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Rashmi Sinha

Inspirational


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Rashmi Sinha

Inspirational


मीत न मिला रे मन का

मीत न मिला रे मन का

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शेफाली विदा होकर अपने भावी घर की ओर आ रही थी। बगल में पति, कार में, आगे बैठे चुहल करते देवर----आंखों की कोरों में अभी भी अश्रु बिंदु झिलमिला रहे थे। क्या इतना आसान होता है घर छोड़ देना? "कैसी हसरत से बाबुल की देखे गली----पुनः कंठ में कुछ अटक सा गया था। मनस्वी( मनु) यही नाम था पति का, उसकी तरफ झुक कर पूछ रहे थे, "चाय पियेंगी आप?"

न, सुनकर भी, उन्होंने कार रुकवा दी थी। वो एक छोटा सा ढाबा था। स्वादिष्ट चाय के साथ वेज पकौड़े भी----चाय का ग्लास पकड़ाते हुए मनु हौले से उसकी उंगली छू चुके थे।शर्म से उसके कपोल आरक्त हो उठे, और प्रत्युत्तर में मनु मुस्कुरा दिया।भूख तो सच मे लग रही थी। चाय पीकर जब पुनः कार चली तो देवर म्यूजिक सिस्टम ऑन कर चुका था, "मीत न मिला रे मन का--- , इस बार शेफाली ने आश्वस्त भावसे मनु को देखा और मुस्कुरा दी।

उसका मीत तो उसके मन का ही था।

और गहमागहमी से भरी ससुराल में भी वो मनु के सहारेसहज महसूस कर पा रही थी।गाने की पंक्ति पुनः दिमाग मे घूम रही थी,"कोई घूंघट उठा देगा जब रात को, भूल जाएगी मैके की हर बात को" घूंघट उठते ही दिल कई धड़कने भूल चुका था , और शेफाली एक रात में ही मानो सब कुछ भूल चुकी थी।

सुबह ही उसको रसोई छुवाने की रस्म थी। उसे, परिवार को कुछ मीठा बना कर खिलाना था। और वो शौक से ये कार्य कर रही थी।अगले दिन ही उन लोगों का कुल्लू, मनाली घूमने का प्रोग्राम था।कितना सपने जैसा था सब कुछ। लगता था सब कुछ यूं ही चलता रहे।पर आफिस की छुट्टियां खत्म हो चुकी थी, और अब मनु व्यस्त रहने लगा था। संयुक्त परिवार था उनका, 2 भाई , एक बहन।शेफाली संयुक्त परिवार की अभयस्त न थी।इकलौती बेटी जोथी।पर मनु से प्यार पूर्ववत था। उसका मन करता था वो उसी के पास बैठी रहे। अधिक से अधिक समय मनु के साथ गुजारे।

पर सुबह उठते ही अब वो उसे अक्सर कहता "देख लो,मम्मी काम मे लगी है , कुछ मदद कर दो।"और मम्मी, डैडी और मनु के रिश्तेदारों के बीच अच्छी बनने की प्रयास में, चकरघिन्नी की तरह नाचती शेफाली, खुद को ठगा सा महसूस करती।

ये ढर्रे में बंधी ज़िन्दगी भी अजीब होती है,और शेफाली और मनु की जिंदगी भी ढर्रे में बंध चुकी थी।शादी के एक-एक करके 12 वर्ष बीत चुके थे। सुबह, शाम, रात का भान ही न होता, परिवार 2 बच्चों से समृद्ध हो चुका था।आज भी मनु का फेवरिट गाना वही था, ढर्रे में बंधा सा ----हर महफ़िल में सुनाता और यूं भी गुनगुनाता, तारीफ बटोरता," मीत न मिला रे मन का------"और दिन की तरह रात का भी एक ढर्रा ही होता है शायद, रात को तरोताज़ा होने का भ्रम समझ कर-----,पर रात भी दिन की तरह थकाने वाली ही होती है, और जुबान का भी एक ढर्रा होता है----वो अब सामने आने लगा था, तीखे व्यंग बाण और लड़ाई का विद्रूप रूप।

मीत ---- सुनते ही शेफाली चिल्लाकर कहती, तुम्हारे लिए तो मीत शब्द हटा कर 'मीट' कर देना चाहिए, और बदले में भाड़ में जाओ सुन कर रोते हुए सो जाती।

पर एक शाम जल्दी काम निपटा कर ढर्रे को तोड़, शेफाली पार्क में बैठी थी।मंद चलने वाली बयार मानो उसके दिल पर पड़े जख्मों को हौले-हौले सहला रही थी।गुमसुम, उस खुले आकाश के नीचे, उस वातावरण के हल्केपनको महसूस करती शेफाली, अचानक एक आवाज़ को सुनकर चौंक उठी, 'क्या मैं यहां बैठ सकती हूँ' , सामने उसकी मां की उम्र की, चश्मा लगाए एक आकर्षक महिला खड़ी थीं।

"जरूर----"

"कहाँ रहती हो बेटी?" उनका प्रश्न, ?

"यहीं सामने वाले फ्लैट्स में।"

"कुछ परेशान सी दिख रही हो, क्या बात है?"

