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Sheel Nigam

Inspirational


4.1  

Sheel Nigam

Inspirational


मंज़िल की ओर

मंज़िल की ओर

11 mins 266 11 mins 266

"निकल बाहर, ...कहीं की... की औलाद। जा अपने यार के पास,वापस न आना यहाँ। " कहते हुए महेश ने निम्मी को दरवाज़े से बाहर  धकेला और दरवाज़ा अन्दर से बंद कर लिया। 

माथे से बहते खून को साड़ी के पल्लू से पोंछती हुई निम्मी दहलीज़ पर बैठ गयी।उसका आँचल दूध से भीग रहा था। पर उसकी दुधमुँही बेटी उसकी गोद में न थी। पता नहीं कहाँ बेच आया था उसे महेश। आज इसी बात को लेकर जबरदस्त झगड़ा हुआ था दोनों में, नशे की लत थी उसे,पैसा पास में न होने पर वो कुछ भी कर सकता था।किसी की जान भी ले सकता था। महेश की गालियों की तो वह आदी हो चुकी थी पर उसे यह कतई उम्मीद नहीं थी कि महेश इतनी नीचता पर उतर आएगा की अपनी ही बेटी को कहीं बेच आएगा। ज़रा भी मोह नहीं आया उसे अपनी एक माह की बच्ची पर। कहाँ होगी,किस हाल में होगी ? यह सोच सोच कर उसका कलेजा मुँह को आ रहा था। माथे की चोट से उसका सिर चकरा रहा था। इस हाल में वो कहाँ जाये, किससे पूछे कि उसकी बेटी कहाँ है ? महेश तो दारू चढ़ा कर सो गया होगा। खाना तो वह बना ही नहीं पायी थी। दो दिन से बुखार में जो तप रही थी। उसे वो दिन याद आये जब बचपन में वह बीमार पड़ती थी। माँ सारी रात जग कर उसके माथे पर ठन्डे पानी की पट्टियाँ रखती थीं। बाबा गाँव के वैद्य जी से दवा ला कर अपने हाथों से पिलाते। अपने माता-पिता की इकलौती संतान थी पर गरीबी के बावजूद बड़े लाड़ प्यार से पाला था माँ-बाबा ने।

यह तो उसी की ग़लती थी कि सोलह साल की उम्र में वह अनिल से प्रेम कर बैठी और उसके बहकावे में आ कर मुंबई भाग आयी। पर पहले ही दिन जिस लॉज में वो लोग रात को रुके पुलिस की रेड पड़ गयी और अन्य लोगों के साथ वे दोनों भी पकड़े गये।'वैश्या' शब्द का अर्थ भी न जानते हुए उस पर वैश्या होने का का ठप्पा लग गया। वह लॉज बदनाम जो था ऐसे कामों की वजह से। अनिल बालिग था पर वह नहीं, इसलिए उसे सीधे बाल-सुधार-गृह भेज दिया गया। उसके बाद अनिल कहाँ गया उसे आज तक नहीं पता। पुलिस जब उसका पता पूछते हुए उसके गाँव पहुँची तो पता चला उसके घर से भागने की खबर से ही उसके बाबा को दिल का दौरा पड़ गया था।

बाबा के मरते ही माँ दो सदमे एक साथ बर्दाश्त नहीं कर सकीं और ज़हर खा कर अपनी जान दे दी। पुलिस ने उसे बेसहारा समझ कर दो साल बाल-सुधार घर में ही रखा। बालिग होने पर लाला रामनाथ की कृपा से उसे उन जोड़ों में शामिल कर लिया गया जो अनाथ थे और उसकी शादी महेश से हो गयी।लाला जी की ट्रस्ट की ओर से सभी नव-विवाहित जोड़ों को दस-दस हज़ार रुपये दिए गए थे जिससे वे अपना नया घर बसा सकें।

विवाह के बाद कुछ दिन तो बड़े अच्छे बीते। महेश के हाथ में अचानक दस हज़ार रुपये आ जाने से वह बड़ा खुश था अपनी किराये की खोली में उसने निम्मी को बहुत खुश रखा।उसकी एक आदत थी जो निम्मी को नापसंद थी और वो थी शराब पीने की। जिस दिन वो शराब पी कर आता वो बाहर जा कर बैठ जाती। लाख मनाने और चिरौरी करने पर भी अन्दर नहीं आती। दो-चार दिन बिना पिए बिताने के बाद फिर उसे पीने की हुड़क सवार होती और फिर से वही हाल हो जाता इसलिए निम्मी को घर की दहलीज़ पर बैठने की आदत सी हो गयी थी। जब भी वह घर की दहलीज़ पर बैठती महेश के कुछ आवारा दोस्त घर में आ जाते और फिर दोबारा दारू का दौर चलता।दरवाज़ा अंदर से बंद रहता। कई घंटे बीत जाते बाहर बैठे-बैठे।जब महेश के दोस्त घर से निकल जाते तो वह अंदर जाती और गालियों के साथ मार भी खाती।

