हें मदद देने के वास्ते खूब खूब भाग दौड़ करते हैं।ऐसे ही एक उत्साही व्यक्ति थे विलासराव सालुंके। उनके पास बारीक नाप तौल करने वाले औजार बनाने की एक खूब बड़ी कंपनी थी। कंपनी का नाम था एक्यूरेट इंजीनियरिंग कंपनी। सालुंके जी पुणे में व्यापार करते थे और उनका इतना बड़ा कारोबार था कि वे मुम्बई,दिल्ली से लेकर अमेरिका के न्यूयार्क और जापान के टोकियो तक जाकर अपने माल की खरीद बिक्री करते रहते थे। खूब बड़ा महल जैसा मकान, खूब सारी कारें और ढेर सारे नौकर चाकर थे। वे एक दिन सासवड़-नेजरी के इलाके में कौतूहल वश अकाल देखने को पहुंचे तो पाया कि चारों ओर अकाल की छाया पसरी है। आसपास दिखते आदमियों का बदन सूख कर कांटा हो गया है, मानो हड्डियों का ढांचा हो। इन ढांचों की आँखें एक अजीब सी उदासी से हर अनजान आदमी की तरफ गहराई से देखती थी। ऐसे कमजोर बदन के साथ आस पास के हजारों किसान पहाड़ पर चढ़ते और जिस हथौड़ी से पत्थर तोड़ रहे हैं, उसकी गूंज पूरे इलाके में सुनाई दे रही है। पत्थर की किरचें उछल कर कभी उनके बदन में हल्की चोट और घाव पैदा करती थी तो कभी पत्थर की धूल उनकी आंख में गिर रही थी। पत्थर तोड़ रहे लोगों से पूछा तो उन्होंने बताया कि दिन भर के काम की मजूदरी सरकार की तरफ से मिलती थी तीन रूपये। तीन रूपये लेकर शाम को किसान अपने गांव पहुंचता और उसी का दाल-चावल-आटा खरीद कर अपना पेट भरता।

सालुंके बड़े दुखी मन से वापस लौटे और सीधे तालुके के जिलाधिकारी से मिले। उन्होंने जिलाधिकारी को बताया कि सासबड़ के आसपास के हजारों किसान अकाल की वजह से दाना पानी के लिए परेशान हैं। ऐसे में सरकार की तरफ से उनसे पत्थर तोड़ने का काम कराया जा रहा है। किसीकी आंख में पत्थर की धूल भर रही है तो कोई पत्थर की किरचों से घायल हो चुका है। धूल उड़कर मुंह में जाने से खांसी और दूसरी बहुत सारी बीमारियां पैदा हो रही है। पत्थर तोड़ना बंद हो जाना चाहिये।

सरकारी अफसरों ने बताया कि इस इलाके में चाहे जब अकाल पड़ता रहता है , सरकार मदद करती है। इस मदद के रूप में किसी को घर बैठे नही खिलाया जाता बल्कि सबसे आसान काम पत्थर तोड़ने का काम खोल दिया जाता है। जिलाधिकारी ने सालुंके से पूछा कि इसकी जगह दूसरा काम क्या हो सकता है, आप बताइये, जिसमें इतने लोगों को एक साथ लगा दिया जाये। सालुंके को तो पता ही नही था कि जनता को जब किसी काम में लगाना हो तो क्या कराया जाये। उनके खुद के कारखाने में इतना काम न था कि हजारों लोगों को भरती कर लिया जाये। वे चुपचाप उठे और अपने घर चले आये।

रात भर विलासराव सालुंके सो नही पाये। निराश और बीमार लोगों की परेशानी याद कर उन्हे अपने मखमली बिस्तर पर नींद नही आई। उनका मन नही माना तो वे सुबह तैयार हो कर फिर से उसी जगह जा पहुंचे जहां हजारों लोग एक साथ ठकाठक की आवाज के साथ पत्थर तोड़ रहे थे। उन्हे देख कर कुछ लोग काम छोड़कर उनके पास चले आये। काम करा रहे सरकारी कर्मचारी ने टोका तो सालुंके ने कर्मचारी से प्रार्थना कर कुछ देर तक उन लोगों से बात करने की मोहलत मांग ली।

‘आपके इलाके में इतने अच्छे खेत हैं तो इनमें अन्न क्यों नही पैदा करते हो’ सालुंके ने सबसे एक साथ पूछा।

‘खेती के लिए पानी की जरूरत होती है। हमारे पास बिलकुल पानी नही है। ’ लगभग पचास साल के एक किसान ने सालुके के सवाल का जवाब दिया।

