Mukul Kumar Singh

Drama


3.6  

Mukul Kumar Singh

Drama


मुझे याद है

मुझे याद है

17 mins 85 17 mins 85

मेरी उम्र छः – सात की रही होगी और दूसरी कक्षा में पढ़ता था। वैसे बचपन में बहुत उदंड भी था। कोई भी दिन ऐसा नहीं जाता था जब मेरे नाम पर घर में कोई अभीयोग न जाता हो। मेरे बड़े मामा जो एक सरकारी प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक थे परेशान रहते थे और मुझे ढुंढ़ते रहते थे। यदि वे मुझे पकड़ लेते थे तो मेरी ऐसी कुटाई करते थे कि मत पुछो। अतः मैं भी सतर्क रहता था और पकड़ने की कोशिशों को नाकाम कर दिया करता था। विद्यालय जाता था पर अपने ढंग से। अपनी कक्षा के सहपाठियों से मार-पीट, धक्के देना, किताब-कॉपियाँ फाड़ देना अपनी भी और दूसरों की भी आदि मेरी दैनिक कार्यावली थी। इसके लिए मैं दण्डित भी होता था पर दण्ड मेरी उदंडता को प्रतिशोध में बदल देता था एवं उसका शिकार सहपाठी तो होते हीं थे साथ हीं साथ मेरे शिक्षक भी हो जाया करते थे अर्थात किसी के मन में मेरे प्रति अच्छी भावना नहीं थी।

एक बात थी कि मैं घर पर कभी पढ़ने नहीं बैठता था लेकिन विद्यालय में जो मैं सुना करता था उसे मेरा मस्तिष्क लिपिबद्ध कर लेता था और खेलते समय भी सुने गये पाठों को रटता रहता था जिसे मेरे पाड़ा के लोग सुनते थे और कहा करते थे कि यदि मैं बदमाशियाँ न करूं तो एक अच्छा छात्र बन सकता हूं पर मेरी सोच थी कि जब मैं परीक्षा में पास कर हीं जाता हूं तो खेलना या शैतानियां क्युं छोड़ूं।

अतः बड़े सब क्या कह रहे हैं इससे मेरे उपर कोई प्रभाव नहीं पढ़ता था।

एक दिन मेरे हीं पाड़ा के एक व्यक्ति नाम था झिंगरु कुम्हार पेशे से जुट मिल का श्रमिक था जो उम्र में मेरे कंस मामा से भी अधिक थे। शाम के समय मैं अपने साथियों के साथ पंचास – चोर खेल रहा था। अचानक उसके कमरे के पिछवाड़े से भागते समय उसने मुझे पकड़ लिया। मैं डर गया कि आज तो यह मुझे जरुर पिटेगा, मैं अपने को छुड़ाने का भरसक प्रयास किया परन्तु असफल रहा। सो निराश तो अवश्य हुआ पर मन हीं मन निश्चय कर लिया कि ठीक है बच्चू तूं आज मुझे पिट ले पर मैं तुझे छोड़ूंगा नहीं। वह मुझे अपने कमरे में ले गया। लोगों ने देखा पर सभी खुश थे कि आज झिंगरु उसके फाड़े गये धोती का मजा अवश्य चखायेगा जो दो-तीन दिन पूर्व मेरे द्वारा ढेला चलाये जाने पर डांटा था और बदले में उसकी धोती फाड़ दी थी। झिंगरु मुझे कमरे के अन्दर ले जाकर खटिया पर बिठाया।

खटिया पर बिछावन साफ-सुथरा था और मैं तो दिन भर खेलता रहता था कपड़ों की चिंता कौन करे, हाथ-पैर गंदे। मन में केवल एक हीं बात सोच रहा था कि यह शैतान मुझे खटिया से बांध कर पिटेगा। कोई बात नहीं आज तेरी बारी कल मेरी बारी आएगी तब तुझे समझ में आएगा।

