मैं हारूंगी नहीं
मैं हारूंगी नहीं
उड़ते हुए कैलेंडर की बदलती हुई तारीखों व दिनों को देखकर, दीक्षा ना जाने कहाँ खो गई स्मृतियों के भंवर में।
अभी छः महीने हुए थे विवाह हुए। पति सुरजीत फौज में थे। जल्द ही बच्चे की किलकारी गूंजने वाली थी बहुत ख़ुश थे दोनों। पर होनी को कौन टाल सकता है। कुछ दिन बाद खबर आई की सरहद पर उसके पति कैप्टन सुरजीत शहीद हो गए।
उस पर दुःखों का पहाड़ टूट पड़ा। पति अपने माता-पिता की इकलोती संतान थे। कुछ बाद उसने बेटे को जन्म दिया। बच्चे का पालन-पोषण,शिक्षा सास-ससुर की देखभाल सारी जिम्मेदारी उसने निभाई। बेटा पढ़ -लिख कर विदेश चला गया। वहाँ विवाह करके बस गया।
सास-ससुर भी दुनियाँ छोड़कर जा चुके थे ,पति की यादें ही उसके जीवन का हौसला थी। वह कहा करते थे - मैं रहूँ ना रहूँ कठिन से कठिन परिस्थिति में भी हार मत मानना। जीवन की अंतिम सांस तक लड़ना। खुद को कभी कमजोर मत समझना। मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूँ।
वह मन ही मन उनसे बातें किया करती थी। और कहती थी की आपकी मौजूदगी के एहसास ने तो मुझे जिन्दा रखा है। अपनी आखरी सांस तक मैं हारूंगी नहीं।