‘ देश के दूसरे किसान कहां से पानी लाते हैं ?’ सालुंके ने जानना चाहा।

‘ दूसरे किसानों के अपने अपने तरीके हैं। खेतों की फसल की सिंचाई करने में बहुत सारा पानी लगता है, जिसके लिये या तो आसमान से बरसात होनी चाहिये या फिर किसी तालाब से पानी लेकर सिंचाई की जावे। अगर हर खेत में पानी से भरा एक एक कुंआ हो तो भी खेतों की फसल सींची जा सकती है। हमारे इलाके में न कोई तालाब है न कोई पानी वाले कुएँ, इसलिये जब भी बरसात नही होती हम सब ऐसे ही दाने दाने को मोहताज हो जाते है।’ रोने जैसी आवाज़ में किसान ने सालुंके को बताया।

‘ बरसात हो जायेगी तो तुम लोगों की फसल ठीक हो जायेगी और सारे संकट खत्म हो जायेगे क्या ?’ सालुंके ने फिर पूछा।

‘ हम लोग पहाड़ी इलाके में है इसलिये जितना पानी बरसता है वह सब बहकर सीधा मैदानी इलाके में चला जाता है इसलिये जिस साल बरसात होती है हमारे पास पीने के लिए कुंओं में पानी तो आ जाता है लेकिन खेती के लिए उतना ही पानी मिल पाता है जितना खेत की जमीन रोक पाती है। इससे थोड़ी बहुत फसल हो पाती है।‘ एक दूसरे किसान ने बताया।ं

विलास राव ने छात्र जीवन में इंजीनियरिंग की पढ़ाई की थी , उस समझदार किसान से बात चीत में वे समझ गये कि सारी विपत्तियों की जड़ है पानी की कमी। उन्हे पता था कि पानी वहीं बरसता है जहां घना जंगल होता है। इस पूरे इलाके में कोई पेड़ नहीं बचा इसलिए ठीक से बरसात नही होती। जितना पानी बरसता है वह सब बहके मैदान में चला जाता है। इसलिये इन लोगों की हालत सुधारने के लिए अब दो ही रास्ते बचते हैं। पहला यह कि इन लोगों को इस इलाके से कहीं दूर बसा दिया जाये। दूसरा यह कि जब भी बरसात हो पानी को रोकने के लिए कोई बंदोवस्त किया जाये। पहला रास्ता बड़ा कठिन है क्योंकि यहां के लोग किसी भी हालत में यहां से कहीं दूसरी जगह जाने को तैयार नही होंगे। इसलिये अब दूसरा ही रास्ता शेष बचता है वो है पानी को रोकना।

इस बार जब सालुंके घर लौटे तो उनके मन में आशा की एक किरण उग रही थी। अगले दिन से सालुंके का एक ही काम था, वे सरकारी सिंचाई विभाग के इंजीनियरों से मिलते और सासवड़ इलाके में बरसात का पानी रोकने के तरीके पूछते। एक बार फिर निराश हो गये वे। क्योंकि किसी भी इंजीनियर को बरसात के पानी को रोकने की तरकीब के बारे में कुछ भी जानकारी न थी। बहते पानी पर बांध बनाने , सड़क बनाने या पुल और इमारतंे बनाने का काम ही इंजीनियरों के पढ़ाया गया था जिससे आगे की कोई जानकारी न इंजीनियरों को थी, न ही किसी सरकारी अफसर को।

सालुंके बार बार उन पहाड़ियों और घाटियों में जाने लगे। आसपास के ताल्लुकों में भी वे बिना कारण यात्राये करने लगे। पहाड़ीयों और टीलों से घिरे हर इलाके मे यही समस्या थी कि बरसात का पानी जब जमीन पर गिरता तो जितना जमीन में समा पाता केवल उतना भीतर चला जाता, बाकी का पानी बहता हुआ पहाड़ों से घाटियों में होता हुआ मैदान की तरफ बह निकलता।

सासवड़ के इलाके में छोटे छोटे कुछ सूख् नाले दिखे और पूछने पर पता लगा कि बरसात में इन्ही नालों से हो कर पानी बहता है। बस फिर ष्क्या था। जिलाधिकारी से मिल कर सालुंके ने उन नालों को रोक कर छोटे छोटे बांध बना कर पानी रोकने की योजना बनवाने का निवेदन किया तो जिलाधिकारी को भी बात जम गयी।इंजीनियरों को भी लगा कि एक बड़ा उद्योगपति जब बिना किसी स्वार्थ के परोपकार की योजना बता रहा था सरकारी काम करने में हमारा क्या नुकसान है। इंजीनियर भी पूरे उत्साह से जुट गये और देखते ही देखते सासवड़ इलाके में बहने वाले पांच नालों पर पत्थर और मिट्टी डाल कर छोटे छोटे बांध बनाने की योजनायें बन गयी। ऐसे बांधों को चेक डेम कहते हैं। इनमें जो सामान लगता है वह आसपास के खेतों से ही उठा लिया जाता है। सालुंके ने सुझाव दिया कि जब सरकार को अकाल पीड़ित किसानों को तीन रूप्ये रोज की मजदूरी पर काम देना ही है, तो क्यों नही इन चेक डेम के निर्माण में लगा दिया जाये।

