मुझे बच्चे को जन्म नहीँ देना
मुझे बच्चे को जन्म नहीँ देना
गौरी की प्रेग्नेंसी रिपोर्ट पॉज़िटिव आई थी।सुनकर अविनाशजी स्तब्ध से हो गए थे। सुनीताजी का चेहरा एकदम फक्क पड़ गया था। ये कैसे हो सकता है?
उनकी बेटी शादी के पहले मर्यादा का उल्लंघन कैसे कर सकती है? और आभास से भी ऐसी उम्मीद नहीँ की जा सकती थी।तभी नर्स ने बाहर आकर कहा कि पेशेंट अपनी माँ से मिलना चाहती है तो ज्यों ही सुनीताजी ने अंदर की ओर कदम बढ़ाया, पास में खड़ा आभास बोल उठा,
"क्या मैं भी आपके साथ अंदर जा सकता हूँ?"सुनीताजी ने आग्नेय नेत्रों से उसे घूरा और अंदर चली गईं।
अंदर बेटी का अश्रुपूरित कुम्हलाया मुँह देखकर उनका सारा क्रोध जाता रहा। प्रकट में सिर्फ इतना ही बोल पाई,
"ये तुमने क्या कर दिया बेटा! तुम्हारे और आभास की शादी को कुल चार महीने ही तो रह गए थे। और अगर तुम दोनों बोलते कि पहले शादी करना चाहते हो तो हम वह भी व्यवस्था कर देते, पर यह गर्भ? कैसे इतनी बड़ी गलती कर गई हो. अब हम सबको क्या मुँह दिखाएंगे!"बोलते बोलते क्रोध और क्षोभ से रो पड़ी सुनीताजी।
इसके पहले कि गौरी कुछ कहती, पीछे से आभास की आवाज़ आई,"आँटीजी, आप जैसा सोच रही हैं, वैसा बिल्कुल नहीँ है। ये बच्चा मेरा नहीँ है!"
"तुम्हारा नहीँ है तो फिर किसका है?"सुनीताजी ने घोर आश्चर्य जताते हुए कहा।
तब कुछ अस्फुट स्वर में गौरी और आभास ने जो बताया उसका सार ये निकला कि...
लगभग दो महीने पहले सगाई के एक सप्ताह बाद आभास और गौरी मूवी देखकर वापस आ रहे थे। एक सुनसान जगह में एक लड़का सड़क पर उनसे मदद माँगने आया तो गलती से आभास ने गाड़ी रोक दी। तभी ना जाने कहाँ से उसके चार दोस्त और आ गए और उन्होंने आभास को खूब मारकर बेहोश कर दिया और गौरी के साथ ज़बरदस्ती की। फिर भाग गए। उनका इरादा ज़बरदस्ती करने का ही था। शायद इसके पहले इस सुनसान रास्ते पर वो
और भी कई लड़कियों को अपना शिकार बना चुके थे। आज भी उन्होंने शायद आभास और गौरी को दूर से आते देखा हो या शायद थियेटर से ही उनके पीछे लग गए हों, कुछ ठीक ठीक कहा नहीँ जा सकता था।
बाद में आभास को होश आया तो गौरी दुःख और अपमान से आत्महत्या तक करने की बात करने लगी थी। आभास ने उसका ढांढस बढ़ाया और हर परिस्थिति में साथ निभाने का वादा किया। वैसे भी उनका रिश्ता इतना खोखला नहीँ था कि इतने से झझावत से टूट जाता। दोनों कॉलेज से एक दूसरे से प्रेम करते थे और अब जबकि दोनों की नौकरी लग गई थी तो दोनों के परिवार की राजामंदी से उनकी सगाई हुई थी। शादी का मुहूर्त सगाई के छः महीने बाद का निकला था। गौरी को आभास के प्यार पर पूरा विश्वास था। आभास भी विपरीत परिस्थिति में गौरी के साथ बिल्कुल ढाल बनकर खड़ा था। गौरी कुछ सोचने समझने की स्थिति में नहीँ थी इसलिए जैसे जैसे आभास बोलता जा रहा था यँत्रचालित सी वैसे ही करती जा रही थी।