"कुछ नही आंटी, परेशान तो दुनिया ही है" ,शेफाली ने मुस्कुरा कर कहा।

प्रत्युत्तर में आंटी मुस्कुरा दी। "हां, ये तो तुमने ठीक कहा।"

"अब देखो न, मैं शॉर्ट फिल्म्स बनाती हूँ, पर एन मौके पर कलाकार ही धोखा दे गई।"

अब शेफाली को उनकी बातों में रुचि आने लगी थी। अचानक ही वो बोली, "क्या तुम मेरी नायिका बनोगी?"

"मैं!!!!?" इस अप्रत्याशित सवाल के लिए वो प्रस्तुत न थी।

"हां",

" पर तुम्हे उसकी तैयारी करनी होगी।"मेरी शॉर्ट फिल्म पारिवारिक झगड़ों के विषय मे है ,जो अंत मे प्यार में बदलता है।

पर तुम्हे रिहर्सल करनी होगी अपने परिवार के बीच---स्क्रिप्ट, डायलॉग सब मैं तुम्हे दूंगी। तुम अवसर के अनुरूप थोड़ा बहुत चेंज कर सकती हूँ।

एक हफ्ते के बाद मैं तुम्हे कैमरे के सामने बोलते, एक्टिंग करते देखना चाहूंगी। अगर सफल रही तो एक लाख---", वो एक सांस में बोलती गईं।

" एक लाख??? चंद दिनों के अभिनय के लिए?-----"

शेफाली को अपने कानों पर विश्वास न था। पर आंटी एक हफ्ते बाद उसी जगह आने का आश्वासन देकर जा चुकी थी।अब शेफाली के जीवन का ढर्रा बदला।स्क्रिप्ट, और डायलॉग के हिसाब से उसे दिन-रात, घर मे पॉजिटिव ही बोलते रहना था। पर एक लाख और नाम के एवज में पॉजिटिव बोलते रहना उसके लिए मुश्किल न था।

आज वो मम्मी के रसोई में पहुंचने से पहले, मनु के कुछ कहने से पहले ही , खुद ही रसोई में पहुंच चुकी थी।रसोई में आई मां को उसने अनुरोध सहित वापस उनके कमरे में भेज दिया, वो हैरानी से उसको देखती हुई, अपने कमरे में वापस----ट्रे में चाय लेकर वो जब उनके कमरे में पहुंची, तो मम्मी के मुँह से निकला,"शेफाली सब ठीक तो है न?" और वो हंस दी।

"टिफ़िन, खाना, नाश्ता----," आज तो काम में भी उसे आंतरिक प्रसन्नता महसूस हो रही थी।

"ज़िन्दगी ताउम्र करती रही संजीदा मजाक,

जवाब में हम भी ,ठहाका मार कर रो दिए।"

उसके बदले व्यवहार से सब हैरत में थे। और वो हैरान हो उठी 2-3 दिनों के रिहर्सल के बाद ही---जब एक दिन उसने मनु को आफिस से जल्दी आते देखा, और खुशी से छलछला गई आंखें, जब हाथ मे रख दिये गए थैले में उसने अपने फेवरिट ढोकले और सोहन हलवा देखा।मम्मी, पापा भी बेहिचक सब के बीच उसकी तारीफ करते, और मनु? मुस्कुराता सा उसका नकली गुस्सा, मजा दे जाता।

आज पुनः 7 बजे घर लौट आये मनु को उसने हैरानी से देखा।उसके हाथों में पुनः एक पैकेट था। उत्सुकता से उसने पैकेट के अंदर झांका, और खिलखिला कर हंस दी। वेणी?? कटे बालों के लिए, भाड़ में जाओ तुम। और गुनगनाते हुए वह रसोई से जब बचा काम निपटा कर कमरे में पहुंची तो मनु को अपना फेवरिट गाना गुनगनाते हुए पाया, मीत न मिला रे मन का----उसको देख कर हंसा और बोला, "चलें भाड़ में???"

प्रत्युत्तर में शेफाली की बाहें उसके गले मे पहुंच चुकी थी, और होंठों पर थी गाने की अगली पंक्ति' कोई तो मिलन का करो रे उपाय'-----

आज रिहर्सल का अंतिम दिन- पार्क में आंटी अपने वादे के अनुसार मौजूद थी। उसे देखकर मुस्कुराई और शेफाली हंस दी।

"आंटी ,आज पहले मैं बोलूंगी----, बैठ जाऊं? "

" जरूर बेटा-----"

बैठते-बैठते शेफाली बोली- "आंटी एम बी. ए. करके घर पर दाल रोटी बनाना, और उस काम की स्वीकृति न मिलना ,मुझे बदल चुके थे। मैं वैसी नही थी, जैसी बन चुकी थी।

वो पुनः हंसी,और" इतनी भी अक्ल से पैदल नही हूँ। मुझे पता चल चुका है कि आप कोई शॉर्ट फिल्म विल्म नही बनाती, और न ही डायरेक्टर हैं।मम्मा' बोलूं क्या आपको? "असली मैनेजमेंट तो आप ही सिखा गई मुझ को।और आंटी से मम्मा बनी आंटी ने, उसे गले लगा लिया।वातावरण में तैर गई एक भीगी सी समवेत हंसी----और फूलों से हल्की शेफाली के मन मे घर लौटते हुए गूंज रही थीं कुछ पंक्तियाँ-

ये क्या कि , उठाये कदम,

और मंज़िल आ गई----

मज़ा तो तब है,

जब पैरों में कुछ थकान रहे!


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