STORYMIRROR

Anand Mishra

Action

4  

Anand Mishra

Action

मंदिर की लापता घंटी

मंदिर की लापता घंटी

5 mins
3

बुंदेलखंड के बीहड़ों और खेतों के बीच बसा था एक छोटा-सा गाँव—देवपुर। न तो वह किसी मानचित्र पर विशेष रूप से अंकित था, न ही पर्यटकों का कोई ठिकाना था। फिर भी गाँव की अपनी एक पहचान थी।

हर सुबह सूर्योदय से पहले, जब आकाश पर हल्की लालिमा भी नहीं उभरती थी, तब माँ विंध्यवासिनी मंदिर की विशाल घंटी की गूँज पूरे गाँव को जगा देती थी।

वह घंटी केवल धातु का एक टुकड़ा नहीं थी। वह गाँव की स्मृतियों की संरक्षक थी। कहा जाता था कि लगभग तीन सौ वर्ष पहले एक कारीगर ने उसे ढाला था। उसके स्वर में ऐसी गहराई थी कि गाँव के बुज़ुर्ग कहते थे—"यदि आँखें बंद हों और मन कहीं भटक रहा हो, तब भी इस घंटी की आवाज़ पहचान लेंगे।"

पर एक दिन वह आवाज़ नहीं आई।

मंदिर के पुजारी पंडित हरिनारायण प्रतिदिन की तरह ब्रह्ममुहूर्त में मंदिर पहुँचे।

उन्होंने देखा कि मंदिर का मुख्य द्वार खुला हुआ था।

पहले तो उन्हें लगा कि शायद कोई भक्त जल्दी आ गया होगा।

पर जैसे ही उनकी दृष्टि घंटी वाले स्थान पर पहुँची, उनके पैरों तले जमीन खिसक गई।

घंटी गायब थी।

लोहे का हुक खाली झूल रहा था।

कुछ ही घंटों में यह समाचार पूरे गाँव में फैल गया।

लोग मंदिर की ओर दौड़ पड़े।

कोई विश्वास नहीं कर पा रहा था।

"इतनी बड़ी घंटी कोई कैसे ले जा सकता है?"

"रात में किसी ने कुछ सुना क्यों नहीं?"

"क्या चोर बाहर से आए थे?"

प्रश्न बहुत थे, उत्तर किसी के पास नहीं था।

दोपहर तक नज़दीकी कस्बे से पुलिस भी आ गई।

निरीक्षक राजीव सिंह ने पूरे मंदिर का निरीक्षण किया।

उन्होंने दरवाज़ों को देखा।

ताले सही थे।

दीवारें सही थीं।

कहीं कोई तोड़फोड़ नहीं थी।

उन्होंने पुजारी से पूछा,

"मंदिर की चाबी किसके पास रहती है?"

"कोई विशेष चाबी नहीं है साहब। दिनभर मंदिर खुला रहता है।"

निरीक्षक ने भौंहें सिकोड़ लीं।

"फिर तो काम किसी गाँव वाले का ही लगता है।"

गाँव वालों को यह बात अच्छी नहीं लगी।

"हम अपनी ही घंटी क्यों चुराएँगे?" एक किसान ने नाराज़ होकर कहा।

निरीक्षक के पास कोई उत्तर नहीं था।

तीन दिन बीत गए।

अफवाहें फैलने लगीं।

कुछ लोग बोले कि पुरावशेष तस्करों का हाथ है।

कुछ ने इसे देवी का संकेत बताया।

कुछ ने पड़ोसी गाँव पर संदेह किया।

स्थिति उलझती जा रही थी।

तब गाँव के मुखिया रामस्वरूप चौधरी ने एक व्यक्ति को बुलाने का निर्णय लिया।

उसका नाम था—केशव पंडित

केशव पंडित चौथे दिन सुबह गाँव पहुँचे।

साधारण-सा कुरता, कंधे पर एक झोला और पुरानी मोटरसाइकिल।

उन्हें देखकर कोई नहीं कह सकता था कि यह व्यक्ति रहस्यों को सुलझाने के लिए प्रसिद्ध है।

उनकी सबसे बड़ी विशेषता थी—वे वही देख लेते थे, जिसे बाकी लोग अनदेखा कर देते थे।

गाँव पहुँचकर उन्होंने कोई प्रश्न नहीं किया।

बस लोगों की बातें सुनते रहे।

हर व्यक्ति की अपनी कहानी थी।

हर कहानी दूसरे से अलग थी।

केशव चुपचाप सब सुनते रहे।

संध्या को वे मंदिर पहुँचे।

उन्होंने घंटी वाले स्थान को ध्यान से देखा।

फर्श को देखा।

आँगन को देखा।

मंदिर के बाहर की पगडंडी को देखा।

फिर वे कुछ देर तक बिल्कुल मौन खड़े रहे।

पुजारी ने पूछा,

"क्या आपको कोई सुराग मिला?"

केशव मुस्कुराए।

"सुराग तो मिला है, पर अभी कहानी पूरी नहीं हुई।"

अगली सुबह वे गाँव की चाय की दुकान पर पहुँचे।

गाँव की चाय की दुकान अक्सर सूचना का सबसे बड़ा केंद्र होती है।

चाय पीते-पीते उन्होंने दुकानदार से पूछा,

"पिछले कुछ महीनों में कोई बाहरी व्यक्ति गाँव आया था क्या?"