आभास ने सोचा, अब इस स्थिति में घर जाने का तो सोच भी नहीं सकते थे इसलिए उसने गौरी से उसकी सहेली रितिका के बारे में जानकारी ली जो अपनी बहन के साथ रहती थी। दोनों बहनें यहाँ शहर में नौकरी करती थीं और साथ साथ रहती थीं।आभास और गौरी ने निश्चय किया कि पहले रितिका के घर जाया जाए,वहाँ फ्रेश होने के बाद आभास गौरी को उसके घर छोड़ देगा।
किसी तरह मन में अपमान का भाव और कलांत शरीर लेकर ज़ब दोनों रितिका के घर पहुँचे तब इतनी रात को उन्हें देख पहले तो वो चौंक पड़ी फिर उन्हें अंदर ले गई। वह अपनी बहन के साथ रहती थी इसलिए उन्हें इस हाल में देखकर सवाल जवाब करनेवाला कोई नहीँ था। रितिका और उसकी बहन प्रीतिका ने गौरी को बहुत साहस दिया।
दोनों बहनें उन्हें बार बार यही कहती रहीं कि पुलिस में रिपोर्ट लिखवाओ पर आभास से ज़्यादा गौरी ने इसका विरोध जताया। पढ़ी लिखी और प्रगतिशील विचार के बावजूद आभास और गौरी बदनामी से डरकर चुप रह गए। उसके बाद रितिका ने गौरी को अपने कपड़े दिए क्योंकि उन कपड़ों में गौरी हरगिज़ घर नहीँ जा सकती थी जो जगह जगह से फट गए थे।आभास और गौरी ज़ब रितिका के घर से चले, तब तक काफ़ी रात हो गई थी। गौरी को बार बार रोना आ रहा था। आक्रोश से उसका मन कर रहा था उन निःशँक बलात्कारियों को जान से मार डाले या खुद मर जाए।
ज़ब वो दोनों ज़ब घर आए तो काफ़ी रात हो गई थी। आभास और गौरी ने तय किया था कि किसीको इस हादसे के बारे में कुछ नहीँ बताएंगे।
क्यूँकि अभी आठ महीने पहले ही एक सड़क दुर्घटना में उन्होंने अपना बेटा खोया था जो गौरी से छोटा था। दिल के मरीज़ उसके पापा लगातार दो सदमा बर्दाश्त करने की स्थिति में बिल्कुल नहीँ थे।और माँ से कुछ भी कहने का मतलब वो सब पापा को बता देती थी। इसलिए गौरी को अपना दर्द किसीसे बाँटने की हिम्मत नहीं पड़ी।
दिन गुजर रहे थे और गौरी की व्यस्तता भी। उन दोनों को इसके पहले ही उन्हें बिल्कुल भी अंदाजा नहीँ था कि उस बलात्कार के दुष्परिणाम से गौरी प्रेग्नेंट हो जाएगी।उस दिन की घटना के बाद भी आभास के प्रेम और गौरी के प्रति उसके व्यवहार में कोई कमी नहीं आई थी। उल्टा वो खुद को दोषी मान रहा था कि उसकी असावधानी की वज़ह से गौरी के साथ यह दुर्घटना घट गई। अगर वो उस दिन शॉर्टकट के चक्कर में सुनसान रास्ता नहीं चुनता तो गौरी के साथ ये हादसा ना हुआ होता।
इतना सुनते सुनते सुनीताजी को याद आया, एक रात आभास और गौरी मूवी देखकर काफ़ी रात गए घर आए थे,और उन्होंने इतनी रात तक गौरी के आभास के साथ बाहर रहने पर डांट भी लगाई थी। उन्होंने तो गौरी को यहाँ तक भी कह दिया था कि उसकी ऐसी हरकतों से उसकी शादी स्थगित हो सकती है। पर बदले में गौरी कुछ जवाब देने के बजाए उन्हें खाली खाली आँखों से देखती रह गई थी।आज यह याद करके सुनीताजी का हृदय आर्तनाद कर उठा था।
"ओह...मेरी बेटी उस रात इतना कुछ सहकर आई थी औरमैं उसे गले से लगाकर सांत्वना के दो बोल भी नहीँ बोल पाई। उल्टा उसे डांट भी दिया था!"