मेरे लिए आश्चर्य कि बात उस समय लगी जब झिंगरु ने न तो मुझे मारा-पिटा अपितु मुझे खाने को बिस्कूट दिया। ना-नुकुर करने लगा तो उसने कहा वह मुझे जो कहता है यदि मैं मान लूं तो मुझे मुक्त कर देगा अन्यथा मेरी पिटाई निश्चित है। मेरे सामने कोई उपाय न दिखा सो हामी भर दी। उसके बाद उसने कहा कि वह भी मेरी तरह पढ़ना-लिखना सिखना चाहता है। मेरी समझ में नहीं आई और बाल-सुलभ सोच के कारण का कि ठीक है कल मेरे साथ पाठशाला चलो, अपने सर से कहकर तुम्हारा नाम लिखवा दूंगा लेकिन मेरी बात को बीच में हीं काट दी और कहा कि उसका गुरुजी मैं बनुं। मैंने कहा कि तुम तो बुढ़े हो मैं तुम्हे कैसे सिखाउंगा। मैं तुम्हारा गुरुजी नहीं बनुंगा। अड़ गया मैं तब उसने मुझ पर ब्रह्मास्त्र रुपी प्रहार किया यदि मैं उसका गुरुजी बनना स्वीकार नहीं किया तो खटिया से बांध कर पिटेगा। अन्य कोई चारा न देखा तो कहा कि पढ़ना लिखना सिखने के लिए कॉपी-कलम की आवश्यकता पड़ेगी। वह बहुत खुश हुआ तथा मुझे मुक्त कर दिया। मैं बड़ा प्रसन्न और झिंगुर को दौड़ाई बिल्ली-झिंगुर को दौड़ाई बिल्ली कहते हुए भाग खड़ा हुआ।

अगले दिन वह मुझे खोज रहा था। मेरे घर गया तो उसे पता चला कि मैं अपने साथियों के साथ कहीं झाड़-जंगल में खेल रहा हूं। फिर वह खोजता-खोजता मेरे किसी बंधु के पास पहुंचा जिसने शरारतवश बता दिया कि मैं उसे कहां मिल सकता हूं तथा स्वयं आकर मुझसे कहा-अबे गधे, तेरा झिंगुर तुझे खोज रहा है। और मैं एकबार को डर गया क्योंकि पिछले दिन उसे झिंगुर-बिल्ली कहा था। अतः मैं वहां से भागा परन्तु कहावत है आकाश से गिरा और खजूर पर अटका अर्थात वह जिधर से आ रहा था उसी ओर मैं जा रहा था एवं रावण के हाथों पड़ हीं गया।

कल की भांति मुझे अपने घर ले गया तथा खटिया पर बिठाकर बिस्कूट खाने दिया। इसके बाद उसने कॉपी-कलम,दवात सामने रख दी। मैं उसके चेहरे की तरफ अवाक होकर देख रहा था,मन हीं मन मजा भी आ रहा था। दवात में कलम डूबोकर कॉपी के प्रथम पन्ने पर अ से लेकर ऊ तक लिखकर दिया एवं शिक्षक की भांति उसे कहा, चलो देख-देखकर लिखो। लेकिन उसने पन्ने को गंदा कर दिया एक भी वर्ण लिख नहीं पाया। मैंने पुनः उसे लिखने को दिया पर इस बार भी केवल पन्ना गंदा हुआ। ऐसा उससे तीन-चार बार किया तब एक अनुभवी शिक्षक की भांति कहा – घबड़ाओ मत। आओ मैं तुम्हे बताता हूं कैसे लिखा जाता है और उसका हाथ पकड़ कर वर्ण लिखना सिखाया। अब मैं उठना चाहता था कारण मेरा बचपन की उम्र चंचल एवं शरारती था और ज्यादा देर किसी स्थान पर देर तक टिकता नहीं था। झिंगुरी के चेहरे पर खुशियां झलक उठी। उसने कहा – गुरुजी , आप कल फिर आना। मैं आपके लिए लड्डू लाकर रखूंगा। मैं जब वहाँ से वापस साथियों से मिला और बड़े गर्व के साथ बोला कि झिंगुर ने मुझे गुरुजी कहा है।

अब मेरा यह दैनिक अभ्यास बन गया। मैं झिंगुरी के घर जाता था उसे पढ़ाता और बिस्कूट या लड्डू खाकर चला आता। धिरे-धिरे यह बात मेरे घरवालों को पता चल चुकी थी। वे लोग बड़े क्रोधित हुये मुझे लालची समझा सो इसे सुधारने का प्रयास जारी। एक दिन मेरे शिक्षक मामा मेरे पिछे – पिछे झिंगुरी के कमरे तक पहुंचा और सच्चाई का दर्शन करने के पश्चात क्रोध शांत तथा कमरे के अन्दर आ गये। मेरे चेहरे पर हवाईयां उड़ने लगी।