महाराष्ट्र की राजधानी से जल्दी ही ऐसे बिना लागत के केवल मजदूरी के खर्चे के डेम की मंजूरी मिलते ही पत्थर तोड़ने वालों को पहाड़ से हटा कर डेम के काम पर लगा दिया गया। धीरे धीरे डेम का आकार उीारने लगा। काम दिखा तो नेताओं की रूचि बढ़ी। बहुत सारे व्यापारी भी मदद के लिए तैयार हो गये। उधर सालुंके को चैन नही था उन्हे काले रंग के खाली से दिखते पहाड़ और खेतों की चिन्ता खाये जा रही थी। वे जंगल बढ़ाने के लिए वन विभग के अधिकारियो से मिले और उनके बार बार मिलने के कारण वन विभाग ने पहाड़ों और खेतों के आसपास वृक्षारोपण की योजना बनाना शुरू की। जगह जगह पेड़ों के लिए गड्ढे खोद दिये गये। पौधाशालाओं को पौधे तैयार रखने का आदेश दिया गया। जून का महीना आते आते सब लोग तैयार हो चुके थे। उस साल कुदरत ने बड़ी दया की और इलाके में मानसून आ गया यानि पिछले साल की तरह सूखा नही रहा।

मानसून की पहली बरसात होते ही इलाके के हजारों लोगों को साथ लेकर वन विभाग ने पहले से खोदे हुए गड्डों में पौधे रोपना चालू कर दिया। पूरे पहाड़ में यहां वहां के कोनों से लेकर सड़कों के दोनों ओर तथा खेतों से लेकर गांव की गलियां तक पौधे रोप डाले गये।

बरसात के दो महीने में इस बार पानी जितना भी बरसा, वो पेड़ों और नालों की वजह से रूका रह गया। पानी का संग्रह देख देख लोगों की खुशी छलकने लगती थी। जिनके पास बैल बचे थे वे उनकी देखभाल करने लगे जिनके पास नही थे वे कर्ज लेकर नये बैल ले आये,। तो किसी ने उधार बैल मांगे और अपने खेत जोत डाले। समय पर उनमे बीज बोये गये। खेतों में जब नन्हे पौधे उगे तो किसानों की खुशी का पारावार न था। समय पर फसल पकी और किसान लोग जब फसल काट कर घर लाये तो घर घर खुशीयां मनाई जाने लगी।

 सालुंके समय समय पर गांवों मे चक्कर लगाते थे और किसानों को खुश देख कर बहुत संतोष प्राप्त करते थे। लेकिन अब वे एक और फर्क देख रहे थे कि हर किसान नयी नयी मांगे ले,कर उनके पास खड़ा था। किसी को सरकारी सहायता से कुंआ चहियेतो किसी को मकान बनाने के लिए सरकारी पैसा। सरपंच को तो गांव के कामों के लिए सरकारी बजट चहिये होता था हर बार। विलास राव गांव वालों को समझाते कि सारे कामों के लिए सरकार की तरफ क्यों नजर गाड़ते हो आपसी सहायता से अपने काम क्यों नही करते। मकान बनाना है तो पत्थर मिट्टी की सहायता से खुद खड़ा कर लो। घर के लोग मिल के कुंआ खोद लो। आसपास से पत्थर इकट्ठा करो और रास्ते पर विछा कर ऊपर से मिट्टी डाल दो। सड़क तैयार।

सालुके ने यह भी समझाया कि जो तालाब सरकार ने बनवाये उनसे सिंचाई के लिए आश्रित मत रहो। हर आदमी अपने खेत में छोटी छोटी दीवारें बना ले जिससे अगली बार बरसात हर खेत में तालाब बन जाये और सरकारी तालाबों का पानी ढोर मवेशी और गांव वाले के काम के लिये बच जाये। ये सब बातें गांव वालों को अपने काम की नही लगती थी सो लोग एक कान से सुनते थे और दूसरे से उड़ा देते थे।

अपना व्यापार और धंधा छोड़ बैठे विलासराव सालुंके के लिए अभी चैन नही था। उन्होंने समझ लिया था कि जिंदगी के लिए सबसे जरूरी है पानी। हमारे देश में तीन महीने बरसात होती है सो जो भी जितना पानी रोक सके उतना ही सुखी होगा। किसान के लिए तो पानी जीवन का आधार है। चार साल तक वे बरसात के पानी को रोकने की नई नई तरकीब सोचते रहे, काम करते रहे।

