Sushma Tiwari

Inspirational


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Sushma Tiwari

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नजरिए का फ़ेर

नजरिए का फ़ेर

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फोन की घंटी लगातार बज रही थी। हाँ पर वो नहीं उठाएगी उसने सोच लिया था। जबसे प्राची को स्कूल से सस्पेंड किया है और रिश्तेदारों को पता चला है ऐसे फोन कर रहे हैं जैसे कोई पहाड़ टूट पड़ा हो। एक तो वो खुद परेशान है उस पर ये फोन है जो बजने से रुकने का नाम ही नहीं ले रहा है।

फोन बंद होते ही मोबाइल रिंग होने लगा।

मोबाइल पर उसके बेस्ट फ्रेंड मीना का मैसेज था।

"तुम फोन नहीं उठा रही हो ज्योति! पर तुमसे बस इतना कहना था कि प्लीज परेशान मत होना.. प्राची बच्ची है और भेड़ दौड़ में दौड़ने वाले ये स्कूल वाले ऐसे ही करते हैं, प्राची को कुछ नहीं हुआ है.. तुम चाहो तो किसी अच्छे चाइल्ड कौन्सिलर से मिल लो और दिमाग शांत रखो"

मीना की बातें ज्योति को राहत देते हुए थी। ज्योति ने गूगल खोल कर उस में से चाइल्ड कौन्सिलर का नंबर निकाला। मीटिंग फिक्स करके धीरे से निकली क्यूँकी वो सोसायटी में भी किसी का सामना नहीं करना चाहती थी जो लोग पहले से ही ताना देते थे कि आपकी बेटी नॉर्मल नहीं है। पता नहीं क्यूँ उसे अब तक ऐसा कभी लगा नहीं पर आज स्कूल वालों की हरक़त के बाद सबकी नज़रों में गुनहगार बन गई थी। प्राची के पिता यानी कमल को तो बिलकुल फर्क़ नहीं पड़ा, बोले कि अच्छा है समय पर ही इतने फालतू स्कूल से बच्ची बच गई मेरी, नाहक पैसे बर्बाद होते। पर ज्योति का मन तो घोड़े की गति से कभी समाज, कभी रिश्तेदार सब जगह दौड़ रहा था।

डॉक्टर के क्लिनिक पहुंच कर ज्योति अपनी बारी आने के इंतज़ार में बैठ गई। प्राची वही लगे पेंटिंग से बातें करने लगी, खेलने लगी। 


"मम्मी! मैं एक कहानी सुनाऊँ?"

प्राची उछलते हुए बोली जो कि कब से सामने टंगी पेंटिंग को देख मुस्कुरा रही थी।

"बस कर अब तेरी कहानियां!" ज्योति के सब्र का बाँध टूटने ही वाला था।

चाइल्ड कॉउन्सलर के यहां बैठे हुए अपनी बारी के इंतज़ार में वो साथ बैठी महिला को भी देख रही थी जिसके साथ उसका बेटा मोटा चश्मा लगाए चुपचाप किताब में आधे घण्टे से सर घुसाए बैठा था। ज्योति की आँखों से आँसू निकल आए, यही तो वो चाहती थी कि कभी प्राची भी जरूरी किताबों से प्यार करे।


"वैसे क्या समस्या है आपकी?" ज्योति की आँखों में आँसू देख उसने पूछ लिया।


"जी मेरी प्राची वैसे तो बहुत ही समझदार बच्ची है पर जाने कोर्स की किताबों में मन नहीं लगता.. जब देखो कहानियाँ बनाती रहती है.. जाने कहाँ कहाँ की बातें .. पढ़ाई में भी पिछड़ रही है उस पर भी इसे फर्क़ नहीं पड़ता है। मैंने कई बार कोशिश की एकांत में एक जगह बैठ स्कूली किताबें पढ़ सके तो कहती है कहानियों की किताबें बातें करती है, वो किताबें इसे खुद ही कहानियां सुनाती है .. इसे तो हर एक चीज़ कहानी सुनाती है, पेड़ो से बातें करती है, चिड़ियों से बातें करती है .. जो मिले फिर उसे भी कहानियां सुनाने लगती है.. अब बताइए पढ़ेगी नहीं डिग्रियाँ नहीं लेगी तो क्या होगा इसका भविष्य में ?.. वैसे आपका बेटा बहुत ही सिंसीयर लग रहा है। "


" जी हां! किताबी ज्ञान के अलावा मेरा बेटा कुछ बात नहीं करता .. ये खुलकर कुछ बोल ही नहीं पाता।" 

उस महिला की बातें सुनते ही ज्योति सोच में पड़ गई। क्या होता अगर प्राची भी उससे कभी बात नहीं कर पाती, या गूंगी होती? आज उसके ज्यादा बोलने से परेशान ज्योति सिहर उठी। डॉक्टर से मिलकर लौटने के बाद ज्योति को इतना समझ आ चुका था कि प्राची बिल्कुल नॉर्मल है बस उसकी एनर्जी को सही समय, सही दिशा और थोड़ा ध्यान देना होगा। थोड़े ध्यान और दूसरी एक्टिविटी से उसका संतुलन बना रहेगा।

ज्योति ने घर आकर प्राची को गले से लगा लिया।

"मेरी बच्ची, बीमार तो हम है जो जिंदगी को पत्थर और मशीनों की तरह जी रहे हैं, तुम बिलकुल ठीक हो और मैं सुनुंगी तुम्हारी कहानियां।"



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