मामा झिंगुरी से बात करने लगे और यही उचित समय देखकर मैं भाग खड़ा हुआ। अपने साथियों को जाकर कहा कि अभी तो मैं बच गया पर रात में क्या होगा। वो शैतान अवश्य मेरा टांग तोड़ देगा। मेरे साथियों ने मुझे अभय दान दिया मैं उनमें से किसी एक के घर सो जाउं। हुआ भी यही। परन्तु अगले दिन आंख खुली तो स्वयं को घर में हीं पाया। इसके बाद उसका शिक्षक कहें या गुरुजी वह मेरे मामा बन गये थे। झिंगुरी अब कविताएं लिखने लगा तथा रामाय़ण-महाभारत के स्वरचित गाने सुनाने लगा। इस याद कि अंतिम कड़ी की परिणती बहुत हीं सुन्दर व सुखद रहा। हुआ यह कि झिंगुरी एक दिन मेरे विद्यालय पहुँचा तथा मेरे शिक्षकों के सामने मुझे ढेर सारी कॉपियां तथा एक कीमती कलम देकर कहा-आज मैं लोगों के बीच व्यासजी के नाम से जाना जाता हूं और मुझे वहाँ तक जिसने पहूंचाया वो हैं आप सबके शरारती छात्र और मेरा पैर स्पर्श करने के बाद मेरे मामा एवं अन्य सभी शिक्षकों के पैर छू कर प्रणाम किया। मुझे बड़ी शर्म आ रही थी पर मेरे मामा का सीना गर्व से फूल उठा।

जब भी कुछ अच्छी या बूरी घटना घट जाती है तो इसके साक्षात होने वाले की मनःस्थिति जीवन की उन घटनाओं को द्वारा आकलन कर हीं बैठती है जो अतित हो चुका होता है और अपने वर्तमान से अतित की तुलना करता है कि कितना उसने खोया है या पाया है।

बात एक ऐसे समय की है जब मैं सप्तम श्रेणी का छात्र था। होता क्या है कि बच्चों को घर में शरारतों, बदमाशियों से तंग आकर बड़े सदस्य भूतों,राक्षसों की डरावनी कहानियां सुनाकर उन्हे नियंत्रित रखने का प्रयास किया करते हैं। ये कहानियां नमक-मिर्च लगी बड़ी हीं रोचक बनाई जाती है जिससे बच्चों का हृदय पटल अपनी गहराई में स्थान प्रदान कर देता है एवं भविष्य में उसे डरपोक,क्रोधी,ईर्ष्यालु,स्वार्थी बना देता है। मुझे भी ऐसी कहानियां सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था पर अपनी नानी-दादी से नहीं बल्कि मेरे हीं पाड़ा के रहनेवाले लोगों से। मुझे अपनी दादी को देखने का सौभाग्य नहीं मिला बस उनके बारे में सुना था कि वह बहुत साहसी थी और हट्ठे-कट्ठे पुरुषों को भी ठोक दिया करती थी और नानी हमेशा फौजियों-सैनिकों की वीरता की कहानियाँ सुनाया करती थी जिसका असर मेरे मन में सैनिक अधिकारी बनने की प्रबल ईच्छा जगा चुकी थी। हां तो मुझे वह घटना याद है घर के बगल में हीं एक क्लब था और वहां प्रतिदिन झांसी की रानी नामक नाटक का रिहर्सल हुआ करती थी और मेरे ऐसे कई लड़कों को स्कूली छात्रों का अभिनय करने का मौका प्राप्त हुआ था। निर्धारित समय पर नाटक का मंचन हुआ। नाटक मंचन स्थल मुक्तारपुर शमशान घाट के निकट हीं था। यह स्थल हुगली नदी के किनारे बड़े-बड़े पेड़ों,झाड़ियों से घिरा हुआ था एवं पास हीं परित्यक्त धानकल जो टूट-फूटकर खंडहर में बदल गई थी,घनी झाड़ियों से ढंकी भयावह दिखती है। इसके केन्द्र स्थल में एक बड़ा सा जलाशय जो असामाजीक तत्वों को सुरक्षित आश्रय प्रदान किया। तो एक तरफ जंगलों से सटा अंत्येष्टी स्थल एवं दूसरी ओर जुटमिल के श्रमिकों के क्वार्टरें थी जिसमें दिनभर के थके श्रमिक रात को गहरी निद्रा में खटिया तोड़ा करते। खैर अपनी याद को रबर की भांति खींचकर बढ़ाने की मंशा नही है। नाटक मंचन से कुछ दिन पूर्व हीं मुख्य सड़क से मेरे घर की ओर जानेवाली सड़क के पास एक व्यक्ति की हत्या हुई थी। उसके मृत शरीर का विभत्स रुप मैंने भी देखा था, किसी धारदार छूरे से शरीर को गोद दिया गया था तथा वह स्थल भी रक्त से नहाया हुआ था। मजे की बात है कि उस रास्ते से लोगों का आना-जाना हीं बन्द हो चुका था कारण कई ऐसी घटनाएं सुनने को मिली कि उसकी आत्मा वहीं पर रात में कराहती है। यदि कोई रात को उधर से गया तो उसे बचा लेने के लिए कहती है।