तब सन 1976 की बात है जब कि मार्च के महीने में विलासराव सालुंके सासवड़ के इलाके से दूर पुरंधर तालुके की बलदगांव तहसील से तीस किलोमीटर दूर नाइगाँव आ पहुंचे थे। वहां के एक जमीन मालिक किसान से उन्होने टेकरी की सोलह हेक्टेयर जमीन किराये पर ले ली थी। इस बार सालुंके की पत्नी और बच्चे भी साथ थे। पूरी जमीन देखने के बाद सालुंके ने अपनी योजना के मुताबिक काम शुरू कर दिया। उन्होने मजदूरों की सहायता से पहाड़ी की ऊपर से नीचे को आती जमीन के बीच बीच में कम गहरे गड्डे खुदवाना आरंभ कर दिया। उन गड्डों के आस पास की मिट्टी हटाते हुए इस पहाड़ी की टेड़ी खड़ी जमीन को वे बड़ी बड़ी सीड़ियों में बदलने लगे। पहाड़ी की चढ़ाई जहां से आरंभ होती थी वहां पर मिटटी और पत्थर की सहायता से एक छोटा सा चैक डेम बनवाने के बाद विलासरावस सालुंके बरसात का इंतजार करने लगे। आसपास के किसान बड़े कौतूहल से सालुंके की हरकतें देख रहे थे। उन्हे लग रहा था कि सालुंके अपना समय बरबाद कर रहे हैं।

बरसात का पानी झमाझम करके बरसने लगा तो विलासराव सालुंके का मन भी मोर की तरह नाच उठा। पहाड़ी पर गिरता बरसात का पानी पहले एक बड़े नाले की तरह नीचे की ओर आता था वह अब बहुत धीमे धीमे सीड़ी सीड़ी से होकर नीचे आ रहा था। नीचे आते आते उसकी मात्रा और रफतार बहुत कम हो जाती थी।

समय आने पर सालुंके ने अपने सीड़ीदार खेतों में बीज बोया। जब सिंचाई की जरूरत पड़ी तो नीचे के चेक डेम में पम्प रख के पानी का पाईप पहाड़ी केमाथे तक फैला दिया और वहां से झरने की तरह पानी छोड़ दिया। बरसात की तरह एक एक खेत का भिगोता पानी सीड़ी सीड़ी होता नीचे आने लगा। जिस जमीन मे एक हेकटेयर में पचास किलोग्राम अनाज होता था वहां सालुंके ने पांच सौ किलोग्राम प्रति हेक्टेयर अनाज उगा कर दिखाया। जिसने भी सुना वो दौड़ा दौड़ा आया।

गांव वालों ने अलग अलग उपमा दी। कोई उन्हे पानी वाले जादूगर कहता तो कोई पानी वाले सरपंच। गावों के लोग उनके पास समूह बना कर आते और सलाह मांगते कि सब लोग कैसेपानी रोकें ओर आपस में उसका बंटवारा कैसे करें। सालुंके ने गांवों में पानी पंचायत बनाने की सलाह दी और देखते ही देखते हर गांव में पानी पंचायतों का गठन होने लगा। पानी पंचायत बिना किसी भाव के सबको पानी का बंटवारा करती थी। हर व्यक्ति को आधा एकड़ खेत सींचने लायक मुफत पानी मिलता था चाहे उसके पास खेत हो या न हो। बिना खेत वाला व्यक्ति अपने हिस्से के पानी का बेच भी सकता था। सालुंके का इस इलाके पर बड़ा अहसान है क्योंकि पानी की बूंद बूंद को तरसते लोगों को वे पानी से धनवान यानि पानीदार बना गये। पूरे इलाके में आपसी प्रेम और भाईचारे की भावना ऐसी फैली कि कभी किसी से कोई झगड़ा ही नही होता था। थाने में पुलिस हाथ पर हाथ धरे बैठी रहती थी और अदालतों में मुकदमों का अकाल सा हो गया था।

सालुंके ने अपने कोट-पैण्ट त्याग दिये और खादी के कपड़े पहनने लगे। वे पुणे का अपना महल सा मकान छोड़ कर नाइगांव में ही रहने लगे। जिस दिन उनका देहांत हुआ आसपास के हजारों किसान आपने पानी वाले सरपंच को आखिरी सलाम देने को उमड़ पड़े थे। इलाके को सूखे व अकाल से सदा के लिए मुक्ति दिलाने वाले विलास राव सालुंके को इलाके के लोग आज भी बड़ी श्रद्धा से याद करते है।


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