राजनारायण बोहरे

Comedy Thriller Children


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राजनारायण बोहरे

Comedy Thriller Children


लोक कथा लटूरी दद्दा का भूत

लोक कथा लटूरी दद्दा का भूत

17 mins 244 17 mins 244

बहुत पुरानी बात है, एक गांव में एक सीधा साधा वे पड़ा और अत्यंत बहुला व्यक्ति लटूरी कक्का रहता था। लटूरी दद्दा का परिवार भी उसी के जैसा सीधा साधा था। परिवार में दो ही प्राणी एक लटूरा एक लटूरी दद्दा और दूसरी लटूरी की पत्नी कुसुम भाभी। सरकार ने लटूरी को थोड़ी जमीन दे दी थी जिस पर वह खेती किया। जिस पर उसने कभी खेती नहीं कि एक साझीदार को वह खेती करने को दे देता था और खुद मजदूरी करके अपना पेट पालता था। साल के साल खेत में से जो अनाज आ जाता, वह अपने आड़े वक्त के लिए घर में रख लेता था और घोर गर्मियों में भरी बरसात में जब कई कई दिन में घर से नहीं निकलता था तो ऐसे में जमीन की फसल का गला उसके घर में भोजन बनाने के काम में और उसकी गुजर बसर के काम में आता था।

 एक बरस लटूरी जनता ने खुद खेती करने का सोचा। बैल मांगे। सारी खेती की। उसने बड़ी मेहनत से उड़द बोया। भाटा जमीन थी। उड़द की फसल खूब हुई।  फसल बहुत अच्छी हुई। काटकर खलिहान में लाए और बैल मांग कर ही लटूरी दद्दा ने फसल को बैलों के पांव के खुर के नीचे से कुचलबाय। उड़द के पौधे बहुत छोटे-छोटे टुकड़ों में बट गए और उनकी फलियों से दाने निकल कर उसी भूसे में मिल गए।  मंदी मंदी हवा चल रही थी तो लटूरी दद्दा ने कुसुम भाभी को बुलाया। लकड़ी की बनी तिपाई पर डलिया लेकर उसने दान किए हुए ढेर गिराना शुरू किया। उपाय को हवा के हिसाब से जमा कर ढेर में से थोड़ा-थोड़ा जमीन पर गिराया जाता है तो वजनदार होने के कारण दाने नीचे गिर जाते हैं ,भूसे दूर जाकर उड़ता है। दिन भर की मेहनत के बाद उड़द की फसल तैयार थी। राज रास के रूप में निकला हुआ उड़द बहुत चमक रहा था, जिसे देख देख कर कुसुम भाभी और लटूरी दद्दा बहुत खुश थे

 खलिहान में दान मांगने वाले बहुत आते थे पड़ोस के गांव का एक पंडित जब उनके खेत में आया तो कुसुम भाभी ने अचानक खोवा भर के भाभी ने उसे देना चाहा तो पंडित ने पूछा –“क्या फसल है माई?”

 कुसुम भाभी बोली “महाराज उड़द हुई थी!”

 पंडित पीछे हट गया “ना ना …….ना हम उड़द खाते, ना उड़द दान में लेते !तुम लोगों को पता नहीं है क्या ? उड़द ना कोई पंडित खाता, न दान में दी जाती और सामान्य दिनों में भी उड़द का उपयोग नहीं किया जाता उड़द तो किसी की तेरही में दी जाती है। ”

 अंधविश्वासी पंडित ने लटूरी दद्दा और भौजाई को और ज्यादा अंधविश्वास में पटक दिया था।

 लटूरी को कुसुम भाभी सलाह दी ना हो तो अपने पंडित नवनीत राम से पूछ लो क्या करें इतनी मेहनत से इतनी फसल तैयार हुई !