दुकानदार ने सोचा।

"हाँ बाबूजी, दो महीने पहले कुछ लोग आए थे।"

"कैसे लोग?"

"शहर के लगते थे।"

"क्या कर रहे थे?"

"पुरानी चीज़ों के बारे में पूछ रहे थे।"

"कौन-सी चीज़ें?"

"मूर्ति, पुराने दरवाज़े, ताम्रपत्र... और मंदिर की घंटी।"

केशव की आँखों में चमक आ गई।

दिनभर उन्होंने आसपास के गाँवों की जानकारी भी जुटाई।

उन्हें पता चला कि पिछले एक वर्ष में तीन गाँवों से प्राचीन मूर्तियाँ गायब हो चुकी थीं।

एक सरकारी सर्वेक्षण में देवपुर की घंटी का भी उल्लेख किया गया था।

उसकी ऐतिहासिक और आर्थिक कीमत अपेक्षा से कहीं अधिक आँकी गई थी।

अब केशव की शंका मजबूत हो चुकी थी।

अगले दिन उन्होंने गाँव के सभी लोगों को बरगद के पेड़ के नीचे बुलाया।

पुलिस निरीक्षक भी उपस्थित थे।

केशव खड़े हुए और बोले,

"मुझे पता चल गया है कि घंटी कहाँ गई।"

भीड़ में हलचल मच गई।

निरीक्षक ने कहा,

"तो बताइए।"

केशव ने शांत स्वर में कहा,

"घंटी किसी बाहरी चोर ने नहीं चुराई।"

गाँव वाले एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।

निरीक्षक मुस्कुराए।

"मैं पहले ही कह रहा था कि यह काम गाँव वालों का है।"

केशव ने सिर हिलाया।

"आप आधे सही थे।"

"क्या मतलब?"

"घंटी गाँव वालों ने ही हटाई है।"

भीड़ में शोर उठ गया।

केशव ने हाथ उठाकर सबको शांत किया।

"लेकिन उन्होंने घंटी चोरी नहीं की।"

अब सभी स्तब्ध थे।

केशव ने गाँव के मुखिया की ओर देखा।

"शायद अब रामस्वरूप जी सच्चाई बताना चाहेंगे।"

मुखिया का चेहरा उतर गया।

कुछ क्षण मौन रहा।

फिर उन्होंने गहरी साँस ली।

"हाँ, यह सच है।"

पूरा गाँव अवाक रह गया।

मुखिया बोले,

"हमें सूचना मिली थी कि कुछ तस्कर घंटी पर नज़र रखे हुए हैं।"

"हमने अधिकारियों को बताया, पर कोई व्यवस्था नहीं हुई।"

"तब हमने निर्णय लिया कि घंटी को कुछ समय के लिए छिपा दिया जाए।"

गाँव वाले ध्यान से सुन रहे थे।

"रात में पाँच लोगों ने मिलकर घंटी उतारी और गाँव के भीतर ही सुरक्षित स्थान पर रख दी।"

"कहाँ?" कई आवाज़ें एक साथ उठीं।

मुखिया बोले,

"पुराने सामुदायिक अनाज भंडार में।"

अब सब कुछ स्पष्ट हो गया था।

केशव ने समझाया,

"मंदिर में जबरन प्रवेश के कोई निशान नहीं थे।"

"बाहर किसी गाड़ी के पहिए के निशान नहीं थे।"

"किसी अजनबी को किसी ने नहीं देखा।"

"और सबसे महत्वपूर्ण बात—कुछ लोग चिंतित अवश्य थे, लेकिन आश्चर्यचकित नहीं।"

लोगों को अब पूरी कहानी समझ में आने लगी।

उसी शाम गाँव वाले अनाज भंडार पहुँचे।

वहाँ से कपड़ों में लिपटी हुई घंटी निकाली गई।

जैसे ही सूर्य की किरणें उसकी धातु पर पड़ीं, कई बुज़ुर्गों की आँखें नम हो गईं।

वह केवल एक घंटी नहीं थी।

वह गाँव की स्मृति थी।

उसने पीढ़ियों के जन्म, विवाह, त्योहार और विदाई देखी थी।

अगले दिन घंटी को फिर मंदिर में स्थापित किया गया।

पूरा गाँव एकत्रित था।

पूजा हुई।

फूल चढ़ाए गए।

फिर पुजारी ने रस्सी खींची।

घंटी बजी।

उसकी गंभीर और मधुर ध्वनि पूरे देवपुर में फैल गई।

खेतों तक।

नदी तक।

लोगों के हृदय तक।

कार्यक्रम समाप्त होने के बाद मुखिया ने केशव से कहा,

"आपने रहस्य सुलझा दिया।"

केशव मुस्कुराए।

"रहस्य बहुत छोटा था।"

"फिर महत्वपूर्ण क्या था?"

केशव ने मंदिर की ओर देखा।

"महत्वपूर्ण यह था कि लोगों ने ऐसा क्यों किया।"

कुछ क्षण बाद वे अपनी मोटरसाइकिल पर बैठे और गाँव से निकल गए।

पीछे मंदिर की घंटी फिर गूँज रही थी।

और आगे कहीं, एक नया रहस्य उनका इंतज़ार कर रहा था।


Rate this content
Log in

Similar hindi story from Action