उन्होंने अपनी भर आई आँखों को पोछा और गौरी को अपने से चिपटा लिया।और गौरी जो ना जाने कबसे उस हादसे का दंश अकेले झेल रही थी। माँ का संबल पाकर रो पड़ी।आभास ने आगे कहना जारी रखा कि उन्हें बिल्कुल नहीँ पता था कि उस घटना का दुष्परिणाम ऐसा होगा।आज भी शायद यह बात नहीँ खुलती अगर गौरी बेहोश होकर ना गिरी होती।
हुआ ये था कि, इधर कुछ दिनों से गौरी को कुछ खाने का मन नहीँ करता और अलसाई सी भी रहती थी। साथ ही ऑफिस में महीने के आखिरी दिनों में कुछ ज़्यादा ही काम हो जाता था। इसलिए रात जाग जागकर प्रेजेन्टेशन और रिपोर्ट वगैरह बनाना लगा ही हुआ था। इसलिए कभी कभी जी मिचलाने और आलस्य को उसने काम की अधिकता ही समझा।इसी काम के उहापोह में इसबार गौरी के पीरियड्स भी मिस हो गए थे जिसका उसको ध्यान ही नहीँ रहा था।
आज शनिवार थी और गौरी के ऑफिस की छुट्टी भी थी। अभी नहाने जा ही रही थी कि उसे बहुत ज़ोर का चक़्कर आया और वो डाइनिंग टेबल के पास ही गिर पड़ी। अचानक गिरी थी इसलिए टेबल के किनारे से चोट लग गई थी और खून बहने लगा था।तभी घबराकर गौरी के मम्मी पापा, सुनीताजी और अविनाशजी उसे हॉस्पिटल लेकर आए थे।अविनाशजी ने रास्ते में आभास को भी फ़ोन कर दिया था और वो भी हड़बड़ाकर जल्दी चला आया था।
वो लोग तो गौरी के सर की चोट का ड्रेसिंग वगैरह करवाने आए थे। यहाँ डॉक्टर को गौरी की कमज़ोरी और नब्ज देखकर कुछ अंदेशा हुआ तो उन्होंने गौरी का यूरिन सैम्पल लेकर टेस्ट किया तो
गौरी की प्रेग्नेंसी रिपोर्ट पॉजिटिव आई थी।
उनकी अनब्याही बेटी प्रग्नेंट है, यह सुनकर सुनीताजी को चक्कर सा आ गया था।और अब आभास के मुँह से सारी घटना सुनकर सुनीताजी का दिमाग ख़राब हो गया था। उन्होंने फिर अविनाशजी को बुलाया और सारी बातें बताई तो उनकी भी हालत ख़राब हो गई।एक पिता के लिए भी यह एक बेहद दुःखद बात थी कि उनकी बेटी बलात्कार का शिकार हुई थी और अब उसके दुष्परिणाम स्वरुप गर्भवती भी थी।आभास कह रहा था कि वह अब भी गौरी से ही शादी करेगा। हाँ, इस बच्चे को जन्म देना है या नहीँ, ये निर्णय गौरी का होगा।तभी गौरी ने एक वज़नदार बात कहकर सबको चकित कर दिया।
उसने कहा, वो गर्भपात कराना चाहती है। क्योंकि बलात्कार की त्रासदी से जन्मे इस बच्चे को वह ज़न्म नहीँ देना चाहती और ज़ब ज़ब उसका मुँह देखेगी उसे उस बच्चे से नफ़रत होगी। इसलिए यह जानते हुए भी कि गर्भपात उचित नहीँ वह गर्भपात करवाएगी।माँ कब बनना है, बनना है कि नहीं ये अधिकार कानूनी तौर पर स्त्रियों का है। इसलिए गौरी अपने इस अधिकार का प्रयोग करते हुए गर्भपात ज़रूर कराना चाहेगी।सबने गौरी की बात का समर्थन किया।और गौरी ने एबोर्शन करवा लिया।
इसके बाद अविनाशजी और सुनीताजी ने देर से ही सही पर गौरी और आभास को मानसिक रूप से तैयार करवाया कि पुलिस में रिपोर्ट करें।इस बीच अपराधियों के शिनाख्त के लिए गौरी और आभास को कई बार पुलिस चौकी और कोर्ट भी जाना पड़ा। पर अपराधियों की पहचान हो गई ।काफ़ी दिनों बाद ज़ब वो अपराधी पकड़े गए तब गौरी के दग्द्ध कलेज़े को थोड़ी ठंढक मिली।
चार महीने बाद ज़ब गौरी और आभास की शादी हो रही थी तब तक वो दोनों इस हादसे से काफ़ी हद तक उबर चुके थे।शादी के दो साल बाद गौरी एक बार फिर अपना प्रेग्नेंसी रिपोर्ट का इंतजार कर रही थी।और एक बार फिर उसकी प्रेग्नेंसी रिपोर्ट पॉज़िटिव आई थी।इसबार आनेवाला बच्चा शर्मिंदगी नहीँ बल्कि ढेर सारी खुशियाँ लेकर आ रहा था
