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राजनारायण बोहरे

Drama Children Stories


4.5  

राजनारायण बोहरे

Drama Children Stories


’’ राजा की आंखें खुली ’’

’’ राजा की आंखें खुली ’’

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                             किसी देश में कोई एक राजा राज्य करता था, उसका एक प्यारा सा लड़का था-युवराज वीरसेन। राजा ने सोचा कि मेरे बाद इसे ही राजकाज संभालना है सो उसे परदेश के बड़े-बड़े विद्यालयों में पढ़ने केाा भेजा गया। वीरसेन बड़ा चतुर कुमार था। वहाँ गुरूकुल में सब लोग अमीर-गरीब एक साथ रह कर पढ़ते थे, यह कुमार को बड़ा अच्छा लगता था लेकिन एक बार अकस्मात राजा ने गुरूकुल पहुंचकर अपने कुमार को छोटे लोगों के बच्चों के साथ खेलते देखा तो क्रोधित हो गयाा और कुमार को दूसरे विद्यालय में पढ़ने को भेजा। जहां कि केवल राजाओं के बच्चे पढ़ते थे। कुमार विवश होकर चला गया।

                             समय के साथ राजकुमार बड़ा होने लगा और एशोआराम में पलने के कारण वह सारी दुनिया को सुखी और धनी समझने लगा। उसे तो यही अच्छा लगता कि दिन भर खाने पीने को अच्छी-अच्छी बस्तुयें हों और बतियानें को ढेर सारे मित्र हों जो उसकी हां में हां मिलायें।

                             अभी कुमार की पढ़ाई चल ही रही थी कि अकस्मात राजा के सेनापति ने विद्रोह कर दिया और राजा मार डाला गया। राजा के वफादार सैनिकों ने सेनापति के खिलाफ लड़ाई शुरू कर दी और सेनापति को मार कर विद्रोह असफल कर दिया गया। कुमार को बुलावा आया और वह अपनी पढाई छोड़कर अपने राज्य वापस आ गया, गद्दी पर बैठकर उसे राजकाल संभालना पड़ा। उसे राज करने का अनुभव और ज्ञान तो था नहीं अतः वह पूरी तरह मंत्रियों पर आश्रित हो गया।

                             धीरे-धीरे उसने अपने उन सारे साथियों को राज में बुला लिया जो कभी उसके साथ गुरूकुल में पढ़ा करते थे-राजाओं वाले गुरूकुल में।

                             अब राजा के आसपास ऐसे लोगों की भीड़ जुट गई जो कि उसे न तो सच्चे समाचारों और वास्तविकता से अवगत करावें, राजा वीरसैन की झूठ-मूठ तारीफ भी किया करते । राजा यहीं समझता कि सारी प्रजा उसकी तरह धनी और खुशहाल है।

                             खजांची ने बताया कि राजा के चाकरों की संख्या ज्यादा होने से खजाना खाली हो चला है तो राजा नेे नये कर लगा दिये, लेकिन एक बुजुर्ग मंत्री ने टोका कि गरीब जना पर कर लगाना गलत है, तो राजा ने नाराज होकर उस मंत्री को दरबार से निकाल दिया। दूसरे मंत्री ने बताया कि आपके आसपास गलत आदमी इक्ट्ठा हो गये हैं तो उसको भी राजा ने बर्खास्त कर दिया, अब तो सब पुराने मंत्री भी चुप हो गये।

                             जनता में हा-हाकार मच गया, भूखे लोगों ने चोरी-हत्या और डाका डालने शुरू कर दिये। लेकिन राजा को सच्ची बातों के समाचार फिर भी न लग पाये, उसी बरस जम कर अकाल पड़ा और अन्न का अकाल हो गया। प्रजाप सड़कों पर निकल आई और राजा की बुराई करने लगी। अत्याचार होने लगे।

                             एक रात की बात है, राजा अपने विमान में बैठकर राज्य में घूमने निकला था और लौट रहा था कि उसका विमान खराब हो गया और उसे मजबूरी में नीचे उतरना पड़ा। विमान में उसके अलावा केवल एक सेवक था, राजा ने सेवक को विमान सुधारने का आदेश दिया और खुद पैदल पांव टहलने लगा। पास मे ही कहीं दियाबत्ती जलती दिखाई दे रही थी, राजा उधर ही बढ़ गया क्योंकि उसके पेट में भूख के मारे चूहे दौड़ रहे थे।

                             जब वह पास मंे पहुँचा तो देखा कि एक टूटी सी झोपड़ी मेें वह प्रकाश आ रहा है। वह भीतर झांकने लगा तो चौंक गया। एक बूढ़ा व्यक्ति भीतर बैठा हांफ रहा था, वह इतना दुबला था कि बस हड्डियां ही हड्डियां बची थीं। राजा ने हिम्मत कर और अपना मुकुट उतार कर बाहर ही रख दिया, राजसी कोट उतारा और भीतर प्रविष्ट हुआ।