तो मजबूरी में लटूरी दद्दा दौड़ता हुआ पंडित नवनीत राम के घर पहुंचा। बताया कि इस बार उसने साझीदार को हटाकर खुद फसल बोई थी और सब ने कहा कि उड़द की फसल अच्छी होती है, उड़ती बो दिए थे। अब उड़द तो बहुत अच्छी हुई है, पर अभी अभी एक पंडित ने दान में नहीं ली। कहने लगा उड़द तो शनि का दान होती है तेरही क दान होती है, भले लोग ना उड़द दान में लेते ना देते। आप बताओ महाराज उड़द मेरे लिए कैसी रहेगी। ”

   पंडित जी की आंखों में लालच उतर आया बे मीठी जुबान से बोल पड़े “लटूरा मैं मर थोड़ी गया था। पहले क्यों नहीं आया। पहले पूछता तो मैं कुछ बताता। अब तो सब गलत हो गई ना। ”

लटूरी दद्दा बोल पड़े “महाराज अब गलती हो गई। अभी बताओ। ”

पंडित जी ने गिनना शुरू किया “ देख तेरा नाम लटूरी, राशि मेष होती हैं।  मेष वृष मिथुन कर्क ----”

अपनी उंगली पर रख समझ में ना आने वाली राशियों के नाम ले रए, फिर गिन कर बताए कि ” तेरी राशि पर शनि बैठा है उड़द की फसल तेरे लिए तो दुश्मन है। अगर तुमने एक दाना भी उड़द का खा लिया तो समझ ले कि भगवान ही मालिक है। उड़द खाते हीं मर जाएगा। आगे तू जाने तेरा काम। ”

 लटूरी “महाराज? अब बताओ ?”

 नवनीत राम चिल्लाए “जो उसको खाएगा वह मर जाएगा क्योंकि राशि मेष में उड़द नुकसान करता है। वैसा कर पूरी उड़द किसी को दान कर दे। हां देख कोई दूसरे गांव का पंडित नहीं लेगा। क्योंकि शनि का दान होता है। “ लटूरी मजबूरी में क्या करता भोला “महाराज कृपा करो आप ही मेरे पुरोहित ,आपके सिवाय किसको दूंगा। ” अनमने भाव से पंडित ने कहा “वैसे तो मैं शनि का दान लेता नहीं हूं , तेरा संकट अपने माथे लेता हूं। नहीं मानता तो ले आ। ”

लटूरी ने खेत में बैठी कुसुम को कहा सारा किस्सा कह सुनाया। कुसुम को बड़ा दुख हुआ के सारे काम छोड़ कर निदा घोड़ी करते रहे इधर किसी से बैलगाड़ी मांग कर उसमें उड़द रहा था कि मन न माना, तो कुसुम भाभी ने एक दलिया भरकर उड़द सूखे उसमें छुपा दी।

पंडित के यहां देने चला गया तो जल्दी-जल्दी में कुसुम भाभी ने --लिया उड़ान से उठाई और अपने घर जाकर बिना में छुपा दी।

 बेचारे लटूरी दद्दा के मजदूरी करना लिखी थी।

इतनी अच्छी फसल होने के बाद फिर से मजदूरी करने लगा।

एक दिन की बात है अपने ससुराल गए थे। ससुराल पास के गांव में थी “ मैं जा रहा हूं तो दो-तीन दिन आराम से रहना डरना नहीं। ”

लटूरी दद्दा निकले तो कुसुम भाभी ने सोचा कि “अब मौका है अपने हाथ की उगाई गई उड़द की दाल का स्वाद तो लिया जाए, सुनते हैं उड़द बड़ी स्वादिष्ट दाल होती है,”

 सुबह से ही कुसुम भाभी ने उड़द की दाल उबलने के लिए रख दी।  हढ़िया में उड़द खदकती रही, खदकती रही। उड़द की दाल बहुत देर में पकती है, उड़द की दाल दोपहर आधे दोपहर विधि की हर दोपहर तक उड़द की दाल और जब पता लगा, ठीक से उबल गई है उसने बढ़िया हींग डालकर छोंका लगाया।

 लटूरी दद्दा अपनी ससुराल गए थे। वहां पता लगाकर ससुराल के सब लोग कोई दूसरे गांव चले गए और वहां ताला लगा था। मजबूरी में लौट आए

कुसुम भाभी को उड़द की स्वादिष्ट मनपसंद दाल मिली तो सटासट भरपेट खायी और आलस में आकर पॉँव पसार के सो गयी। लटूरी दद्दा घर आये तो किबाड़ लगे थे, उन्होंने आ के द्वार खटकाया।

तो कुसुम चौकी।

किबाड़ खुले। लटूरी दद्दा सामने थे-“ क्या हुआ?”