ठीक इसी परिस्थिती में नाटक का मंचन चुंकि मैं भी उसमे अभिनय करुंगा तो सबके मना करने बाद भी मेरा विद्रोही-उदंडी स्वभाव नाटक में हिस्सा लेने चला गया। नाटक जब तक मंचित हुई तब तक सब कुछ ठीक-ठाक पर जब समाप्त हुआ तो मैं भी घर वापसी के लिए मुड़ा। लगभग तीन सौ मीटर की दूरी तक बिना किसी बाधा या चिन्ता के मैं चला आया। तत्पश्चात मुख्य सड़क के मोड़ तक आते-आते एकदम सन्नाटा,कुत्तों का रोना –भौंकना का बाजार पसरा था। मन में आनन्द व उत्साह की कमी आ गई,कई प्रकार के विचार उठ-गिर रहे थे। फिर भी धीरे-धीरे मोड़ के निकट आता जा रहा था। एकाएक उस ह्त्या की गई मृत शरीर का विकृत रुप आँखों के सामने घुम गया तथा उस आत्मा द्वारा लोगों को दौड़ाने की बात य़ाद आ गई। मेरा सारा शरीर सिहर उठा, कदम जमीन से चिपक गए,सांसे तेज हो पसिने से नहा उठा। मेरा सारा नाटकोनान्द की खुशियां-उत्साह ठंढी। मोड़ पर आ पहुँचा पर दायां-बायां देखने लगा क्योंकि उस मोड़ से मेरे घर की ओर जानेवाला कोई नजर नहीं आया। साहस न जाने किस कोने में जाकर छिप गया।

अतः मैंने वापस नाट्य मंचन स्थल की ओर लौट जाने का निश्चय किया। लौटकर स्वयं को सहज अनुभव किया पर यह सहजता क्षणभर में हीं मुझसे मित्रता तोड़ ली। यहां जमीन पर चट बिछी थी पर मानुष तो क्या एक कुत्ता भी नजर नहीं आया। रात के दो बज रहे होंगे। नदी के किनारे श्मशान,जंगलावृत में जगमग करता जुगनुओं का प्रकाश, चिं-ईं करती झिंगुरों के गीत तथा रह-रहकर सियारों का हुक्का-हुआ मेरे मन को विचलित कर दिया। ऐसे समय समय में मुझे लगा जैसे वह मृत शरीर मेरी ओर बढ़ता आ रहा है। भागना चाहा पर कदमों को जैसे किसी ने पकड़ लिया हो। गला सूखने लगा.सहायता के लिए चिल्लाना चाहा पर गले से आवाज न निकली। सो अपनी मृत्यु निकट आती दिखी पर मैं मरना नहीं चाहता। तभी किसी कुत्ते के भौंकने की आवाज सुनाई दी और मुझे लगा कि यहां मरने की अपेक्षा वापस लौटे,जो होगा देखा जाएगा। तो वापस फिर मुख्य सड़क की ओर अग्रसर। एक-दो-तीन-चार करते-करते पुनः उसी मोड़ पर आ मेरी गाड़ी को ब्रेक लग हीं गई। कुछ देर तक वहीं खड़ा रहा पर निर्णय नहीं कर पाया।

