मोह के धागे
मोह के धागे
बदनाम गलियों के गुमनाम अंधेरे में यश न जाने कहाँ खो गया था। वह यश जो एक सुंदर बांका गबरु था। ऊँचा कद काठ, 6फुट 6इंच, छैल छबीला !! न जाने कहाँ!!
16 साल की मेघना मासूम सी, भोली भाली, चतुर चंचल, बड़ी-बड़ी आँखें ,हिरणी सी चाल और सबसे बड़ी बात यह थी कि वह घर के सभी कार्यों में दक्ष थी।वह तीन बहन भाई थे। मंझली मेघना सबकी चहेती थी। कोई काम ऐसा नहीं था जो वह न कर पाये। माँ- बाप ने भी उसे अपने बेटे से बढ़कर प्यार किया था क्योंकि उनका पुत्र मृदुल जन्म से ही पीलिया का शिकार हो गया था, जिस कारण उसकी एक टाँग बेकार हो गई थी और मृदुल पर अपाहिज का ठप्पा लग गया था। मेघना के पिता प्राइवेट नौकर थे, एक दफ्तर में चपरासी की नौकरी करते थे। ज़मीन जायदाद नहीं थी। पत्नी भी अधिक पढ़ी-लिखी नहीं, मात्र आठवीं पास थी। महँगाई के जमाने में भी जहाँ मेघना की बड़ी बहन पारुल के पैदा होने पर अपनी हैसियत अनुसार उसके पिता दीनानाथ ने खूब जश्न मनाया था, वहीं मेघना के पैदा होने पर दो-दो बेटियाँ जन्मी, टैस्ट करवा लेते, गिरा देते भ्रूण ,न जाने क्या क्या सुना था मेघना के माता-पिता ने। बिरादरी ने तो यहाँ तक कह दिया कि दीनानाथ तुमसे बेटा नहीं होता तो हम हैं......क्या गुजरी होगी,बेचारे दीनानाथ पर !!उन्होंने अपने भीतर जलते अलाव को कैसे तैसे सरकारी अस्पताल के हाल में कोने में पड़े फोल्डिंग बैड पर पड़ी पत्नी मालती और नन्हीं सी मेघना को देखकर शांत किया।
खैर ,लोग तो कहेंगें ही, उनको आनंद आता है --राई को पर्वत बनाने में, जली कटी सुनाने में !! हरेक व्यक्ति दूसरों को दबाना चाहता है, उसकी ख़ुशियाँ को मातम में बदलना चाहता हैं । कोई किसी की तारीफ तो कभी नहीं करेगा, समस्या को सुलझाने नहीं वरन् बढ़ाने को ही आतुर रहता है। बल्कि ऊलजुलूल हरकतें करना आधुनिकता में मानवीय प्रकृति बनती जा रही है।
"तुम चिंता मत करो, ईश्वर के घर देर है,अंधेर नहीं।"
दीनानाथ ने पत्नी मालती को मेघना के होने पर ढाँढस बँधाते हुये कहा।
दो वर्ष बाद आज मृदुल अस्पताल के उसी हाल में कोने के बैड पर मालती की गोद में है। मेघना और पारुल पास खड़ी हैं। फर्क बस इतना कि आज मालती जीवित नहीं है बल्कि एक लाश बन चुकी है। ज्यों ही नर्स से मालती को पता चला कि उसका पुत्र अपाहिज है तो उस पर पहाड़ टूट पड़ा। उसकी साँसे थम गई। आज भी बिरादरी लाश के पास खड़ी ताने मार रही दीनानाथ को ! कोई तो काम ढंग से कर लेते! अब पालो दो-दो बेटियाँ और अपाहिज पुत्र!! हम लोगों से भूल कर भी कुछ माँगने मत आना। कहकर बिरादरी के लोग और सगे संबंधी पल्ला झाड़ते हुये धीरे-धीरे खिसक गये।
"ईश्वर भी उन्हीं को औलाद देता है, जिनके पास पालन पोषण की क्षमता तो होती है ,पर सुविधाएँ नहीं । दूसरी ओर ऐसे लोगों की भी कमी नहीं जिनको संतान प्राप्ति हेतु दर-ब-दर भटकना पड़ता है।"
दीनानाथ की बरसों की संजोयी हिम्मत क्षण भर में टूट गई। मासूम दो बच्चियाँ और नन्हा अपाहिज मृदुल गोद में लेकर दीनानाथ चल पड़ा, पत्नी को अस्पताल के मुर्दाघर के हवाले करके! छः साल की मेघना नौ साल की पारुल से तेज़ थी। बोली, "पापा ,मम्मी ,मर गई। अच्छा हुआ। एक की रोटी बच जायेगी।"आँसू सनी आँखें छिपाते हुये मृदुल को नन्हे हाथों में लेकर बोली,"मेरा मुन्ना, माँ दूर, माँ दूर!! मेघना की बातें दीनानाथ का दिल छलनी कर गईं। दीनानाथ ने आसमान में छाये बादलों से झाँकते सूर्य को देखकर कहा,"आज से मेघना तुम मेरा सूरज हो!
