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Swity Mittal

Inspirational


4.5  

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माँ मैं तो तेरी परछाई हूँ

माँ मैं तो तेरी परछाई हूँ

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"गीतिका बेटा, तुम्हारी माँ को दवाई देने का वक्त हो गया। दवाई दी या नहीं?"

"हाँ मम्मीजी अभी देती हूँ"।


"अरे बेटा, तुम्हें कितनी बार समझाया है घर के काम थोड़े बाद में कर लिया करो। पहले समधन जी का ख्याल रखना जरुरी है"।

जैसे ही सविता जी ने अपनी बहू गीतिका को आवाज दी वो जल्दी से कमरे में गयी और पलंग पर सोयी हुई माँ को उसने हाथ का सहारा लगाकर उठाया और अपनी गोदी में उनका सिर रखकर फिर उनका मुँह खोला और उन्हें दवाई दी। उसके बाद रोज की तरह माँ से बात करने लगी।

गीतिका बोली "पता है माँ आज साहिल सुबह ऑफिस के लिए घर से जल्दी निकल गए,उनके किसी क्लाइंट के साथ मीटिंग थी उनकी, मुझे कहकर गए थे गीतू आज मेरी तरफ से माँ से माफी मांग लेना आज उनसे बिना बात किये हुए ही जा रहा हूँ, माँ मुझे तो समझ नहीं आता है लोग कैसे अपनी बेटी को कोख में ही मार देतें है, अपने अंश को अपने से अलग करना कितना कठिन होता होगा ना, अब तुम सोच रही हो ना ये गीतू आज ऐसी बातें क्यों कर रही है, माँ पड़ोस में जो शर्मा आंटी है ना अरे वही जिनके बेटे अमन की शादी पिछले साल हुई थी, उसकी पत्नि प्रेग्नेंट थी और जब उन्होंने बच्चें का लिंग परिक्षण करवाया तो बेटी होने पर उसे गर्भ में मारने का फैसला लें लिया,और आज पता चला कि शर्मा आंटी ने बहू का गर्भपात करवा दिया,माँ एक औरत ही औरत की सबसे बड़ी दुश्मन होती है आज तक में सुनती आयी हूँ, लेकिन अब तो अपनी आँखों से देख भी रही हूँ।

सच में माँ मैंने पिछले जन्म में कोई पुण्य किये थे, जो तुमने इतनी मुश्किलों के बाद भी मुझे पैदा किया, वरना मेरे जैसी अभागन को तो पिता ने कोख में ही मार दिया होता, मैं लड़की थी इसलिए ही तो पैदा होते ही तुझे मेरे साथ अकेले ही इस सफर में छोड़ दिया था, ये तो माँ तू ही थी, जिसने मुझे इस समाज से लड़कर भी अच्छी परवरिश दी,माँ मैंने कभी पिता को नहीं देखा, लेकिन तुझमें मैंने माँ और पिता दोनों का प्यार महसूस किया है, मेरे लिए तो तू ही मेरी जिंदगी है माँ,एक तू ही तो थी जो मेरी हर बात को बिना कहें समझ जाती थी,तो आज मैं कैसे तेरे मन की पीड़ा को नहीं समझूंगी, माँ तेरा और मेरा रिश्ता तो उसी दिन जुड़ गया था जब मैं तेरी कोख में आयी थी तो फिर तू ही बता कैसे मैं जीवन के इस मोड़ पर तुझे अकेला छोड़ दूँ, जब तुझे मेरी सबसे ज्यादा जरुरत है"

माँ मैं तो तेरी परछाई हूँ "और परछाई तो कभी साथ नहीं छोड़ सकती है ना, वो तो जीवन भर साथ निभाएगी, जहाँ तू जाएगी मैं तेरे साथ ही जाउंगी माँ, तो क्या हुआ आज तू कुछ बोल नहीं सकती है, मैं तेरे बिना बोले भी तेरे मन को पढ़ सकती हूँ, जैसे बचपन में तू समझ जाती थी, गीतिका की आँखों में आंसू थे, दूसरी तरफ पलंग पर एक बेजान शरीर को लिए लेटी हुई आभा जी भी कुछ कहना चाहती थी, मानों कह रही हो कि तुम्हें जन्म देने का मेरा फैसला कभी गलत हो ही नहीं सकता था, आखिर कैसे मार देती मैं तुम्हें कोख में, मेरा अपना अंश थी तुम, मेरा प्यार, मेरा समर्पण और उन सबसे भी बड़ा मुझे पूर्ण करने वाली तुम ही तो थी।