 उन ने कहा “तेरे भैया भाभी सब कहीं चले गए हैं। तो मुझे लौटना पड़ा। रोटी तक नहीं मिली। बहुत भूख लग रही है चल जल्दी से खाना दे। ”

 पति को भूखा देखकर बिना सोचे विचारे कुसुम भाभी ने जल्दी से आठ-दस रोटी और थाली भर उड़द की दाल लटूरी दद्दा के सामने रख दी। लटूरी भूख थे ना रंग देखा , ना दाल की जाति पूछी और सटासट भरपेट खाना लगा। डकार लेते हुए वह बार-बार कहने लगा कि “आज की दाल बहुत अच्छी है। ऐसी दाल कब होनी है।

अब कुसुम भूल गई थी कि पंडित मनीराम ने कहा था “यह दाल तुम बिल्कुल मत खाना, एक दाना भी खाओगे तो तुम्हारी मौत निश्चित है। ”

उनसे रहा नहीं गया पति की खुशहाली के लिए वह उसने झपट कर थाली खींची।

लटूरी देखता ही रह गया फिर चिल्ला कर बोला ”थाली क्यों खींच ली ? बता कैसे बनाई थी ? कौन सी दाल थी?

 कुसुम कहने लगी “मुझसे गलती हो गई मैंने अपनी खेती की उड़द की फसल से कुछ दाल बचा ली थी वहीं आज बनाई थी। वही आपको खिला दी। ”

लटूरी दद्दा के मस्तिष्क में बार-बार नवनीत राम की कही बात नहीं ढूंढ रही थी कि “ए लटूरा तू एक दाना भी खाया तो मर जाएगा। ”

 भोला लटूरा इसी विचार में बहुत परेशान हो गया। सच को तस्दीक करने के लिए वह वहीं लेट गया। सोच रहा था मेरे पेट में गई है अब धीरे-धीरे मेरे पास मृत्यु का आना शुरू हो जाएगा। पैर फैला लिए लेट गया और सांस रोकने की कोशिश करने लगा

 कुसुम बोली कैसे लेट गए

उसने कहा” देख मैं तड़प के मरूं उससे अच्छा है मौत का स्वागत करता हूं। नवनीत राम ने कहा है कि मौत तो आ ही जाएगी उड़द खाने से। अब मैं आराम से उसी का इंतजार करता हूं।

उसे ऐसा लेटा हुआ देखकर रोने लगी। रोने की आवाज से पड़ोसी बोले “क्या हुआ?”

 कुसुम रोते-रोते बोली “क्या करूं? मेरी मत मारी गई थी। पुरोहित ने मना किया था कि तुम अपनी फसल की उड़द मत खाना। लेकिन मैंने कुछ उड़द छुपा लिए थे। आज गलती से खिला दिए। तो यह तो खा कर ऐसे लेट गए लग रहा है कहीं हाय राम हाय दैया मैं क्या करूं ?

लोग कहने लगे “भौजी तुमसे गलती तो हो गई। अब कुछ करो।

 लोग कान्हा सी करने लगे कि” लटूरी दद्दा तो अच्छे थे लेकिन यह भौजी उड़द की स्वादिष्ट मनपसंद दाल अपने खसम को खा गई! 

बाहर से भी कुछ लोगों की आवाज आई कि हम अपने अपने घरों से लकड़ी मरघट को भेज रहे हैं। तुम लोग लाश निकालो। श्मशान की तैयारी करो।

लटूरी को लगा कि उड़द खाने के बाद मौत आएगी इस पर विश्वास करके लेट तो गया, आंख तो सांस तो बंद ही नहीं है क्या करें? यह लोग तो श्मशान जाने की तैयारी करने लगे हैं। उसे लगा कि अब जब तक मौत नहीं आए इतनी देर कर लेना चाहिए। लेकिन वह आंख नहीं खोल पा रहा था। अगर खुद ने ही तुम्हारे का नाटक किया था

उसने अचानक ही अपने हाथ और पांव फैला लिए उसे लगा कि जब तक हाथ पांव नहीं सिकुड़ते तब तक ही लोग ले नहीं जाएंगे और तब तक मौत तो आ ही जाएगी।

 घर के आंगन में से कुछ लोगों की आवाज आई “आप क्या देर? लाश ले आओ दो जने,”

 उसको उठाने को भीतर आए तो देखा कि लाश के हाथ पांव फैल गए हैं और ऐसे में उसे छोटे से दरवाजे से बाहर ले जाना बड़ा कठिन होगा।

