अमृता शुक्ला

Inspirational


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अमृता शुक्ला

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मीरा बाई

मीरा बाई

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मीरा बाई की भक्ति भावना में दो धाराओं का समावेश है। एक का रूप विषादमय और दूसरा रूप अनुरागमय है। विषादमय रूप का कारण उनके जीवन की संकटग्रस्त परिस्थिति है और अनुरागमय रूप का कारण बाल्यकाल से ही गिरधर में उनकी आस्था। इसी आस्था ने उन्हें जीवन की कटु परिस्थितियों को सहने की शक्ति दी। उनके विचार में यह संसार नश्वर है और दैनिक व्यवहार में 'हरि अविनाशी' का ही स्मरण करना चाहिए उन्होंने अपने गिरधर को साकार और निराकार दोनों रूपों में प्रतिष्ठित किया है। प्रारंभ में उन्होंने कबीर आदि संतों की भांति अगम के देस चलने की इच्छा प्रकट की थी। वे उनके स्वर में स्वर मिलाकर गाने लगतीं हैं "त्रिकुटी महल में बना है झरोखा वहाँ से झांकी लगाऊं रे।"

 आगे चलकर साधना का यह कठोर मार्ग उनके स्वभाव के अनुकूल न हो सका। अतः उन्होंने माधुर्य भाव से अपने इष्ट की उपासना की। जिसमें उन्होंने स्वयं को पत्नी मानकर अपने पति 'हरि अविनाशी' की आरिधना की। कभी वे कहतीं कि "जाके सिर मोर मुकुट मेरो पति सोई" या अनुनय करतीं "बसो मेरे नैनों में नंदलाल"  इस ऊंची श्रेणी में पहुँचकर उन्हें किसी बात की चिंता नहीं रही। कृष्ण के रस में वह अपने आपको गोकुल अहीरणी समझतीं थीं। भक्त इसलिए उन्हें ललिता गोपिका का अवतार मानते थे। मीराबाई ने अपनी भक्ति भावना को पदों में व्यक्त किया है। उनकी सारी कविता गेय है। मीरा के सभी पदों के आलम्बन गिरधर हैं। पर सूर की भांति बालकृष्ण नहीं वरन प्रौढ़ कृष्ण हैं मीरा के पति हैं। इसलिए समस्त पद माधुर्य भाव से ओत-प्रोत हैं। उन्होंने मेवाड़ से वृंदावन तथा द्वारका पुरी की यात्रा की थी। अतः संक्षेप में हम यह कह सकते हैं कि मीरा की भाषा साहित्यिक भाषा नहीं है। उसमें प्रवाह नहीं माधुर्य अवश्य है। उनकी शैली सीधी सादी सरल और आकर्षक है। मीरा बाई के युग में पर्दा प्रथा और सामाजिक रीति रिवाज के कठिन बंधन थे। लेकिन हरि प्रेम के कारण उन्होंने सारे बंधन तोड़ दिए। कह सकते हैं कि वर्तमान में परम्पराओं से मुक्ति के मार्ग की वे पथ प्रदर्शक हैं। अमृता शुक्ला 



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