मैं किंकर्तव्यमूढ़ हो गया और किसी तरह साहस बटोर कर किसी दूसरे विकल्प रास्ते से जाने को सोचा और मोड़ से दाहिने तरफ जानेवाली रास्ते पर पग द्वय गतिशील हुए। दुर्भाग्य हीं कहा जाएगा अभी मैं पचास मीटर हीं जा पाया था कि मेरे पैरों ने धन्यवाद कह आगे बढ़ने का विचार त्यागना पड़ हीं गया कारण जब आपका मन दुर्बल हो जाता है तो हर बात हीं डराने लगता है। मोड़ से दांयी ओर बढ़ना शुरु किया था प्रारंभ में लगा कि अब डर नहीं लग रहा है पर अचानक एक अन्य भूतहे घटना की याद हो आई सामने हीं मुख्य सड़क पर मिलन संघ क्लब है और आठ वर्ष का लड़का बस के पहिए के नीचे आ ईहलोक को प्राप्त किया था वह आए दिन लोगों को अपना शिकार बना परेशान करता है। और मुझे लगा जैसे उस क्लब के पास मैं पहुंचा एवं मुझे अपना दोस्त बनाने के लिए किसी आती हुई गाड़ी के निचे खिंच कर ले जाएगा। और एकबार फिर मैं डर गया तथा वापसी की आशा निराशा में बदल गई। अतः मोड़ पर फिर वापस आ गया। क्या करुं-क्या न करुं की स्थिती से परेशान मुझे रोना आ रहा था। चारो ओर खाइ दिखाई दे रही थी।

मेरा उदंडी स्वभाव हर समय मुझे उल्टा सोचने को प्रेरित करता था जिसके चलते मै इसी रास्ते से जाउंगा निश्चय कर लिया जहां कई दिन पहले हत्या हुई थी। धीरे-धीरे मेरे मन को बल मिल गया तथा लोग कहते हैं भूत-भूत तो भूत को देखने का अवसर भी मिल जाएगा। मेरे दृढ़ निश्चय ने मुझे निडर बना दिया और अपने घर की ओर आगे बढ़ चला। मैं निकट से निकटतर होता जा रहा था लेकिन डर नहीं आपितु आनन्द आ रहा था कि चलो भूतों की कहानियां तो ढेर सारे सुन चुका हूं पर शायद आज भूत देखने का सौभाग्य मिले। चलते-चलते उस स्थल पर पहुंचने वाला हूं। एक आश्चर्यजनक कल्पना की तरंग हृदय को उद्वेलित कर रहा था। लेकिन मेरे उत्साह पर पानी उड़ेल दिया गया क्योंकि जहां हत्या हुई थी वहां मुझे कोई आत्मा या कोई भूत की परछाई भी नहीं दिखी। पाँच मिनट तक वहीं खड़ा रहा इस आशा में कहीं किसी कोने में छूपे होगा तो अवश्य मेरे पास पहुंचेगा पर सब बेकार। शायद मैं हीं उसके लिए भूत बन गया था।

बात उस समय की है जब मैं आठवीं की वार्षिक परीक्षा दिया था और उसके परिणाम निकलने वाले थे। वैसे मैं एकदम मेधावी छात्र तो नहीं था पर न हीं केले का तना जिसे हल्का आघात करने से हीं गिर पड़ूं। अंग्रेजी, गणित एवं भौतिक विज्ञान मुझे अच्छा लगता था। निश्चित समय पर परीक्षाफल घोषित हुई। मुझे छोड़कर मेरे सभी सहपाठी परीक्षा उत्तिर्ण हो गये। सबके चेहरे पर खुशियाँ थी जबकि मेरा चेहरा लकड़ी के चूल्हे पर चढ़ी हांड़ी। अभी होता है कि छात्र तो सभी पर उन्ही में शांत-उदंड, अनुशासित-उच्श्रृंख्ल भी रहते हैं और मैं तो उदंडी था जिससे किसी भी शिक्षक का प्रिय न था शायद उनका वश चलता तो कबके वे मुझे विद्यालय से वहिष्कृत कर देते पर मेरा परीक्षाफल सभी विषयों में संतोषजनक होता था इससे उनकी इच्छा पूर्ण नहीं होती। आज सौभाग्य ने उनको अवसर प्रदान कर दिया। मेरे कई सहपाठियों ने कहा कि तुझे स्कूल से टी.सी. दे दी जाएगी। मैं घबड़ा गया, अब मेरी खैर नहीं। मन हीं मन सोचने लगा कि इस बार तो मेरे कंस मामा मेरा कचूमर निकाल देगा, मेरी हड्डी-पसली एक करके रख देगा।