गीतिका सोच रही थी काश! सब पहले की तरह ठीक हो जायें, एक बार फिर से वो अपनी माँ की आवाज सुन पाएं, फिर से उनकी गोदी में सिर रखकर सुकून भरी नींद लें पाएं, लेकिन पता नही कब वो दिन आएगा।


पूरे 3साल हो गए है आभा जी को कोमा में गए हुए, उस भयानक एक्सीडेंट में आभा जी बच तो गयी लेकिन सिर्फ उनका शरीर ही बचा था, वो भी एक बेजान लाश की तरह,उन्हें संभालने वाला कोई नहीं था, बिल्कुल अकेली थी वो, और गीतिका भी रोज -रोज उनसे मिलने नहीं जा सकती थी, बहुत परेशान थी वो किसी से कुछ कह नहीं सकती थी, पिता को तो उसने कभी देखा ही नहीं था, ये तो उसकी माँ आभा जी का ही त्याग और समर्पण था जो उसे साहिल जैसा पति और सविता जी जैसी सुलझी हुई सास मिली, गीतिका की परेशानी को सविता जी ने भांप लिया था और उन्होंने गीतिका की परेशानी को समझते हुए उसे आभा जी को अपने साथ ही रखने के लिए कहा।

एक बार तो गीतिका को विश्वास नहीं हुआ की एक सास कैसे इतनी नरम दिल हो सकती है जो बहू की माँ को अपने घर में रखने को तैयार हो जायें, किन्तु जब उसने सविता जी के मुँह से ये बात सुनी कि "बेटा माँ और बेटी का रिश्ता क्या होता है मैं भी अच्छी तरह से समझ सकती हूँ, आखिर मैं भी तो एक बेटी हूँ, आज सास बन गयी हूँ लेकिन माँ बेटी के रिश्ते की अहमियत को नहीं भूली हूँ, जीवनदायनी के लिए अगर कुछ करने का मौका मिले तो उस से बड़ा सौभाग्य और क्या होगा, तुम्हारा रिश्ता हमसे पहले आभा जी से है, उन्होंने तुम्हें जन्म दिया है, आज तुम्हारा ये अस्तित्व आभा जी की वजह से ही तो है और ये तुम्हारा हक है कि तुम अपना फर्ज निभाओ, मैं और साहिल तुम्हें कैसे रोक सकते है, बहू बन जाने का मतलब ये तो नहीं है कि अब माँ के लिए तुम उनकी बेटी नहीं हो, एक बेटी की भी तो अपनी भावना होती है, हम तुम्हारी इन भावनाओं का सम्मान करते हैं", अपनी सास के मुँह से ये सुनकर गीतिका के मन में उनके लिए आदर और भी बढ़ गया था।


सविता जी और साहिल ने इन 3सालो में कभी गीतिका को इस बात का एहसास नहीं होने दिया कि आभा जी उनके लिए कोई मुसीबत है, बल्कि साहिल तो दामाद ना बनकर एक बेटे की तरह ही उनकी देखभाल करता था। उन दोनों के साथ की वजह से ही तो आज भी गीतिका अपना फर्ज निभा रही थी, लोग बेटों के लिए तरसते हैं लेकिन भूल जाते हैं बेटा और बेटी दोनों उनका ही अंश होते है, अगर भावना दिल से जुड़ी होगी तो दोनों ही अपना फर्ज निभाएंगे और अगर मन नहीं होगा तो दोनों ही मुँह फेर लेंगे, गीतिका ने बचपन से अपने साथ माँ को खड़े पाया था, तो आज वो कैसे उनसे मुँह फेर सकती थी,आज भी उसके मन में एक आशा है कि एक दिन माँ फिर से पहले की तरह उससे बात करेंगी, और ये सविता जी की समझ से ही तो ये संभव हो पाया था कि गीतिका एक बेटी और बहू दोनों का फर्ज बखूबी निभा रही थी।


आज तक जो माँ परछाई बनकर हर कदम पर उसका साथ देती आयी थी,उसके हर दुःख और तकलीफ से हुई पीड़ा को अपनी ममता से कम करने का प्रयत्न करती थी, आज उस माँ की बेटी अपनी माँ की परछाई बनकर अपना कर्तव्य निभा रही थी। सच ही तो कहते हैं -

"माँ जीने का अधिकार दे मुझे, देखना हर फर्ज अपना मैं निभाऊंगी। तेरी परछाई बनकर हमेशा तेरे साथ खड़ी हो जाउंगी, नहीं छोडूंगी मैं हाथ तेरा, बुढ़ापे की लाठी बन जाउंगी। लड़का ही नहीं होता सब कुछ ये सबक सबको सिखाउंगी, हर मुसीबत में तेरी मैं तेरी हमसफर बन जाउंगी।"



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