              ''नमस्कार''

              ''नमस्कार भाई, पधारो'' बूढ़ा बोला।

              ''बाबा, मैं एक राहगीर हूँ, रास्ता भटक गया हूँ, कुछ खाने को मिलेगा। राजा जान बूझ कर झूठ बोला।

              ''भाई, क्या बताऊं,'' कहकर बूढ़ा रोने लगा।

              ''अरे, बाबा....क्यों रोते हो'' राजा ने उसे चुप कराया।

              -बूढ़ा बोला-''भाई, हमारे राज में इस साल अकाल पड़ा है। उधर राजा और उसके कर्मचारी अत्याचारी हैं, लगातार कर बढ़ रहे हैं, गरीब जनता पिस रही है। चोर डाकुओं की संख्या बढ़ रही है। हमारे सारे गांव में तीन दिन से चूल्हा नहीं जला, मैं खुद भूखा हूँ, आपको क्या खिलाऊ।''

              राजा चौंक गया, ''यह क्या'' । उसने तो महल मे मेवा-मिष्ठान ही खाये थे, सादा रोटी-साग तो कभी चखे भी न थे, और इस घर में तो रोटी के भी लाले हैं। ये बूढ़ा तो राजा को अत्याचारी कह रहा है, उसने तो कोई अत्याचार नहीं किया।'' उसने पूंछा-''बाबा, हमने सुना है कि राजा बहुत अच्छा है, वह तो कभी अत्याचार नहीं करता।''

                             ''यह तो हमने भी सुना है कि राजा बहुत अच्छा है ''बूढ़ा बोला'' लेकिन उसके आसपास रहने वाले चाकर उसे राज की सही स्थिति ही नहीं बताते। राजा उनकी बातों में आकर कर बढ़ाता जा रहा है, वह जनता के बीच आकर न तो कभी समस्या और दुख मजबूरी सुनता है और न ही कभी पुराने मंत्रियों की बातें मानता है। कर्मचारी यह बात जानते हैं इसलिये खूब अत्याचार करते हैं और मज़े उड़ाते हैं। हमारे सारे गाँव में अकाल पड़ा है और यहाँ तैनात किये गये राज कर्मचारियों के घरों में रंगरेलियां मन रही हैं। किससे क्या कहें।''

                             राजा ने सोचा कि इस बूढ़े व्यक्ति की बातों की सच्चाई जान ही लें। वह लौटा और अपने सेवक को आज्ञा दी कि वह अपेन राजसी कपड़े उतार कर सादा कपड़ों में यहाँ की सेना की चौकी पर जाये और देखकर आये कि वहाँ क्या हो रहा है।

                             सेवक चल दिया तो राजा ने भी कुछ सोचा और पीछे लग गया।

                             सेवक जब चौकी के पास पहुँचा तो देखा कि चौकी पर सारे सेना नायक बैठे हैं और बाकायदा नाच-गाने की महफिल जुड़ी है। मेवा-मिष्ठान खाते हुये वे चीख-चिल्ला भी रहे थे। चौकी के पीछे महंगा खाना पक रहा था, जिसकी खुशबू सारे माहौल में फैलती जा रही थी। सेवक थोड़ा आगे बढ़ा, और नाच देखने लगा कि एक सैनिक की निगाह उस पर पड़ गयी। सैथ्नक आगे बढ़ा और उसको पकड़ लिया। ''क्यों वे, तेरी इतनी जुर्रत कैसे हुई कि यहां का नाच गाना देखें। हमारे खाने की खुशबू कैसे ली तूने-ओ भुक्खड़।''

                             सेवक चीखता रहा लेकिन दो चार सैनिकों ने और आकर उसकी तलाशी ले डाली तथा उसके पास बिल्कुल भी धन न पाकर उसकी धुनाई करने लगे। एक सैनिक ने तो अपनी तलवार ही खींच ली, उसने अपनी तलवार उठाई ही थी कि पीछे आ रहे राजा ने झपटकर उसकी तलवार का वार अपनी तलवार पर झेल लिया।

                             अब सैनिक चौंके और सनाका खा गये।

                             राजा अपनी पूरी पोशाक में वहाँ मौजूद था और एक दम गरज उठा था।

-''बंद करो ये नाच-गाना। जल्दी से अपनी हाजिरी दो और बताओ कि यह क्या हो रहा है।'

                             दूसरे सैनिकों और नायकों ने जब ये सुना तो घबरा उठे और जल्दी से तैयार हो कर कतारबद्ध आकर खड़े हो गये।

                             राजा ने तत्काल सबको बर्खास्त कर दिया और जेल में डाल दिया। वहां बन रहा सारा खाना उस गांव में बंटवा दिया ।

                             राजा की आंखें खुल गई और प्रजा के आनंद के दिन आये। क्योंकि राजा ने खुद भूख का दुख देख लिया था।



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