मुलाकात
मुलाकात
मुलाकात अपनों से भी होती है, और गैरों से भी होती है। गैरों से मुलाकात करने पर अनकहे रिश्ते बन जाते हैं। और उस रिश्ते को संवारने का काम हम और आप करते हैं। जीवन के इस राह पर हम और आप कहीं भी किसी से भी टकरा जाते हैं और न जाने किस रिश्ते की शुरुआत हो जाती है। कई बार तो अपनों से ज्यादा गैर काम आ जाते हैं।
इस कहानी की शुरुआत सन् १९६० में हुई थी। दो परिवार ट्रेन में सफर कर इलाहाबाद कुंभ नहाने जा रहे थे। उन्हें इस बात की जरा सी भी भनक नहीं थी कि वह एक अनकहे रिश्ते में बंधने जा रहे थे। पूरे परिवार के साथ लोग अपने पापों का बोझ हल्का करने कुंभ आते हैं। कुंभ का आयोजन बहुत अच्छा था। लोग भगवान का नाम लेकर आगे बढ़ रहे थे। १ महीने के इस कुंभ मेले का आनंद लेने के लिए लोग अपने रिश्तेदारों और होटल में रुके हुए थे। और पुलिस प्रशासन भी अपना काम अच्छे से कर रही थी। इस भीड़ में कब क्या हो जाएं इस बात की जानकारी किसी को भी नहीं थी। कुछ दिन कुशल मंगल से बीत गए लेकिन सभी लोग आने वाले कल से अनजान थे। सुबह से लोगो का तांता नदी के किनारे लग गया नहाने के लिए अचानक हवा ने अपना रास्ता बदल दिया और नदी के किनारे जोर से बहने लगा जैसे की आंधी तूफान आ गया। लोग भागने लगे इसी भागा दौड़ी में कई लोग घायल हो गए। उन्हें तुरंत हस्पताल पहुंचाया गया । उसमें से एक बुजुर्ग महिला को काफी चोट लग गई । उन्हें तुरंत ख़ून की आवश्यकता थी। उनका खून एक व्यक्ति से मिल गया। उसने तुरंत ही उस बुजुर्ग महिला को अपना खून दिया। इस तरह से वह बुजुर्ग महिला की जान बच गई। उसके परिवार वाले धन्यवाद करने के बजाय शर्मिंदा थे। क्योंकि यह वही लोग हैं जो उन्हें ट्रेन में मिले थे। इनसे उन लोगों ने रिश्ता नहीं बनाया था क्योंकि वह लोग नीची जाति के थे और यह लोग उनके हाथ का पानी भी नहीं पीते और आज उसके लिए खून से एक बुजुर्ग महिला की जान बच गई । जो ऊंची जाति की है। इस घटना ने उन दोनों परिवारों को एक कर दिया और एक अनोखा रिश्ते की शुरुआत हुई।
