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मस्जिद की तामीर के लिये

मस्जिद की तामीर के लिये

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मौलवी साहब की उम्र मेरे ही बराबर रही होगी, लगभग बीस साल. वो मेरे मुहल्ले में बच्चों को उर्दू-अरबी की तालीम देने आते थे. लेकिन कुछ ही दिन तालीम देने के बाद वो चले गये. अब कभी-कभी मुझसे मिलने आ जाते थे. चूँकि मैं भी घर से बाहर ही रहता हूँ, इसलिये वो पता करते रहते थे कि मैं घर कब आ रहा हूँ. और इस बार ईद पे उनसे मुलाक़ात हो गयी.
ईद की मुबारकबाद देने के बाद उन्होंने कहा, “चलिए चाट खाते हैं.”
पैसे देने के लिये जब मैं अपनी जेब में हाथ डालने लगा, तो वो बोले, “बबलू भाई! पैसा हम देंगे.”
मैंने कहा, “किस ख़ुशी में?” तो उन्होंने कहा, “ख़ुशी क्या बतायें, बस हम देंगे.”
मैं जानता था कि ये वही मौलवी साहब हैं जो मेरे मुहल्ले में बच्चों को तालीम देते थे. हर घर से पचास रुपया महीना पाते थे, और बारी-बारी से पूरे मुहल्ले में खाते थे. इनके रहने का इंतज़ाम  भी मुहल्ले में ही कर दिया गया था.
मैंने सोचा, “इनके पास तो ज़्यादा पैसे वैसे भी नहीं रहते होंगे, इसलिये क्या परेशान करूँ, पैसे मैं ही दे देता हूँ.” लेकिन जब वो कुछ ज़्यादा ही ज़िद करने लगे तो मैंने कहा, “चलिए, इतनी ही ख़्वाहिश है, तो दे दीजिए.”
चाट वाले को चार रुपये देने के लिये, जब उन्होंने अपनी जेब से पैसे निकाले, तो मैं तो हैरान रह गया, और मेरे मुँह से अचानक निकल गया, “अरे वाह! आप तो पूरी गड्डी लिये हुए हैं.”“बबलू भाई! इस महीने हमने कुल तेरह हज़ार रुपये कमाये हैं
“वो कैसे?”
“मस्जिद में इमामत करते हैं, सुबह दो ट्यूशन करते हैं, और रसीद काटे हैं.”
“ये रसीद किस चीज़ की?”
“मस्जिद की.”
“मस्जिद की, मतलब?”
“देखिए, आधा पैसा कमीशन मिलता है.”
“ज़रा खुलके बताइए.”
“देखिए बबलू भाई! जैसे आप जौनपुर के हैं, और बनारस से चन्दा इकट्ठा करके लाते हैं, रसीद काटते हैं, तो आपको आधा पैसा कमीशन मिलता है. और अगर मस्जिद जौनपुर की ही रहेगी तो आपको कुछ नहीं मिलेगा. देखते नहीं हैं, इसीलिये लोग बहुत दूर-दूर से चन्दा माँगने आते हैं.”
“तो आप कहाँ-कहाँ से चन्दा लेने गये?”
“हम तो बनारस से कुछ काटे हैं, कुछ अपने घर बिहार से भी रसीद काटे हैं. ऐसे ही बारह-तेरह हज़ार मिल गये.”
इतनी बातें करने के बाद, या कह लीजिए कि होने के बाद, मेरे अन्दर इतनी हिम्मत न बच सकी कि मैं और बातें कर सकता. मैंने मौलवी साहब से कहा, “चलिए आपको ऑटो में बैठा देते हैं.”
ऑटो में बैठकर जाते वक़्त मौलवी साहब ये कह गये कि, “दुआ में याद रखिएगा.”
मौलवी साहब के गये हुए आज दस दिन हो गये हैं. मौलवी साहब सिर्फ़ याद ही नहीं आते हैं, परेशान भी करते हैं. याद वो इसलिये आते हैं क्योंकि एक अजीब सा सच मुझे बता गये हैं. और परेशान इसलिये करते हैं क्योंकि आम आदमी की जेब से ‘मस्जिद की तामीर’ के नाम पर पैसा लेने वाले मुल्ला-मौलवी आधा पैसा अपनी जेब में डाल लेते हैं.
अब मैं इस कशमकश में हूँ कि मौलवी साहब के लिये क्या दुआ करूँ? ये कि, “या ख़ुदा! मौलवी साहब की रोज़ी-रोटी में बरकत अता फ़रमा...” या ये कि, “ऐ ख़ुदा! अपने मुसलमान बन्दों को इन तथाकथित मक्कार मुल्ला-मौलवियों से बचा ले...”


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