मर्द वाला अबॉर्शन
मर्द वाला अबॉर्शन
रोते-रोते लाल हो चुकी आँखों के आँसू पोंछते-पोंछते आखिरकार नलिन ने लैपटॉप ऑन कर लिया। वो चुप होने की कोशिश तो कर रहा था, पर दर्द इतना ज्यादा था कि की-बोर्ड पर दो-तीन बूँदों की धार बिखर ही गयी। काफ़ी देर से वो कोशिश कर रहा था कि कुछ करके एक बार आशिमा से उसकी बात हो जाये, पर न जाने ये कैसा गुस्सा था कि उसने तो मोबाइल के हर एक ऐप से नलिन को ब्लॉक कर दिया था। अब नलिन के पास बस एक ही तरीका बचा था कि अपने मन की हर बात, दिल का हर दर्द लिखकर आशिमा को मेल कर दे। बस वही जुगत जारी थी और नलिन की उंगलियां की-बोर्ड पर पूरी रफ़्तार से दौड़ पड़ी थीं-
"ज़िन्दगी में तो हमेशा ही कुछ न कुछ दर्द मिलते ही रहे। जिनको झेल लिया, उन पर दर्द के आँसू पीकर रह गया। जिनको नहीं झेल पाया, उन पर फूट-फूट कर रो लिया। पर आज पहली बार रो रहा था, तो समझ ही नहीं आया, किस वजह से रो रहा था!
हम दोनों के बीच जो पति-पत्नी का रिश्ता है, उसको ही इतनी अहमियत दी है कि आप परेशान होती हैं, तो उसका दर्द मुझे होता है और अक्सर आपके दर्द से मेरी आँखों में बूँदें आ जाती हैं। वरना, आप ही बताइए, आपको कुछ भी हो, आपके साथ कुछ भी हो, उसमें मेरा भला ऐसा क्या बिगड़ता है कि मेरी आँखें बस आपके दर्द के लिहाज से नम हो जाएं! पर ये हमारे बीच का प्यार है, कि जरूर हाँ, हर बार ही मेरी ही तरफ़ से कुछ न कुछ ऐसा हो जाता है कि आपको वो नाराज़गी दिखानी पड़ती है। मैं समझ जाता हूँ और अपनी गलती मानकर पछतावे में रो पड़ता हूँ। आखिर यही तो तरीका है जिससे इंसान को बेहतर होने के लिए सबक मिलता है।
पर आज तो जो भी हुआ, उस पर मैं कई बार रोया, पर एक बार भी रोने की वजह ही नहीं समझ आयी।
ऐसा भला कैसे हो गया कि कोई आपकी जिंदगी में आकर, सात-आठ महीने में आपको सबसे अच्छे से समझ गया... और हम अपनी हर जी-तोड़ कोशिश के बावजूद अपनी इतने सालों की ज़िंदगी में न ही किसी और को समझ पाये और न ही आपको समझ पाये!
मैं और क्या कहूँ, क्योंकि मैंने तो हमेशा ही सबकुछ किया। सबको समझने की अपनी तरफ़ से हर कोशिश की। हाँ, पर एक सच अब मुझे महसूस हो रहा है... मैंने तो सबको समझ लिया, पर कभी किसी ने मुझको समझने की कोई ज़रूरत ही नहीं समझी।
पिछले साल की ही बात है, आपको लगा, हमारे बीच बच्चा नहीं आना चाहिए और आपने तुरंत फैसला लेकर अबॉर्शन करा लिया। फिर एक साल में ही आपको बच्चे की इतनी जल्दी हुई कि आपने क्या-क्या तरीका अपना डाला, शायद मुझे भी नहीं पता। और आज हमारी छोटी सी जो बेटी है, वो तो बस नाम के लिए ही हम दोनों की बेटी बनकर रह गयी है।
वैसे, उस नन्ही सी जान को तो अभी पता ही नहीं कि पापा क्या चीज़ होते हैं, तो वो जितनी बार भी रोयी होगी, उसे कतई, कोई भी फ़र्क नहीं पड़ा होगा कि कौन उससे बात कर रहा है, कौन उसको देख रहा है, कौन उसको चुप करा रहा है, कौन उसको खिला रहा है! पर मैं तो महसूस कर ही सकता हूँ कि आपको जो पल-दो पल को लगा कि मैं आपको थोड़ी सी कम अहमियत दे रहा हूँ, आपने फ़ैसला ही सुना डाला कि आपकी ज़िंदगी में मेरी क्या अहमियत अब रह गयी है! आपकी ज़िंदगी से और आपके हर कॉन्टैक्ट से... हर जगह से ब्लॉक!
सच कहूँ, अक्सर बहुत कुछ, बहुत तरह का, बहुत तरीके से महसूस हुआ, पर इतना बुरा शायद पहले कभी नहीं लगा, क्योंकि इसमें हमारी बेटी की तो कोई भी गलती नहीं है, जो उसे इतने घण्टों मेरे सामने आने की इजाज़त ही नहीं मिली। सच, आज लग रहा है, पहली बार किसी मर्द का अबॉर्शन हुआ है...! सच में.. मेरा अबॉर्शन!"
लिखते-लिखते नलिन ने एक लंबी साँस खींचने की कोशिश की, जैसे वो साँस ले नहीं पा रहा था। पर वो इस कोशिश में भी ज़रूरी साँस ले नहीं पाया, क्योंकि शायद अबॉर्शन का दर्द बहुत ज्यादा था और उसका दर्द और बड़ी थकान से टूटा हुआ जिस्म बिल्कुल बेजान तने की तरह एक ओर को लुढ़क गया।
