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Kanchan Pandey

Inspirational

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Kanchan Pandey

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नव वर्ष की नई दिशा

नव वर्ष की नई दिशा

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सर्दी के मौसम में नए वर्ष के आगमन से चारों ओर जोश और उमंग ने गरमाहट भर दी। घर से लेकर बाजार तक चहल पहल, नए वर्ष की आने की खुशी एक अलग हीं आंनद प्रदान कर रही थी। अग्रिम शुभकामनाओं के साथ साथ घर में क्या बनेगा उसकी भी फुसफुसाहट शुरू हो चुकी थी। सदानन्द जी आफिस जाते–जाते बोले मीठी ओ मीठी माँ से पूछकर तो बताओ नए साल के लिए कुछ चाहिए। क्या क्या बना रही है। मीठी क्या पापा आप भी जमाना कहाँ से कहाँ चला गया और आप घर में क्या बनेगा पता है पूछ रहे हैं।

सदानन्द जी मानो बेटी की बातें सुनकर स्तब्ध रह गए। मीठी जानते हैं पापा मेरी दोस्त जिया नए साल के लिए क्या क्या सोच ली है वह अपने पापा मम्मी के साथ पूरा दिन बाहर बिताएगी वाह कितना मजा आएगा ना मॉल सिनेमा और तो और बाहर खाना खाना। ज्योति- मीठी की बात सुनकर बड़ी आश्चर्य से मीठी से बोली वाह बेटा नए वर्ष के साथ तुम्हारा नया रंग बहुत अच्छा है मीठी –नहीं नहीं मम्मी। ज्योति –क्या नहीं नहीं उनलोगों से तुलना नहीं कर सकते हैं। एक तुम दूसरा तुम्हारा भाई न जाने दिन भर मोबाईल से क्यों चिपका रहता है माँ बाप की स्थिती नहीं देख रही हो। बीच में सदानन्द जी बात काटते हुए अरे ज्योति बेकार की बात में तुम भी उलझ रही हो अब तुम आ हीं गई हो तो बताओ क्या क्या चाहिए। सदानन्द जी मुस्स्कुराते हुए बोले देखो कल बोलोगी तो मै नहीं रूपये खर्च करने वाला साल भर खर्चा होते रहेगा कल तो मैं एक पैसे खर्च नहीं कर सकता हूँ। अच्छा तुम्हारा लाडला दिखाई नहीं दे रहा है कहाँ है ?ज्योति –नहीं पता कहाँ रहता है फिर ज्योति बोली दीक्षित दीक्षित कहाँ हो यहाँ आओ पापा बुला रहे हैं। दीक्षित –जी पापा।

सदानन्द जी –कल घर में हीं रहना नया साल है। तुम सभी एकसाथ मिलकर नव वर्ष मनाना देखो मैं तो एक छोटा मुलाजिम हूँ और कल साल के पहले दिन हीं आफिस नहीं जाऊंगा तो अच्छी बात नहीं है ठीक है ना दीक्षित।

दीक्षित –नहीं नहीं पापा कल मेरा स्कूल है और उसके बाद कल अतिरिक्त कक्षा लिया जाएगा इसलिए मुझे भी घर आते आते शाम हो जाएगी। सदानन्द जी थैला लेकर निकल गए।

ज्योति –बेटे क्या आज तेरी स्कूल और अतिरिक्त कक्षा नहीं है और कल लड़ाई मत करना फिर वही बोल रही हूँ कहते हैं साल के पहले दिन जो करते हैं वह साल भर करते हैं, फिर मीठी बात काटते हुए नहीं मम्मी ऐसा कुछ नहीं होता है।

ज्योति –अच्छा अब तो तू मुझसे ज्यादा जानती हो। अब बताओ मेरे लाडलो कल क्या क्या खाना है। दीक्षित-देखो कुछ भी बना देना और सब कुछ खाना हीं नहीं होता है अपने बच्चों के इस रूप को देखकर बहुत आहत हुई हृदय छलनी छलनी हो गया वह तडप उठी सहसा उसके मुँह से निकल गया ओह हे भगवान यह किस कर्म की सजा दे रहे हो क्या मैने यही संस्कार दिए थे। दोनों बच्चों को सम्भलते देर नहीं लगी तुरंत में माँ में लिपट कर प्यार जताने लगे ओ मम्मी प्यारी मम्मी भूल हो गई।

दीक्षित –मैंने तो इसलिए कहा था क्योंकि सब बार हमलोग अपनी मर्जी चलाते हैं। इस बार अपनी मम्मी की मर्जी का खाया जाए है ना मीठी।