लोगों ने भीतर से ही आवाज लगाकर कहा कि बहुत देर हो गई , लाश के हाथ पांव फैल गए हैं तो बाहर से किसी बुजुर्ग ने कहा ”एक धारदार कुल्हाड़ी उठाओ लाश से क्या मोह करना, हाथ और पांव काट दो, रास्ते पर ला कर दो।

 यह सुना लटूरी दद्दा का ऊपर का दम ऊपर और नीचे का नीचे रह गया ,उन्होंने थोड़ी सी आंख खोलकर देखा कुल्हाड़ी लेने दोनों जन बाहर निकल गए थे।

दोनों अपनी धारदार कुल्हाड़ी लेकर दोनों जन आए तो उन्होंने संतोष की सांस ले “लो काटना पीटना नहीं पड़ा लास्ट सिकुड़ गई”

 उन्होंने फिर आवाज लगाई “काटने की जरूरत नहीं है इतनी देर हो गई ला सब ठीक हो गई है “

लटूरी को उठाकर बाहर लाया गया तो उठाने वाले कहने लगे मुर्दा हल्का नहीं हुआ, अभी भी वजनदार है” तो पंडित बोला मजदूर आदमी था पर पेट खाता था और खूब नौकरी करता था। शरीर को मोटा ताजा होगा ही।

लटूरी को अर्थी पर लिटाया गया उसके सारे कपड़े निकाल दिए गए। नया कफन उड़ा कर अतिथियों से बांधकर उसे मरघट की ओर ले कर चल दिए। रामनाम सकते हैं।

 कभी आंख खोल कर देखता था यह गलियां यह दरवाजे खिड़की यह पड़ोसी अब नहीं दिखेंगे।

 श्मशान में ले जाकर रखा गया तो पंडित बोला कि सुनो गांव वालों मोटे तगड़े मत छोड़ना। मोटी मोटी लकड़ी इसको ठीक से लाना कौन है अनजला रह गया जिंदा भूत बन जाएगा।

कुछ लोग दौड़कर गांव तरफ गए। जिससे मोटी लकड़ी -ला सकें।

अर्थी में जकड़े हुए लटूरी की मौत तो नहीं आ रही बता देना चाहिए पास में कुछ बुड्ढे लोग बैठे थे उसने सोचा इन बूढ़ों को समझा लूंगा यह गांव वालों को और बाकी लोगों को हाल बता देंगे कि नहीं वह तो जिंदा था।

 लटूरी ने अपने हाथ उठाए तो नहीं उठी उसने मुंह के पास बंदी आंटी सुतली को दाँतों से कांटी, नहीं कटी। हाथ बाहर निकाल पूरी ताकत लगाकर अर्थी में से उठने लगा। टूटती हुई आंटी की आवाज सुनकर बूढ़े ने से देखा ----मुर्दा उठ बैठा और उसने बैठ कर कहा पंचों राम राम काका दादा जय राम जी की नमस्कार हो मैं मरा नहीं हूं मैं तो जिंदा हूं।

 एक मुर्दे के मुंह से ऐसी बातें सुनकर बूढ़े ने जिन्होंने यह सुना बे उठ खड़े हुए और जब तक अर्थी के सुतली तोड़ता हुआ नंग धड़ंग लटूरी खड़ा होता बूढ़े लोगों ने गांव की तरफ दौड़ लगा दी।

अब तो आलम यह था जो भी देखता था वह जिधर रास्ता मिलता था उधर भाग जाता था।

 गांव के लोग गांव की तरफ भाग रहे थे और पीछे पीछे नंग धड़ंग लटूरी दौड़ता चला रहा था।  हाथ जोड़ता हुआ लटूरी लोगों से कहता “बात सुनो बात सुनो, में मरा नहीं था, मारा नहीं था मरने का इंतजार कर रहा था।

 लेकिन लोग कहां सुन रहे थे एक उसके पड़ोसी अपने घर में घुसे लेकिन उन्होंने उसके पहले कुसुम जी को यह बताना जरूरी समझा के लटूरी तो जिंदा भूत हो गया है ,अब वह घर तरफ आएगा ,तुम भीतर से ताला जड़ के अंदर छुप जाओ।

उसने फटाक से के बार लगाए और कुंडी चढ़ाकर दुबक गई थी लटूरी दरवाजे तक आया बुधवार खटका ए चिल्लाया बोला।