अपने स्भावानुसार घर देर से लौटा और हाथ में तीन-चार कॉपियां थी बाहर दरवाजे से हीं अन्दर फेंक दी उन कॉपियों में हीं परीक्षाफल भी थी मुझे याद न रहा और नौ-दो-ग्यारह। रात हो गई। मैंने चालाकी इतनी दिखाई कि अपने किसी बंधु को परीक्षाफल की बात नहीं बताई।      

जब आँख खुली तो देखा नानाजी नहाने-धोने की तैयारी कर रहे हैं। कुछ हीं देर बाद में उनके साथ चाय पीने जाउंगा तथा वहीं से खेलने भागुंगा। मेरी सारी शरारतों के बावजूद विद्यालय में अनुपस्थित नहीं रहता था लेकिन आज क्यूं जाऊं,क्यों जाउंगा जब मैं नौवीं कक्षा मे उठाया हीं न गया और स्कूल से वहिष्कृत भी कर दिया जाउंगा तो क्या आवशयकता है विद्यालय जाने की। फिर अन्य रातों की भाँति दूसरी भोर नानाजी के साथ चाय दुकान पर। नानाजी मुझसे कहा – कल तेरा मामा स्कूल गया था, आज भी जाएगा सो चुपचाप कॉपी – किताब लेकर इधर-उधर भागना मत और जरा बदमाशी करना छोड़ दे, देखता नहीं है तेरं कारण हमको भी बात सुनना पड़ता है। नानाजी तो मिल चले गये और मैं खेल के मैदान में। खेलूंगा क्या मामा के विद्यालय जाने के बारे में सोचकर पेट में मरोड़ उठ रही थी आज इस राक्षस से कैसे बचुंगा।

मैदान में आए साथियों से मैंने अपने मन की बात कही तो सबने अपने-अपने ढंग से परामर्श दिया पर प्रायः सबका कहना था कि पढ़ने जाना चाहिए। मरता क्या न करता विद्यालय तो पहुंचा पर बैठुंगा कहाँ मेरे सहपाठियों मे जो मेरे स्वभाव के थे वे बड़े खुश। उनके बीच मेरी सीट पक्की थी। प्रार्थना से पूर्व तक मैं निडर था पर उसके बाद एकबार फिर पेट दर्द करने लगा कि क्लास टीचर यदि मुझे निकाल दिया तब क्या होगा। मेरे चेहरे पर हवाईयां उड़ने लगी। निश्चित समय पर क्लास टीचर आये पर मुझे कुछ कहा नहीं।

मेरी घबड़ाहट छू-मंतर क्योंकि मैं जानता था कि इसके बाद कोई भी शिक्षक मेरे ऐसे बर्रे के छत्ते में हाथ नहीं डालेगा। सहपाठियों ने मुझे बताया कि तू जब तीन विषय में फेल है तो नये क्लास में भले न उठाए पर विद्यालय से वहिष्कृत नहीं किया जाएगा। सुनकर थोड़ा अच्छा लगा चलो बंधुओं का साथ तो नहीं छुटेगा। तिसरी घंटी लगी। हम सभी लोग शोर-शराबा कर रहे थे क्योंकि अभी तो परीक्षाफल निकली है,नई पुस्तकें खरीदी जाएंगी तब जाकर सही ढंग से कक्षाएं चलेगी। अतः छात्रों की शरारतों में क्यों कमी आए। कुछ देर पश्चात अचानक अंग्रेजी के शिक्षक आए। छात्रों की शांति भंग वह भी तब जब उन्होने मुझे बुलाया और कहा कि यदि तुम्हारा टेस्ट लिया जाए तो क्या पास कर जाओगे मैंने हाँ कहा तथा समय जानना चाहा। और मुझे लेकर ऑफिस गये वहां मैंने देखा हेडमास्टर के सामने मामाजी खड़े हैं उनका चेहरा शायद मेरे कारण अपमान या क्रोध से लाल एवं तीन अन्य शिक्षक कुर्सियों पर गंभीर हो बैठे थे। अंग्रेजी के शिक्षक ने हेडमास्टर से कहा – यह टेस्ट देने को तैयार है। हेडमास्टर ने पूछा कि तुम्हारे सर ने जो कहा, क्या तुम उसके लिए तैयार हो ?