मीठी –हाँ माँ।

ज्योति –चुप हो जाओ मुझे झूठ का प्यार अच्छा नहीं लगता है कल कुछ बना दूँगी तो दोनों मुँह मत बनाना। इस तरह शाम से रात हुई और रात के बारह बजते हीं शुभकामनाओं का आदान प्रदान शुरू हो गया सुबह होते हीं दीक्षित निकल गया पढ़ाई के नाम पर न सदानन्द जी कुछ बोले और न ज्योति। अब तो शाम हो गई और सदानन्द जी भी आ गए लेकिन दीक्षित का कोई अता पता नहीं था सारी खुशियाँ चिंता के अन्धयारे गुम होते जा रहे थे।

सभी के मन में अलग-अलग ख्याल आ रहे थे। सदानन्द जी कभी बाहर तो कभी अंदर तब ज्योति बेचैनी भरे स्वर में बोल पड़ी क्या अंदर बाहर कर रहे हैं जाइए ना स्कूल में पूछिए। सदानन्द जी –स्कूल में अभी कौन होगा। ज्योति - उसके दोस्तों से तो पूछ हीं सकते हैं। सदानन्द जी निकल ही रहे थे कि गोपाल दौड़ा –दौड़ा आया चाचा जी दीक्षित दीक्षित सदानन्द जी –क्या दीक्षित क्या हुआ दीक्षित को, वह कहाँ है। गोपाल –वह अस्पताल में है। सभी अस्पताल पहुँचे तब तक दीक्षित खतरे से बाहर हो चुका था लेकिन सभी को आश्चर्य हो रहा था कि आखिर क्या हुआ जो यह इस हाल में पहुंच गया डाक्टर से पूछने पर सिर्फ यह पता चला कि पानी में डूबने के कारण यह स्थिती हुई है लेकिन सदानन्द जी ने साफ साफ सभी को मना कर दिया था कि कोई भी यह नहीं पूछेगा कि दीक्षित का यह हाल कैसे हुआ दीक्षित के होश आते हीं सब इस तरह मिले कि कुछ हुआ हीं नहीं सब का ऐसा व्यवहार देखकर दीक्षित फपक फपक कर रोने लगा माफ कर दीजिए पापा माफ़ कर दो मम्मी गलती हो गई।

सदानन्द जी कुछ नहीं हुआ तुम ठीक हो ना बेटा। दीक्षित मै ठीक नहीं हूँ ज्योति –क्या हुआ मेरे लाल। दीक्षित –मैं अच्छा बेटा नहीं हूँ आपलोगों के कहने पर भी मैं आज के दिन आपलोगों से दूर अपने दोस्तों के साथ पिकनिक मनाने गया मैने मम्मी का दिल भी दुखाया ठीक हुआ मेरे साथ पानी में गिरने के बाद मैं डूब जाता तो अच्छा होता मैं अच्छा बेटा नहीं हूँ मैं अच्छा बेटा नहीं हूँ। सदानन्द जी चौंक गए अरे पानी में कैसे गिर गए। गोपाल –चाचा जी यह अपने स्कूल के दोस्तों के साथ पहाड़ी नदी के पास पिकनिक मनाने गया था खेल –खेल में इसकी पैर फिसल गई और यह पानी में गिर गया और पानी की रफ्तार इतनी अधिक थी कि यह बहता चला गया और इसके दोस्तों की हिम्मत नहीं हुई और उस तेज रफ्तार पानी में हिम्मत भी नहीं होगी किसी की।

ज्योति –फिर इसको कौन लाया यहाँ। गोपाल –मैं रोज नदी तक टहलने जाता हूँ। आज अचानक मेरी नजर जब पानी की ओर गई तब मै डर गया एक लड़का नदी में एक पत्थर में अटका हुआ था कुछ क्षण के लिए मेरी आवाज हीं अटक गई लेकिन फिर हिम्मत करके चिल्लाने लगा तब घर जा रहे मजदूर मेरे पास आए तब उनकी सहायता से मैं अपने दोस्त को बचा पाया।

दीक्षित –माफ कर दो दोस्त मैं कभी तुम्हारी दोस्ती को समझ हीं नहीं पाया अमीरी की चकाचौंध ने मेरी आँखें खराब कर दी।

गोपाल –दोस्ती में माफी नहीं होती है। सदानन्द जी –तुम्हारा बहुत बहुत आभार बेटा तुम सचमुच एक अच्छे दोस्त हो। दीक्षित- पापा मम्मी आज नववर्ष के दिन मैं यह प्रण लेता हूँ कि जीवन में मैं कभी भी आपदोनों से झूठ नहीं बोलूँगा और आप दोनों के बताए रास्ते पर चलूँगा।

मीठी –मैं भी।

सदानन्द जी –अरे मेरे प्यारे बच्चों आप दोनों अनमोल रत्न हो और नव वर्ष में यह नई सोच देखकर मैं और तुन्हारी माँ बहुत खुश हैं खुश रहो।  


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