लेकिन किसी ने नहीं सुनी और आखिर में रोता रोता वही बैठ गया तब मोहल्ले से हर घर से कुछ लोग तलवार लेकर कर लो ठंडा लेकर निकले और बोले “भूत मरघट में जा। यहां बैठेगा तो द्वारा मार डालेंगे।

डरा हुआ लटूरी वापस मरघट की ओर चला गया। अपने ही कफन को उठाकर उसने बदन पर लपेट लिया। मरघट के पास एक नदी थी। लटूरी ने पहले कुछ ना समझ में आया तो स्नान किया और अपनी ही लाश पर डाले हुए मखाने और दूसरी चीजें खाएं फिर वही झोपड़ी के पास में एक पेड़ के नीचे बैठ गया।  फिर यही हुआ कि वह नदी के किनारे रहने लगा। ऊपर से वह पेड़ से फल खा लेता था कुछ नहीं मिलता तो घास की जड़ खा लेता था। नदी का पानी पीता था और वही बड़ा है तथा एक आदम आदमी की तरह रहने लगा।

 कुछ दिन बाद गांव में एक अंग्रेज दरोगा दौरे पर आया उसने गांव के लोगों को जमा किया बड़ी कठिनाई से लोग हुए। लोगों ने कहा कि इस गांव में तो ना तो लगान दे पाएंगे और ना हम कोई कर कर दे पाएंगे, क्योंकि हमारे गांव में एक जिंदा भूत हो गया है ,वह कभी मुख्य सड़क तरफ आ जाता है तो कभी गांव में चक्कर लगाता है। हम लोग डरे डरे से घर में बंद रहते हैं। हमारे सारे खेत मरघट के पास है, ना कोई खेती कर पा रहा है और ना कोई व्यापार बंज कर पा रहा है।

 यह सुनकर अंग्रेज दरोगा बहुत हंसा। अंग्रेज दरोगा कहने लगा कि “तुम लोग डरपोक हो। जिंदा भूत क्या होता है मैं देखता हूं चलो। आज वही नदी पर नहा लूंगा लूंगा और देख लूंगा कौन सा जिंदा भूत है ?

उसने गांव के नाई को बुलाया, धोबी को बुलाया और खाना बनाने वाले कुछ लोगों को लिया। अपने घोड़े को लेकर नदी किनारे पहुंचे ,जहां कि पता लगा था कि लटूरी झोपड़ी में रहता है।

नाई और धोबी ने पहले कह दिया था हजूर अगर लटूरी का जिंदा भूत दिखा तो भाग खड़े होंगे।

अंग्रेज दरोगा बोला मेरे होते कोई लटूरी पटोरी नहीं आएगा

 नदी के किनारे अंग्रेज बहादुर का घोड़ा कद्दावर काबली आगे के पांव में बड़े-बड़े रस्सी में खूटे और पीछे के पांव में बड़े रस्सी खूटे से बांधकर घोड़ा मैदान में कर दिया गया।

नाई ने साबुन लगाया और दरोगा जी की दाढ़ी बनाने लगा। लेकिन वह कनखियों से नदी की तरफ देख रहा था।

 दरोगा ने खुद झोपड़ी में देख कर आया था जो कि खाली पड़ी हुई थी।

 उधर धोबी दादा ने कपड़े लिए और नदी के पानी से धोने लगा

लटूरी दद्दा उस दिन नदी के उस पार के जंगल में अपने लिए भोजन की तलाश में थे।

 उन्होंने वहां से देखा कि आज तो कुछ लोग झोपड़ी में हैं, अरे वर्दी पहने दरोगा जी भी हैं। अब उसे लगा कि अब सही बात, मेरी सच्चाई गांव वाले तो नहीं समझे यह दरोगा जरूर समझ जाएंगे मैं इन्हें अपनी बात बताता हूं,

उन्होंने सोचा अंग्रेज बहादुर समझ दार होता है यह लोग भूत नहीं समझते हैं। में इनको ही जाकर बताता हूं यह समझ लेंगे तो ठीक रहेगा ,क्योंकि अब सर्दी का मौसम आने वाला है मैं ऐसा यहां कहां समय काट लूंगा यह सोचकर ही ---नदी पार के जंगल से उन्होंने नदी में कूद लगाई कूदा और नदी का पानी को करता हुआ इस तरफ बढ़ने लगा।