उस दिन से लेकर मेघना ने किसी की परवाह न करते हुये पिता के कंधे से कंधा मिलाकर साथ दिया। दीनानाथ बूढ़ा होने लगा और बच्चियाँ जवान।
आज पारुल एम एस सी मैडिकल साइंस की पढ़ाई पूरी कर चुकी है। मृदुल पढ़ाई में औसत विद्यार्थी था, वह बारहवीं कक्षा के बाद अब मकैनिकल का कोर्स कर रहा और मेघना, किसी को कुछ पता नहीं क्योंकि मेघना ने अपने बारे में न तो कभी कुछ सोचा और न ही कोई था जो उसे पूछता कि वह क्या कर रही है।मेघना ने भी बारहवीं कक्षा पास की थी और इस के साथ साथ वह बिन ब्याही माँ बनकर घर की जिम्मेदारी संभालती रही। अपनी पढ़ाई पर ध्यान देने से अधिक उसे ख्याल रहता था--- दो वक्त की रोटी,अपाहिज भाई का इलाज और पढ़ाई, एवं बड़ी बहन को ऊँचे रुतबे पर देखने की लालसा।
आज 32 साल की हो गई मेघना !! आज भी उसे याद है कि कैसे यश ने 16 साल की बाली उम्र में उसकी जिन्दगी में प्रवेश किया था। रात के नौ बज रहे थे।तेज बारिश हो रही थी। बीमार पिता के लिये दवाई लेने गई मेघना को कैम्सिट शॉप पर 24 साल का यश मिला था। वहाँ यश के सिवा और कोई नहीं था।मेघना के बिंदास अंदाज़ पर यश फिदा हो गया।
"मैंने डॉक्टरी की पढ़ाई की हुयी है , यह दवा सही रहेगी आपके पिता जी के लिये!" यश ने कहा।
"बेरोजगारी बहुत है, कोई नौकरी कहाँ बगैर रिश्वत के मिलती है। बस, यही सोचकर यह दुकान खोल ली।"
यश की बातों में सच्चाई सी लगी मेघना को!!
पहली बार ही यश को देखकर उसे अपनापन सा लगा। बिना सोचे समझे परेशान मेघना ने यश के हाथों से दवाई ले ली और बारिश में चल पड़ी मन में हो रही हलचल के संग!!
