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Swity Mittal

Inspirational


4.5  

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क्या बहू होना सजा है?

क्या बहू होना सजा है?

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सलोनी तीनों बहन भाई में सबसे छोटी और सबकी लाडली थी, बचपन से ही उसे घर में वो सब करने की छूट मिली थी, जो उसकी बड़ी बहन और भाई को भी नहीं मिली| उसके पापा थोड़े पुराने ख़्यालात के थे, इसलिए उसकी भाभी कभी अपने ससुर से बात नहीं करती थी, अगर उसे कुछ कहना होता तो वो उसके भाई या सलोनी के माध्यम से अपनी बात रखती थी, लेकिन सलोनी को ये बात अच्छी नहीं लगती थी कि भाभी को हमेशा अपनी बात कहने के लिए किसी ना किसी का सहारा लेना पड़े, वो चाहती थी कि उन्हें पूरी स्वतंत्रता मिले कि वो भी अपने विचारों और भावनाओं को खुलकर व्यक्त करें।

वो अपने घर में इस बात को लेकर काफी बार बहस भी करती थी कि क्यों हम भाभी को वो समान अधिकार नहीं देतें है जो उसे और उसकी बड़ी बहन को मिले है, आखिर वो भी तो घर का ही हिस्सा है, उनकी भी अपनी इच्छाएं और सपनें है, लेकिन कभी सलोनी की दादी तो कभी उसकी माँ उसे ये कहकर चुप कर देतें थे कि अभी तुम ये बात नहीं समझोगी जब दूसरे घर जाओगी सब समझ आ जायेगा कि बहुओं को क्यों इतना बोलने नहीं दिया जाता है ससुराल में? क्यों उन्हें जिम्मेदारी निभानी पड़ती है?


सलोनी की दादी हमेशा उसे यहीं कहती कि बेटी और बहू दोनों में फर्क रखना चाहिए अगर बहू को बहुत ज्यादा खुली छूट दे दी जायेगी तो वो अपनी घर गृहस्थी को ना संभाल कर दिनभर बाहर ही घूमती रहेगी, लड़की के गुण और संस्कार तो तभी दिखते हैं जब वो अच्छी तरह अपना घर संभाले | सलोनी ये बात जानती थी कि उसकी भाभी बहुत पढ़ी -लिखी और शांत प्रकृति की हैं शायद इसलिए वो घर के वातावरण के अनुसार खुद को ढाल चुकी हैं, लेकिन भाभी के साथ ऐसा बर्ताव देखकर मन ही मन उसे शादी से डर लगने लगा उसे लगता था शादी के बाद लड़कियों को बस एक ख़ुटे से बाँध दिया जाता हैं, उनकी इच्छाओं का कोई ध्यान नहीं रखता वैसे भी ये उसके घर में भी तो होता हैं हमेशा उसकी भाभी के साथ, जिन्हें हर छोटी -छोटी बात के लिए दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता हैं| सुबह जल्दी उठकर रात को सबसे लेट वो सोती हैं, हर जिम्मेदारी को बखूबी निभाती हैं, लेकिन कभी कोई प्रशंसा में दो शब्द नहीं कहता हैं उल्टा ये कहते हैं कि ये तो घर की बहू की जिम्मेदारी हैं, हमने भी तो किया था, जब हम बहू बनकर आये थे ।

सलोनी सोचती थी कि आखिर क्यों आज लोग ये बात नहीं समझते हैं कि बहू भी तो आखिर इंसान ही हैं, और ये जरुरी तो नहीं जो परेशानियाँ दादी और माँ ने झेली थी, भाभी के साथ भी बिल्कुल वैसा ही हो, क्या ये सब करने के लिए ही एक माँ अपने बेटे का ब्याह करती हैं।

