महंगे सपने

महंगे सपने

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आज भी घर आते ही सिर घुटनों में देकर बैठ गया मोहन‌। रमा ने देखा, तो फटाफट पानी का गिलास लेकर दौड़ी आई।

"क्या हुआ शुभम के बापू ? कहीं बात नहीं बनी आज भी?"

"अरी भाग्यवान! इतना आसान नहीं है, जितना तू समझ रही है। बैंक गया था सरवन के साथ। वो लोग भी लोन देने को तैयार हैं, पर ब्याज की दर छह प्रतिशत से एक पैसा कम करने को तैयार नहीं। मकान के कागज़ात गिरवी रखने पड़ेंगे, सो अलग।" बेबसी की लकीरें उभर आई थी फिर से चेहरे पर।  


कम पढ़े लिखे होने की टीस दिल को तार तार कर रही थी, आज भी जिसकी वजह से समाज में अपने से आगे बढ़ चुके अपने ही भाई बहनों के तानों उलाहनों से व्यथित हो उठता था मन अक्सर। अगर आज वह भी पढ़ा लिखा होता, तो कहीं अच्छी नौकरी कर वह भी अच्छा कमाता और अच्छी तरह से अपने बेटे के सपनों को पूरा कर पाता। पर यह राह इतनी आसान नहीं थी। बड़ी मुश्किल से पहले ही बारहवीं कक्षा तक अपने बेटे को दूसरों की देखा देखी गाँव के इकलौते पब्लिक स्कूल में पढ़ाया था, जिसका खर्च वह अपनी छोटी सी किराने की दुकान से बड़ी मुश्किल से निकाल पाता थे। घर की छोटी छोटी ज़रूरतों को भी दरकिनार करते हुए बस अपनी अधूरी आकांक्षाओं को अपने बेटे के माध्यम से पूरा होता देखना चाहते थे दोनों पति-पत्नी। धन की कमी गाहे-बगाहे आगे आ ही जाती थी। थोड़ी बहुत जमापूंजी भी थी, पर दो जवान होती बेटियों की शादी की भी चिंता थी, जो अपनी स्नातक की डिग्री पूरी कर गाँव के ही प्राइमरी विद्यालय में अध्यापन का कार्य कर रही थी।


जे ई ई का नतीजा भी घोषित हो चुका था। शुभम भी एक तो रेंक कम होने की वजह से अपनी पसंद के कॉलेज में दाख़िला न मिलने की वजह से परेशान था, ऊपर से यह डोनेशन की मांग की वजह से बापू को रोज़ कहीं न कहीं धक्के खाते देख बहुत दुखी होता था उसका मन। काश! वह भी कोई रइसजादा होता, तो उसके भी ठाठ होते। स्कूल के अपने दोस्तों के सामने उपहास का पात्र न बनना पड़ता उसे, जो हर वीकेंड में अपनी अपनी मोटरसाइकिल पर सवार होकर शहर घूमने जाते थे और फिर अपने एंड्रॉयड फोन पर तस्वीरें दिखाकर उसे चिढ़ाते थे। पर उसने भी ठान ली थी कि एक दिन वह उन सबसे आगे निकल जाएगा पढ़ लिखकर और भी कितने सुनहरे सपने संजोए हुए थे उसने, जिनकी तामील होना अब मुश्किल लगने लगा था। जैसे ही घर के अंदर दाखिल हुआ, मां बापू की वार्तालाप सुनकर एक पल के लिए कदम दरवाज़े पर ही ठिठक गए।


" माँ बापू को आखिर कब तक परेशान करता रहूँगा? वीना और सविता दीदी की शादी भी करनी अभी तो। घर गिरवी रख पढ़ने के लिए तो भेज देंगे, पर किसी भी वजह से अगर मैं सफल नहीं हो पाया अपने लक्ष्य में तो? प्रतियोगिता के इस दौर में हजारों छात्र इंजीनियर बन कर निकलते हैं हर साल, पर अगर अच्छी नौकरी न मिली, तो माँ बापू के इतने वर्षों के त्याग का क्या मतलब? और नौकरी मिलने पर भी तो बैंक का कर्ज उतारने में ही जिंदगी के कितने साल निकल जाएंगे। यह महंगी शिक्षा प्रणाली भी हम लोगों के लिए थोड़ी बनी है? तो मैं क्यों फँस रहा हूं इसके भ्रमजाल में?"

 एक फैसला लिया और अंदर जाकर साफ साफ कह दिया,"बापू! आपको परेशान होने की जरूरत नहीं है ज्यादा। सारे बच्चे डाक्टर और इंजीनियर ही नहीं बनते। मैं भी वीना और सविता दीदी की तरह स्नातक कर कहीं छोटी मोटी नौकरी कर लूँगा और उसके बाद प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करूँगा। थोड़ी देर से ही सही, पर आपके सपनों को पूरा करने की कोशिश करूँगा। आप परेशान न हों बिल्कुल भी। धन की कमी मुझे मेरे लक्ष्य और आपके सपनों की पूर्ति की ओर अग्रसर मेरे कदमों को ज्यादा दिनों तक नहीं रोक पाएगी।" एक आत्मविश्वास झलक रहा था शुभम की बातों में और गर्व की चमक थी माँ बापू की आंखों में।


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