मृगतृष्णा
मृगतृष्णा
सुबह के पांच बज रहे होंगे। रेलगाड़ी अपने निर्धारित समय पर नयी दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुँच चुकी थी।
सुमंत पहले से उतरने को अपना सामान समेट चुका था, सामान में उसके पास वैसे भी था ही क्या? एक कपड़े की बड़ी सी गठरी और एक प्लास्टिक का झोला..... जिसमें चलते समय माँ ने खाने पीने का कुछ सामान रख दिया था, इस हिदायत के साथ कि रास्ते में भूखे नहीं सोना है। गठरी में उसके दो जोड़ी कपडे और चाचा जी के परिवार के लिए कुछ ताज़े अमरुद माँ ने रख दिए थे। किसी के यहाँ खाली हाथ जाते हुए शोभा नहीं देता।
जब से चाचाजी ने उसे दिल्ली बुलाया तब से लेकर अब तक वह शहर की हज़ारों तरह की कल्पनाएं कर चूका था।" नौकरी मिल जाएगी, फिर एक छोटा सा कमरा ले लूंगा, फिर माँ को बुला लूंगा ...." ऐसी ही न मालूम कितने ही सपने।
स्टेशन पर उतरते ही सुमंत अप्रतिभ सा चारों ओर देखता रह गया। इतनी भीड़ उसने अपने जीवन में कभी नहीं देखी थी। मनुष्यों का समुद्र जैसे स्टेशन से बाहर लहर की भांति बहती जा रही हो। सुमंत भी अपनी गठरी को सम्हाले हुए उस लहर का हिस्सा बन गया। स्टेशन से बाहर आकर उसने कुर्ते की जेब से अपने चाचाजी के घर का पता लिखी हुई पर्ची को फिर से निकाल कर देखा जिसे वह सारे रास्ते कितनी ही बार देख चुका था।
सुमंत के चाचाजी दिल्ली में एक बड़े सरकारी मुलाज़िम थे। बचपन से ही मेधावी छात्र रहे थे, परिवार के समक्ष विकट आर्थिक परिस्थितियों से जूझते हुए भी अपनी मेहनत और हौसले की बदौलत उन्होंने सरकारी नौकरी हासिल की थी और सारे गाँव के लिए वह एक प्रेरणाश्रोत की तरह थे।।
पिछली बार जब चाचाजी सुमंत के पिता की मृत्यु पर शोक संवेदना व्यक्त करने गाँव आये थे। तब सुमंत की माँ ने अपना आँचल फैला कर रोते हुए उनसे सुमंत को अपनी छत्रछाया में लेने की गुहार लगाई थी ताकि उसकी जिंदगी को कोई आसरा मिल जाय। प्रत्युत्तर में चाचाजी ने सुमंत को दिल्ली आने हेतु कहा था।
स्टेशन से बाहर आते ही सुमंत ने पब्लिक टेलीफ़ोन बूथ से चाचाजी को फ़ोन किया परन्तु रिंग बजती रही कोई प्रत्युत्तर नहीं आया। दो-तीन बार कॉल करने पर भी जब कोई जवाब नहीं मिला तो हार कर उसने किसी रिक्शेवाले की मदद से उस दिए गए घर के पते पर जाने का निश्चय किया।
अनजान शहर में यह उसके लिए बहुत ही मुश्किल काम था, बड़ी ही कठिनाई के बाद दो तीन रिक्शा बदल कर वह उस दिए हुए पते पर पंहुचा, जिस घर का उसे पता दिया गया था। घर क्या था, अनेक सरकारी क्वार्टरों की श्रृंखला में से एक था। धड़कते दिल से उसने दरवाजा खटखटाया। थोड़ी ही देर में अंदर से एक प्रौढ़ा निकली "क्या बात है? किससे काम है?" ---- सन्देश की नज़रों से उसे घूरते हुए उसने सुमंत से पूछा, सामने एक अपरिचित को देख बौखलाया सा सुमंत पहले तो समझ ही नहीं पाया की वह क्या जवाब दे....प्रौढ़ा का सन्देश और गहरा हो गया। " बताते हो कि बुलाऊँ सिक्योरिटी को?" -- इस बार प्रौढ़ा ने कर्कश लहज़े में कहा।
"जी।। वो लाल साहेब यहाँ रहते हैं? हम उनके गाँव से आये हैं" --- लड़खड़ाती सी आवाज में उसने कहा।
अब वह प्रौढ़ा थोड़ी सी आश्वस्त हुई, थोड़े से कोमल लहज़े में कहा -- " रहते तो थे यहाँ लेकिन छह महीने पहले उनकी बदली हो गयी।
"अब कहाँ रहते हैं?"
"ये तो नहीं मालूम, क्यों? तुम्हें उन्होंने अपने नए घर का पता नहीं दिया"?
सुमंत ने कुछ कहना चाहा लेकिन आवाज उसके गले में ही कही फंसी हुई रह गयी।