     कहते हैं कि एक औरत की सबसे बड़ी दुश्मन दूसरी औरत होती है और उसे अपने घर में ही ये देखने को मिलता था कि किस प्रकार उसकी दादी और माँ उसकी भाभी के साथ रुखा व्यवहार रखते हैं, कभी -कभी मन में ये ख्याल आता कि अगर किसी दिन परेशान होकर भाभी भैया को लेकर घर से अलग हो गयी तो उसकी दादी, माँ और पिताजी का क्या होगा, क्योंकि उसका भाई ही घर में अकेला मर्द कमाने वाला हैं ।

सलोनी अपनी भाभी को बहुत चाहती थी शायद उनकी हमउम्र होने की वजह से उनका दर्द समझती थी, और ये बात जानती थी कि एक लड़की पर क्या बितती हैं जब वो अपना घर छोड़कर दूसरे घर में आती हैं, उस घर में उसके नये रिश्ते बनते हैं, जिनके सहारे वो अपना दर्द भुलाने की कोशिश करती हैं, ऐसा नही था कि उसकी दादी और माँ जीवन के इस दौर से नही गुजरे थे परन्तु वो दोनों अब अपना समय भुलाकर सास का रिश्ता निभाने में लगी थी, वो एक बात भूल चुकी थी कि सास होने के साथ -साथ वो एक माँ भी हैं और उस से पहले एक औरत हैं ।

उन्होंने उसकी भाभी को घर के प्रति सारे फर्ज निभाने तो अच्छी तरह से सिखा दिये लेकिन उसके हक उस से छीन लिए, घर में अपनी बात रखने का हक, अपनी मर्जी से घूमने का हक, अपनी मर्जी से कुछ करने का हक,हर छोटी से छोटी बात को उसे घरवालों की इजाजत लेकर ही करना होता था, और उसको भी उन्होंने कभी बड़ो के प्रति सम्मान तो कभी कर्तव्यों का नाम दें दिया।

सलोनी ने सोच लिया था कि वो शादी करके दूसरे घर नहीं जाएगी नहीं तो उसका जीवन भी फर्ज निभाते -निभाते और दूसरों को खुश रखने में ही चला जायेगा | कुछ महीनों के बाद घर में सलोनी की शादी की बात चलने लगी, एक -दो रिश्तों को तो उसने बहाने से मना कर दिये, लेकिन इस बार जो रिश्ते वाले आ रहे थे जब वो उनके लिए भी मना करने लगी तो उसके पापा ने पूछा आखिर क्यों उसे शादी से डर लगता हैं, अभी तो वो बड़ी हो गयी हैं और उम्र भी शादी के लायक हैं, तब सलोनी ने अपने पापा से कहा पापा,

   "क्या बहू होना अपराध है?"


अगर उसकी शादी हो जाएगी तो फिर उसे भी जिम्मेदारी उठानी होगी, क्योंकि वो भी तो बहू बन जाएगी, फिर ससुराल में वो अपनी मर्जी से कोई काम नहीं कर पायेगी, हर बात के लिए उसे बड़ो की इज़ाज़त लेनी होगी और जो स्वतंत्रता उसे मायके में मिली हुई हैं वो भी तो ख़त्म हो जाएगी, इसलिए उसे तो शादी करके दूसरे घर नहीं जाना हैं क्योंकि उसे ससुराल में बहू बनने से डर लगता हैं ।

सलोनी के पापा उसकी बात सुनकर बिल्कुल चुप हो गये और फिर गहरी सांस लेते हुए बोले "नहीं बेटा बिल्कुल नहीं बहू भी तो बेटी ही होती है", तब सलोनी बोली नहीं "पापा अगर बेटी होती तो फिर निधि भाभी भी तो इस घर में एक बेटी की तरह ही रहती, आज तक वो तो बहू बनकर ही सारे फर्ज निभा रहीं हैं, कहने को तो आप भी उन्हें बेटी बनाकर इस घर में लाये थे, लेकिन उन्हें वो हक कभी नहीं दिया, आज तक वो अपनी हर जिम्मेदारी बखूबी निभा रहीं हैं, लेकिन क्या कभी किसी ने उनकी खुशियों के बारे में सोचा हैं, क्या आप उनसे वैसे ही व्यवहार करते हैं जैसा आप मेरे और दीदी के साथ करते हैं, सिर्फ कहने से ही तो बहू बेटी नहीं बन जाती हैं ना पापा, अब आप ही बताइये जब मेरे खुद के घर में मेरी भाभी को कभी बेटी नहीं समझा गया तो मैं कैसे मान लूँ कि कोई मेरी शादी के बाद मुझे बेटी की तरह प्यार देगा।"