नन्हीं के पैदा होने के बाद उसने दहलीज़ पर बैठना बंद कर दिया था। अब नन्हीं ही न थी तो किसलिए अन्दर जाती ? महेश के पास रुपये ख़तम हो गए थे उसे शराब पीने के लिए पैसे चाहिए थे तो वह नन्हीं को ही बेच आया।तभी एक मरियल से बच्चे को लिये एक भिखारिन वहाँ आ पहुँची और कुछ माँगने लगी।

निम्मी के पास उसके आँचल के दूध के सिवाय और क्या था देने के लिए ? पर उसे याद आया, कल अपनी साड़ी के पल्लू में कुछ रुपये बाँध लिए थे। उसने। पल्लू की गाँठ खोल कर एक रुपया उसे दे कर गाँठ बाँध ली। भिखारिन ने पास की दूकान से चने खरीदे और वहीं बैठ कर खाने लगी। जाते समय चने की पुड़िया वहीं फेंक दी। निम्मी की नज़र उस पर पड़ी, कल के अखबार का कोना था। एक इश्तहार पर नज़र पड़ी, किसी सेठ के यहाँ आया की नौकरी की जगह खाली थी। फ़ौरन निम्मी के मन में एक विचार कौंध गया, "क्यों न वह इस नौकरी पाने की कोशिश करे ? कम से कम एक ठिकाना तो मिलेगा,रोज़ रोज़ महेश की मार और गालियों से तो छुटकारा मिलेगा। "

निम्मी ने वह कागज़ उठाया और चल दी बस स्टॉप की ओर, लिखे पते पर लोगों से पूछने पर सही बस मिल गयी। किस्मत से सेठ की हवेली के पास ही बस रुकी। धड़कते दिल से वह अन्दर जाने लगी तो दरबान ने रोका। उसने वह इश्तहार दिखाया, दरबान ने इंटरकॉम पर अन्दर सूचना दी और उसे गेस्ट हाउस का रास्ता दिखा दिया।मन में उठते विचारों के ज्वार को थामती हुई वह सहमती हुई रिसेप्शन के पास सोफे पर बैठ गयी। तभी वहाँ  के मेनेजर ने उसे ऑफिस में बुलाया कुछ सवाल किये जिसमें उसे अपने बारे में जानकारी देनी थी ।उसने केवल इतना बताया कि  वह इस दुनिया में बिलकुल अकेली है, आगे पीछे कोई नहीं। सच्चाई छिपा गयी वह जिसकी परतों में न जाने कितने घाव बिखर कर खुल जाते। हवेली में शायद ऐसी ही स्त्री की जरूरत थी जिसका कोई न हो इसलिए उसे फ़ौरन काम पर रख लिया गया।    

सौभाग्यवश उसे सेठ जी के बच्चे के ही काम पर रखा था। सेठानी के प्रसव को एक माह हो चुका था। पर अभी भी वह स्वयं बच्चे की देख-भाल नहीं कर सकती थी।

एक नर्स भी थी जो समय-समय पर दोनों को दवा और खाना वगैरह देती पर बच्चे के पोतड़े धोने, मालिश करने व नहलाने-धुलाने के लिए आया की जरूरत थी। वैसे भी सेठानियाँ खुद थोड़े ही ये सब काम करती हैं। यह तो उसकी किस्मत अच्छी थी कि जहाँ एक तरफ वो अपनी बच्ची को खो आयी थी वहीं अब उसे सेठ के बच्चे का ही काम मिला था पर अपनी ममता किस पर लुटाती ? बच्चे को देख कर ही सब्र कर लेती,जब भी वह उसे गोद में लेती उसकी छातियों में दूध उतर आता जिसे वह चुपके से बाथरूम में जा कर निचोड़ आती।इसके सिवाय और कोई चारा न था।कई बार मन होता बच्चे को नहलाते समय उसे दूध पिला कर अपनी छातियों का बोझ हल्का कर ले पर डर के मारे वह ऐसा न कर पाती। किसी को पता चल गया तो ? नौकरी से भी हाथ धोना पड़ेगा।