पहली मुलाकात न जाने कब रोज-रोज की मुलाकातों में बदल गई। यूँ तो मेघना बिंदास थी,चालाक थी, चुस्त थी पर कोई उससे भी अधिक चालाक हो सकता, यह उसने कभी सोचा न था। वह भी यश....जिसे वह पारिवारिक सदस्य समझने लग गई थी।
वह बिना पैसे लिये मेघना से सप्ताह में दो बार पिता की दवाई देने के बहाने आने लगा। मृदुल अपाहिज होने के कारण अक्सर कमरे में ही रहता था। पारुल कभी कभार घर मिल जाती थी उसे पारुल जितनी रुपवती थी, मेघना उतनी गुणवती! मेघना वैसे भी यश से उम्र में छोटी थी और पारुल हम उम्र!! एक दिन यश घर आया। मेघना घर नहीं थी। पिता दीनानाथ जो कि अक्सर बीमार रहते थे, बिस्तर पर अधमरे लेटे हुये थे। जिस दिन से यश दवाई दे रहा था, तबसे वह कुछ अधिक बिस्तर पर लेटे रहना पसंद करते थे। पारुल किचन में थी। यश ने पारुल को जब पीछे से देखा तो वह अपनी मर्यादा भूल गया। वह यह भी भूल गया कि वह मेघना को शादी करने का वचन भी दे चुका है
अरे यश ! क्या सोच रहा है, मौका अच्छा है, वैसे भी मेघना को क्या पता चलेगा, वह कौन सी घर में है ,स्वयं से बात करते हुये यश ने किचन का दरवाज़ा बंद कर दिया। उसने धीरे से पारुल के मुँह पर हाथ रखकर उसे बाँहों में भर लिया। जवानी की दहलीज पर खड़ी पारुल भी मन में यश को चाहती थी, पर आज इस तरह से उसकी छुअन पाकर वह भी निढाल हो गई !!
"मैं पिताजी से बात करूँगी कि वह हम दोनो की शादी करवा दें!" अपने अस्त-व्यस्त कपड़ों को सही करते हुये पारुल बोली।
"हाँ हाँ, खूब मज़ा आया! बोल, कितने रुपये दे दूँ!"
जल्दी बोल,मे री मेघना आती होगी!!
अभी पारुल कुछ कह पाती, दरवाज़े पर मेघना की आवाज़ सुनकर पारुल ने सलवार कमीज की सिलवटें सही करके शीघ्र दुपट्टा ओढ़ लिया। एक व्यंग्य हँसी बिखेरता हुआ यश पारुल की ओर देखता-देखता मेघना की पीठ थपथपाते कहता है, कब से तुम्हारा इंतज़ार कर रहा था, कहाँ गई थी, जल्दी में हूँ ,शाम को मिलना मुझे कैम्सिट शॉप पर!! जान कर भी अनजान बन गई मेघना, अपने मन को मारकर पारुल की उम्र ,खुशी और यश के प्रति बढ़ता लगाव देखकर मेघना ने कहा, "पारुल दीदी, आपको यश कैसा लगता है ! पिता जी से बात करूँ,आपकी शादी की!अच्छा लड़का है ,अच्छी खासी कमाई है। मृदुल को भी लगाव है उससे!!"
मेघना के यह शब्द पारुल की छाती में गहरे धँसते जा रहे थे!! आज पारुल समझ गई थी कि 16 साल की मेघना इतनी जल्दी सयानी कैसे हो गई थी। किन हालातों का सामना करके वह घर चला रही थी। क्यों वह रात देर से घर आती थी। पारुल के मन में जहाँ यश के प्रति घृणा भर गई थी वहीं उसे मेघना के आहत हृदय एवं तार-तार हुये मासूम जिस्म पर यश की घिनौनी छुअन के धूमिल दाग साफ-साफ नजर आ रहे थे। पिता की लंबी बीमारी से मृत्यु हो गई ,दवा के रुप में मौत का सामान जो परोसा था यश ने!! अपने विश्वास और समर्पण से अपना सब कुछ खो चुकी पारुल आज ब्याहता थी, कहने को किसी और की ,महज यश के पहले मिलन की निशानी को कोख में बचाये रखने हेतु शादी की रात ही अपने पति को पारुल ने सब बता दिया था और उसके पति ने इस कटु सत्य को स्वीकार भी कर लिया था। पुरुष तो कन्नी कतराकर निकल जाता है चुपचाप ,एक माँ, एक नारी , खुद को मार सकती है चाहे, पर किसी नन्ही जान की हत्या नहीं कर सकती। क्योंकि माँ तो माँ है, पारुल ने यही सीखा था, बहन मेघना से!!
पारुल के विवाह के बाद मृदुल की भी घर गृहस्थी बस गई। यश को नशे की दवा बेचने के जुर्म में सज़ा हो गई। यश के साथ बाली उम्र में अनजाने में बने संबंधों को जीती भोगती हुयी अकेली बैठी मेघना खोज रही थी ,यश को अतीत के झरोखों से ,मगर उसे क्या पता था कि एक यश उसकी बहन की कोख में पल रहा है!