- जी सर।

- यदि पास नहीं किये तो

- मैं अवश्य पास करूंगा।

- ठीक है राव जी, ले जाईए अभी हीं देख लीजिए। फिर मामा से बोले कि तुम आज घर चले जाओ। कल पैसे लेकर आ जाना, देखते हैं इस लड़के के लिए क्या किया जाय वैसे बहुत बदमाश है। मैं काशी सर के साथ दूसरे कमरे में। तब तक टिफिन की घंटी लग चुकी थी तथा मैं भी बड़े जोश-खरोश को साथ अपने साथियों से जा मिला और जमकर हुड़दंग किया।

अगले दिन की भोर की अभ्यास में कोई कमी न रखते हुए विद्यालय के लिए प्रस्थान तो किया पर मामा से भेंट नहीं की डरा हुआ था क्या पता कब उस दानव के हत्थे चढ़ जाउं। प्रार्थना के बाद अपने कक्षा में बैठा। समय पर वर्गशिक्षक आए अटेंडेन्स रजिस्टर का कार्य करके इधर-उधर की बातें करके पीरियड समाप्त दूसरी घंटी लगी। हम शैतानों का झूण्ड बाथरूम में थे एक अन्य सहपाठी आकर कहा- अबे, दरवानजी तुझे ढुंढ रहे हैं।

एकबारगी तो घबड़ाया क्योंकि मामा की आने की बात थी और उसका क्रोधी मुखमण्डल हाथ में डण्डा लिए आता हुआ दिखा। मेरे मन की बात मेरे साथियों को समझते देर नहीं लगी और मुझे ईशारे से वहीं रहने को कहा। जाते देर न वे लोग हुर्रे कहते हुए वापस उनके हाथ में केक-बिस्कूट जो चार भाग का तीन भाग उदरस्थ कर लिए थे थोड़ा सा जो बचा था मुझे दिया और कहा कि तेरा जाड़िया तुम्हे देने के लिए दे गया था। बड़ा आश्चर्य है जो केवल मुझे पिटने के चक्कर मे रहे वो केक और बिस्कुट! खैर नवमी श्रेणी में प्रवेश मिला।

मेरे जीवन की इस घटना ने मेरे भविष्य को एक नया अयाम दिया जहाँ भक्ति के स्थान पर आत्मविश्वास के साथ कर्म करने की शिक्षा दी। सरस्वती पूजा का सभी छात्रों के लिए एक अलग महत्व होता है। प्रथम श्रेणी से लेकर आठवीं तक मेरे मन में एक धारणा थी कि माँ सरस्वती विध्या की देवी है उनकी कृपा से हीं ज्ञान की प्राप्ती होती है। वार्षिक परीक्षा से दो सप्ताह पूर्व मेरी एक नानी जो धनवाद में रहती थी, निधन हो गया और मेरा मन मचल उठा धनवाद घुमने के लिए और मेरे जिद्दी स्वभाव ने मंझले मामा के साथ जाने में मदद की। जब वहां से वापस लौटा तब तक तीन विषय की परीक्षा हो चुकी थी और बाकी के चार विषयों की परीक्षा दे पाया था।

परिणाम निकलने के पूर्व हीं सरस्वती पूजा थी सो उपवास रहकर सरस्वती की पूजा – अर्चना संपन्न इस विश्वास के साथ किया जहाँ मां सरस्वती विद्या की देवी है। परीक्षा नहीं दे पाया तो क्या हुआ नवमी कक्षा में अवश्य़ नाम उठ जाएगा। पर यह मेरी भूल थी इसका ज्ञान तब मुझे मिला और एक नई राह मिली अर्थात परिश्रम हीं पूजा है तथा हमारी सफलता उसी पर निर्भर करती है।  


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