नदी में कूद की आवाज आई धोबी कक्का खड़े हो गए उन्होंने देखा कि सामने बाल लंबे चौड़े पाल जटा लटूरी दद्दा चला -रहा है- “ हुजूर लटूरी”

 उधर नाइ देखा कि सच में लटूरी है।

 दोनों ने कहा जो “हमने कहा था हम भाग जाएंगे हम तो जाएंगे”

 एक तरफ , दरोगा आधे कपड़े पहने अंडरवियर बनियान पहने खड़ा हुआ था, दरोगा ने अपनी बंदूक का घोड़ा खींचा पार करने की कोशिश की लटूरी दद्दा नदी में कूद लगाई इस तरफ बढ़ने लगा।

दरोगा ने कहा उसके सब लोग सही कहते थे अगर लटूरी का जिंदा भूत दिखा तो भाग जाएंगे!

दरोगा ने कपड़े बिना देखे घोड़ा पर बैठ गया और घोड़ा में ऐड़ लगा दिए ! घोड़ा अड़ा लेकिन उसने चाबुक मारते हुए घोड़ा को आगे बड़ने का इशारा किया। घोड़ा  नस्ल का अच्छा था , अपने सवार की इच्छा जानकर उसने पूरी ताकत लगाई और पीछे के दोनों पिछाड़ी की रस्सी और खूंटा पर जोर लगाने से रस्सी तो न टूटे दोनों पिछाड़ी खूंटा -उठ गए।

घोड़े ने दौड़ना शुरू किया।


घोड़ा सीधा शहर की ओर दौड़ रहा था । उसका दाया पांव पीछे को उठ के आता तो दाएं तरफ की पिछाड़ी की रस्सी और खूंटा दरोगा जी की पीठ पर लगता और बांए तरफ का पिछला पैर आता तो बांए तरफ की पिछड़ी का खूंटा सिर में कर लगता। दरोगा जी समझते हुए कि यह लटूरी का घोस्ट है , बार-बार लटूरी मैं तेरे घर से जा रहा हूं। लटूरी तेरे घर गलत आ गया था, माफ़ कर दे। चिल्लाते रहे घोड़े के पांव घोड़े के पिछले दोनों पैरों में बंधी पिछाड़ी के रस्सों और लोहे के खूंटे टकरा टकरा कर दरोगा को लुहलुहान कर दिया। अंग्रेज दरोगा रो-रोकर दया की भीख मांगता हुआ चिल्लाता रहा।

लेकिन लटूरी के भय से ना उसने घोड़ा रोक के किसी से सहयोग लिया ना रोकने की कोशिश की और इस तरह वह अपने थाने तक उसी दशा में पहुंचा।

 रोता चिल्लाता दरोगा अपने थाने में खड़ा हुआ तो सिपाहियों ने बंदूक तान दी कौन परेशान कर रहा है?

 घोड़े के रुकते ही दरोगा उतरा और पीछे मुड़कर देखा तो पीछे कोई नहीं था।

वह बच गया लटूरी वापस चला गया।

पुलिस के सिपाहियों के पूछने पर लटूरी ने दरोगा ने सारा किस्सा कह सुनाया तो थाने के दारोगा की बात सुनकर सिपाहियों को विश्वास हो गया कि यहां तक दरोगा जी को मारता पीटता लटूरी ही आया था।

बंधु के हाथ में लिए कितने हुए बैठे रहे लेकिन रात को नहीं आया।

लटूरी को लग रहा था कि अब अंग्रेज साहब नहीं आया तो अब मेरा क्या होगा। हालांकि उस दिन साहब के साथ में आया नाई भागते समय हजामत बनाने का पूरा सामान नदी किनारे छोड़ गया था। धोबी भी बहुत सारे कपड़े छोड़ गया था। लटूरी को बैठे बिठाए ढेर सारे कपड़े मिल गए और खाने-पीने का सामान भी।

 उसने एक कैंची और उसे अपने बाल नाखून काट लिए। नहा धोकर कपड़े पहन लिए।

भला आदमी था बगीचे में ताजे फल और सब्जियां तोड़कर उसने वहां बन रहे खाने को खुद पकाया और भोजन किया फिर कई दिनों तक भोजन कपड़े बनाता रहा।

एक बार की बात है पंडित नवनीत राम पास के गांव में पूजा कराने के लिए गये थे जहां खूब सारी पूरी कचोरी खा ली और तुरन्त ही वापस चल दिये। खा के तुरन्त चल देने के कारण पण्डित का हाजमा खराब हो गया।