जब दुःख की घड़ी आती है तो समय काटे नहीं कटता,पर यहाँ तो समय मानो पंख लगा कर उड़ रहा था। उसे हवेली में आये अठारह साल गुज़र गये। सेठ जी का बेटा मनोज अठारह वर्ष हुआ तो उसके जन्मदिन के उपलक्ष्य में गेस्ट-हाउस में एक बहुत बड़ा आयोजन किया गया था। शहर के नामी-गिरामी लोगों को बुलाया गया था जिनमें मनोज के दोस्त भी शामिल थे। उड़ती खबर से उसे यह भी पता चला कि बनारस से कुछ तवायफ़ों को भी बुलाया गया था। जिनमें एक कमसिन लड़की गुलाबो का नाच होगा और उसकी नथ उतारी जायेगी।उसे नहीं पता था नथ उतारने का क्या अर्थ होता है ? जब उसे वास्तविकता पता चली कि मनोज के दोस्तों के साथ उसे शहर के बाहर फ़ार्म हाउस में रहने के लिये भी भेज जायेगा तो उसके पैरों तले जमीन खिसक गयी। इतनी कम उम्र में?फिर उसे याद आया, वह भी तो सोलह वर्ष की उम्र में अपने प्रेमी के साथ भाग आयी थी काश! उस समय उसने अनिल के बहकावे में ऐसा न किया होता तो आज। 

सोचते सोचते उसे अपनी नन्हीं की याद सताने लगी। कहाँ होगी वह ? किस हाल में होगी ? एक बार तो मन हुआ महेश से जा कर पूछे क्या पता वह अभी भी जानता हो कि उसकी बेटी कहाँ है ? शायद वह उसका पता बता दे।तभी गेस्ट हाउस के गेट पर एक टैक्सी आ कर रुकी।आजकल उसे गेस्ट हाउस में उसे साफ़ सफाई का काम सौंपा गया था इसके साथ उन तवायफ़ों की ज़रूरतों का भी ख़्याल रखने की ज़िम्मेदारी भी उसकी ही थी जिन्हें गेस्ट हाउस के ही एक बड़े कमरे में ठहराया जाना था।

जैसे ही टैक्सी रुकी उसने आगे बढ़ कर टैक्सी का दरवाज़ा खोला।

"अरे दय्या रे, कैसा लम्बा सफ़र था ? थकान हो गयी। गुलाबो जरा पानी तो देना। एक अधेड़ महिला को कहते हुए सुना। "

उसका ध्यान गुलाबो की तरफ गया और कुछ अनहोनी की आशंका से उसका सिर चकराने लगा। गुलाबो हू-बहू वैसी लग रही थी जैसी वह खुद सोलह बरस की उम्र में गाँव से भाग कर आयी थी। तो क्या गुलाबो ही उसकी बेटी है ? एक ओर उसका सुन्दरता से भरा यौवन,रंग-रूप और दूसरी ओर! वह भी तो बिना अर्थ जाने ही वेश्याओं की पंक्ति में खड़ी कर दी गयी थी। जब होटल में रेड पडी थी और आज यह गुलाबो। ।।इसकी नथ उतारी जायेगी।यह कोंपल तो अभी फूटी ही है। कली खिलने को है कि उसका मर्दन कर दिया जायेगा सिर्फ अय्याशी के लिए,नहीं-नहीं ऐसा न होने देगी वह चाहे गुलाबो उसकी बेटी हो या न हो… 

"अरे… किन ख़यालों में डूबी हो मेमसाब! इधर आकर सामान उठाओ। "

"मेमसाब" शब्द का संबोधन सुन कर उसके विचारों को झटका लगा। उसने इधर उधर देखा। "इधर उधर क्या देखती हो मैडम ? मै तुम्हीं से कह रही हूँ, औकात तो देखो इसकी है नौकरों की, और चोंचले नवाबों के। " उस अधेड़ महिला ने उससे कहा।

निम्मी ने लपक कर बैग उस महिला के हाथ से लिया और उन सबको अन्दर ले गयी।

तन से तो निम्मी उन तीनों की सेवा में लगी रही पर मन उसका कहीं और भटक रहा था। जश्न के आयोजन में दो दिन बाकी थे। वह इस उहा-पोह में फँसी हुई थे कैसे वह गुलाबो को उसकी बर्बादी से बचाए,उसका मन हुआ कि पुलिस स्टेशन जा कर सब कुछ सच-सच बता दे फिर चाहे उसकी नौकरी ही क्यों न चली जाये।सोचते सोचते शाम हो गयी और वह सेठानी से दो घंटे की छुट्टी लेकर सीधे पुलिस-स्टेशन गयी और वहाँ बैठे अधिकारियों को सब कुछ बता दिया। पुलिस अधिकारियों ने उसकी बातें ध्यान से सुनी पर जैसे ही सेठ जी का नाम आया तो सकपका गये। फिर यह कह कर उसे वहाँ से चले जाने को कहा कि वह नौकरानी है तो अपनी औकात में रहे बड़े लोगों के व्यक्तिगत मामले में दखल देने की जरूरत नहीं है। 

"पर गुलाबो मेरी बेटी है साहब।"

"तुम्हारी बेटी ?"