सलोनी के पापा ने जब उसके मुँह से ये सब सुना तो एक बार तो उन्हें बहुत बुरा लगा लेकिन बाद में उन्हें अपनी गलती समझ में आयी कि सलोनी सही तो कह रहीं हैं जैसा आज वो देख रहीं है कल आगे वैसा व्यवहार उसके साथ भी तो हो सकता है,और ये बात भी तो सही हैं हम बहू से अपेक्षा रखते हैं कि ससुराल में आने के बाद वो अपने मायके की तुलना में ससुराल को ज्यादा महत्व दें तो फिर हमारा भी तो फर्ज बनता हैं कि बहू को इतना प्यार और अपनापन दें कि वो ससुराल में ही अपना मायका ढूंढ लें, ताकि एक बेटी को कभी ससुराल के नाम से डर ना लगे, उसे कभी ऐसा ना लगे कि जब वो बहू बन जाएगी तब उसका जीवन सिर्फ जिम्मेदारियों तक ही सीमित हो जायेगा,उसके सपनों का कोई महत्व नहीं होगा| अगर हम बहू को बेटी कह कर लाते हैं तो उसे वो हक भी दें कि कभी उसे ये महसूस ना हो कि "क्या बहू होना अपराध हैं "?


सलोनी के पापा ने उस से कहा कि जो बात आज तक किसी ने नहीं सोची वो उनकी बेटी ने सोची इस बात पर उन्हें अपनी बेटी पर बहुत गर्व है, कौन कहता है कि ननद कभी दोस्त या बहन नहीं हो सकती हैं, जिस तरह सलोनी को सदैव अपनी भाभी की पीड़ा अपनी सी लगी अगर हर घर में ऐसी ही ननद हो जायें तो किसी भी भाभी को कभी अपनी बहन की कमी महसूस नहीं होगी और ना ही कोई बेटी शादी से पहले ये सोचेगी कि क्या बहू बन कर उसने कोई पाप किया हैं बल्कि खुशी से वो अपना एक घर छोड़कर अपने दूसरे घर में आयेगी ।


आज सलोनी बहुत खुश थी कि उसकी भाभी को भी वो हक मिलेंगे जिनकी हकदार वो वास्तव में हैं, दूसरी तरफ निधि के मन से भी ये दुआ निकल रहीं थी कि काश! हर जन्म में उसे सलोनी जैसी ही ननद मिले जो दोस्त बनकर तकलीफ समझें और एक बहन बनकर जीवन के हर पल में साथ दें।

दोस्तों ये बात बिल्कुल सही हैं कि काफी घरों में आज भी बेटी और बहू में अंतर किया जाता हैं, क्योंकि सास ये सोचती हैं कि जो उनके साथ हुआ वो उनकी बहू के साथ भी हो , लेकिन ये बात बहुत गलत हैं, अब जमाना बदल रहा हैं तो हमें भी अपनी सोच को बदलना चाहिए और जिस बात से कुछ अच्छा हो आखिर उसे अपनाने में क्या बुराई हैं, ये मेरा निजी अनुभव हैं कि मेरी सास मुझे बेटी की तरह मानती हैं, वो हमेशा कहती हैं कि जो तकलीफ उन्होंने सहन की थी वो उनकी बहुओं को कभी ना मिले और मेरी ननद बिल्कुल मेरी बड़ी बहन की तरह हैं, जो हमेशा मुझे प्रोत्साहित करती हैं।



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