 उसका पेट दर्द करने लगा ,तेज गति से गांव के लिए चल पड़ा था।

नदी तक आते-आते उसकी हालत खराब हो गई , उसे ज़ोर का पाया उसने ना तो यह देखा कि मरघट का किनारा है यह देखा कि यह जिंदा भूत लटूरी इलाका है।

 सारे कपड़े उतारे और नदी किनारे निवृत्त होने के लिए बैठ गया फिर उसी अवस्था मे नहाने के लिए निर्वस्त्र ही कूद पड़ा। एक पेड़ पर बैठा हुआ यह नजारा देख रहा था।

इस वक्त अच्छा मौका है वह लपक कर नदी किनारे पहुंचा पंडित के कपड़े हाथ में लेकर जोर से जोर से दहाड़ा-पण्डित नौनीत राम अब तू मेरे अंट में आया है।नदी में नहाते पंडित ने लटूरी को देखा तो उसे काटो तो खून नहीं।

 पंडित जी की जान सुख गयी, रोते हुए बोला “लटूरा भाई तू तो मेरा जजमान था ? मैंने तेरा क्या बिगाड़ा ?”

वृद्धा ने कहा “सब कुछ तू नहीं बिगाड़ा। मुझे पता था कि उड़द के खाने से कोई नहीं मरता। तूने और मैं उड़द खाऊंगा भूत बन जाऊंगा। मेरे जैसे सीधे आदमी की जिंदगी खराब कर दी। अब देख तू भूत बनेगा पानी में ही डूबके मर जाएगा मैं तुझे ऊपर नहीं चढ़ने दूंगा या फिर आजा हम दोनों यहीं जिंदा भूत बन के रहेंगे। ”

 पण्डित रोने लगा “मुझे छोड़ दे बेटा। चल मैं तुझे गांव ले चलता हूं। मैं गाँव में बताता हूं कि लटूरी जिंदा बहुत नहीं है पर तू सच में जिंदा है।

 लटूरी दद्दा बोले पण्डित तुम्हें शंका हो तो तुम भी खत्म कर लो, देख लो झड़ियों में छिलने की वजह मेरे हाथ पांव से भी से खून निकल रहा है भूत प्रेत के कोई खून नही निकलता। देखो मेरी दाढ़ी मूँछ बढ़ गई हैं। देख अंग्रेज दरोगा के छोटे हुए कपड़े में पहने खड़ा हूं। देख थोड़े उस तरह से मैंने अपनी दाढ़ी बना ली है।

 पंडित को विश्वास हो गया उसने वही हाथ जोड़कर कहा कि आज से तू मेरा धर्म का बेटा हुआ। मैं तेरा धर्म का बाप हुआ। अब सौगंध लेता हूं कि जब तक तुझे गांव में नहीं बसा दूंगा चैन से नही रहूँगा। तेरी जिंदगी दोबारा ठीक नहीं करूंगा मैं नहीं छोडूंगा।

 लटूरी ने पंडित को बाहर निकलने दिया। कपड़े पहनने दिए और फिर पंडित नोनीत राम का हाथ पकड़कर गांव की तरफ चला।

पहले तो लोगों ने देखा विश्वास नहीं हुआ। चिल्लाते भागने लगे पर पंडित ने सब को रोका नवनीत राम पंडित का गांव में बड़ा सम्मान था।

उन्होंने सबको बुलाया कि। यह पूरा भूत नहीं था। जिंदा था। मैंने इसे मंत्र पूजा से ठीक कर दिया है। अब से अपने घर में पहले जैसा रहेगा, सब लोग से पहले जैसा ही मानो।

सबसे पहले कुसुम भाभी के द्वार खुल गए।

 लटूरी को आराम से घर भेजा गया । तब धीरे-धीरे करके गांव में लटूरी दद्दा अपनी पुरानी जिंदगी जीने लगे।

लेकिन फिर भी कभी-कभी लोग उन्हें चिढ़ाते थे - लटूरी दद्दा तुम जिंदा भूत से जिंदा आदमी बन गए।

नवनीत राम का एहसान तो मानो और मुस्कुराते हुए लटूरी दद्दा बोलते थे कि मैं उनका एहसान क्यों मानूं उन्हें मेरा एहसान मानना चाहिए कि मैंने उन्हें जिंदा भूत नहीं बनाया।



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