फिर तो हम तुम्हें ही अन्दर कर देंगे। "

"मुझे अन्दर कर दीजिये साहब पर मेरी बेटी को वैश्या बनने से बचा लीजिये।"

"अच्छा यह बता कि तुझे कैसे मालूम की वो तेरी बेटी है, वो तवायफ़ें तो बनारस से आयी हैं। तू क्या बनारस की है ?" एक कांस्टेबल ने कड़क आवाज़ में पूछा l

"नहीं साहब पर मुझे पूरा यकीन है कि वह मेरी ही बेटी है उसके गर्दन पर लहसुनिया जो है जो जन्म से ही था।"

"क्या डी.एन. ए.के ज़माने में लहसुन-प्याज़ की बात करती है ?"

"नहीं साहब वो निशान तो जन्म से ही था उसे। यही तो सबूत है कि वह मेरी बेटी है, मैंने बड़े प्यार से उसका नाम नन्हीं रखा था। मेरी नन्हीं अब बड़ी हो गयी है। उसे उन तवायफ़ों के पंजे से छुड़ा लीजिये, हुज़ूर!"

"क्या बेटी बेटी लगा रखा है, बस हो गया बहुत,अब जा अपना काम कर।" कांस्टेबल गुर्राया। 

पुलिस स्टेशन पर सुनवाई न होते देख निम्मी टैक्सी ले कर सीधे राजावाड़ी चॉल पहुँची जहाँ वह महेश के साथ रहती थी।अपनी बेटी को बचाने के लिए आज वह कुछ भी करने को उतारू थी इसलिए सेठ जी के यहाँ से चलने से पहले उसने मनोज के खिलौनों वाली अलमारी से एक खिलौना पिस्तौल भी लेकर अपने थैले में डाल ली थी महेश को डराने के लिए।

जैसे ही निम्मी ने खोली के दरवाज़े को धक्का दिया दरवाज़े की साँकल खुल गयी और दरवाज़ा अपने आप झटके से खुल गया। शाम का समय था उसने महेश को किसी के आलिंगन में देखा। दरवाज़ा खुलने की आवाज़ से दोनों आकृतियाँ छिटक कर अलग हो गयीं।पर ये क्या ?दूसरा व्यक्ति तो पुरुष था। 'तो क्या महेश ने पैसों की ख़ातिर पुरुषों से भी सम्बन्ध बनाने शुरू कर दिए हैं ? मुझे वैश्या कहता था और खुद क्या बन गया है ?" वह ऐसा सोच ही रही थी कि वह व्यक्ति पाँच-पाँच सौ के दो नोट फेंक कर वहाँ से भागा। यह सब इतनी जल्दी में हुआ कि महेश उसे वहाँ देख कर हक्का-बक्का रह गया।

निम्मी अगले कदम के लिए पूरी तरह से तैयार थी। इससे पहले कि महेश संभल पाता उसने पिस्तौल उसकी गर्दन पर लगा दी और चीखते हुए बोली, "बता कमीने, मेरी नन्हीं कहाँ है ? किसे बेच कर आया था तू उसे आज से अठारह साल पहले  ?"

महेश की डर के मारे घिग्घी बँध गयी। निम्मी का चंडी रूप देख कर उसे अपने मुँह खोलना ही पड़ा ,शोर-शराबा सुन कर आस-पास के लोग भी वहाँ जमा हो गए। 

निम्मी के हाथ में पिस्तौल देख कर किसी ने पुलिस को सूचना दे दी।पुलिस भी वहाँ पहुँच गयी। सबके सामने महेश को कबूल करना ही पड़ा कि उसने नन्हीं को अपने एक दोस्त के हाथ पाँच हज़ार रुपयों में बेच दिया था जो तवायफ़ों का दलाल था और उस बच्ची को वह बनारस के किसी कोठे में बेच आया था।अब तो निम्मी को पूरा विश्वास हो गया की गुलाबो उसी की नन्हीं है। महेश को थाने ले जाया गया और पूरी छानबीन के बाद दूसरे दिन पुलिस सेठ जी के यहाँ पहुँची। वहाँ से गुलाबो को छुड़ाया गया और पूरी औपचारिकताएँ निभाने के बाद उसे निम्मी को सौंप दिया गया।

पिछले अठारह वर्षों में निम्मी ने अपनी पूरी तनख़्वाह जमा कर ली थी। अब उसे केवल अपने पल्लू में बँधे पैसों पर निर्भर नहीं रहना था।खोयी हुई बेटी को दोबारा पा कर उसे दुनिया की सारी नियामतें मिल गयी थीं। अपनी बेटी को लेकर वह चल पड़ी, एक नया नीड़ बसाने, नयी मंज़िल की ओर।


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