Lalita Vimee

Tragedy


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Lalita Vimee

Tragedy


लॉक डाउन

लॉक डाउन

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उसे ऊंचाई से कूदने में बहुत ही अच्छा लगता था ।बहुत ही नियंत्रित तरीके से कूदती थी वो मजाल कहीं भी थोड़ा डगमगा जाए। स्कूल की खेल अध्यापिका तो उसे दो बार ऊंची कूद प्रतियोगिता में भी ले जा चुकी थी।प्रथम स्थान के साथ इनाम भी तो मिला था ।बड़ा सा चिकने कागच का चमकीला सर्टिफिकेट एक बहुत ही सुंदर सा तमगा, भागती हुई घर पहुंची थी की बाबा को दिखाऊंगी, पर माँ ने बाबा के पास पहुँचने से पहले ही उसे गली में ही चुप चुप करके रोक लिया था।

"पर क्यों माँ, में तो दिखाऊंगी बाबा को मुझे शाबासी मिलेगी।"

"रहने दे छोरी, गर तेरे बाबा ने देख लिया तो ये पढ़ाई भी छुड़वा कर घर बिठा देगा, ऐसी शाबासी देगा तेरे को।"

मां की हर बात पर यकीन था उस को ,एक मां ही तो थी जो हर बात में उसके साथ रहती थी ,कितनी बार बाबा के हाथों से पिटने से बचाया था ।झूठ भी बोला था उस के लिए।तो माँ क्या मैं अब खेलना बंद कर दूं।गली में खेलने की कोई जरूरत नहीं है वहाँ स्कूल में ही खेला करो। बाबा को पता चल गया तो तेरा स्कूल जाना तो बंद होगा ही मेरा भी जीना हराम हो जाएगा।वो छिप कर खेलती,प्रतियोगिताओं में भी जाती, हर बार इनाम ओर तमगे लाती , मां उन को पुराने कपड़ो की तहों में छिपा कर लोहे की बड़ी वाली सन्दूक में रख देती।

बाबा घर के अंदर बहुत ही कम आते थे। वो इकलौती ही औलाद थी अपने माँ बाबा की , परंतु बाबा ने कभी भी अपना स्नेहिल हाथ उस के सिर पर नही रखा था।लड़की तो दूसरे घर का धन है स्यानी होते ही गंगा नहा लूँगा ।वो ज्यादातर अपने दोनों भाइयों के घर ही आते जाते थे, उन दोनों के दो दो लड़के थे।जो बाहर शहर के महंगे स्कूलों में पढ़ते थे।।कभी राखी या दीवाली पर ताई और चाची आकर उस के हाथ पर दस रुपये रख जाती थी।बाकी न कभी वो उन के घर जाती और न ही वो कभी आते और उसे बुलाते।बाबा को ये बहुत बड़ा दुख था कि उन के कोई बेटा नहीं है।।वो घर आते ही उन दोनों माँ बेटी को कोसने लग जाते।

एक दिन तो माँ ने कह ही दिया था ,रीता के बाबा इस मेंं मेरा ओर छोरी का तो कोई क़सूर नही जो आप चौबीसों घन्टे हम लोगों को कोसते हो।फिर जो हश्र मां का किया था बाबा ने ,उसे आज भी याद आता है तो रूह कांप जाती है। अब वो दसवीं कक्षा में आ गई थी , मां के लिए यही गनीमत थी की अच्छे नम्बरों और खेलों में भी होशियार होने के कारण ,सरकारी स्कूल में फीस भी नहीं लगती थी, बल्कि वजीफा भी मिल जाता था। घर खर्च के लिए माँ दो तीन पशु पाले रखती थी ,कुछ सिलाई कढ़ाई से वो घर खर्च निकाल लेती थी। बाबा कुछ काम नहीं करते थे हाँ उनकी थोड़ी जमीन थी खेती बाड़ी की, जिसमें उन्होंने तो कभी काम नहीं किया ।हाँ, उनके भाई जरूर बोते थे उन के हिस्से की जमीन और गेहूँ की फसल के बाद दोतीन बोरी गेहूँ उनके घर भीख की तरहं फैंक जाते थे।

मजे कर रही माँ बेटी दोनू,सारे साल का खर्चा हम देवें अर ये हांडें मटरगश्ती में।एकबार दुखी होती माँ ने उसके चाचा को बोल भी दिया था।

देवर जी कोय भीख थोड़े ही देते हो इतनी जमीन तो आपके भाई के हिस्से की भी है।जो ये किसी को ठेके या साझे देते तो कितने पैसे मिलते हमें ,और आप ये दो बोरी गेहूँ भी भीख की तरहं देते हो।

चाचा ने बाबा को ये सब तो बताया ।बाबा ने घर आकर माँ की जो हालत करी माँ दो दिन बिस्तर से ही न उठ पाई।उस घटना के बाद माँ को पता नहीं क्या सूझी, बोली, लाडो आज के बाद कहीं खेलने नहीं जाओगी , बस पढ़ाई और सिर्फ पढ़ाई गर तुम्हारे बाप को पता चल गया तो तुम्हारी पढ़ाई छुड़वा कर बख्त से पहले ही किसी अपने जैसे अनपढ़ और निखट्टू के पल्ले बाँध देगें बेटा,और फिर सारी उम्र मेरे की तरहं खटती रहनाये खेल कूद तो बड़े लोगों की बात है बेटा।घर से बाहर नहीं निकलना ,कहीं भी खेलने नहीं जाना।एक अच्छे भविष्य के मोह में उसने खुद के वर्तमान को लॉकडाउन कर लिया था।

बचपन को अपनी प्रतिभा को अनदेखे भविष्य के लिए होम करना उसकी मज़बूरी ही नहीं जरूरत भी थी।

बारहवीं ज़मात में पूरे कस्बे में सबसे ज्यादा नम्बर आये थे उसके। मास्टरनी साहिबा जो घर के हालात से पूरी तरहं वाकिफ थी, ने न केवल जे बी टी की पढ़ाई के लिए फार्म भरवाने मेंं मदद की बल्कि बाबा को भी ये झूठ बोल कर मनाया कि पहले की तरहं अब भी पढ़ाई बिल्कुल मुफ्त होगी ।हालांकि उसके ही कस्बे के सरकारी संस्थान में दाखिला हुआ था। कुछ फीस का इतंजाम तो माँ ने कर दिया था,बाकी कुछ पैसे मास्टरनी साहिबा ने भी दिए थे। ये कह कर कि मेरी बेटी जैसी है और इन थोड़े से पैसों से मुझे कोई कमी नहीं होगी ,पर लड़की का भविष्य संवर जायेगा।

वोअपनी पढाई के साथ आठवीं तक के बच्चों को टयूशंन भी पढ़ाती थी, पढ़ाई के खर्चे के साथ थोड़ी मदद माँ को भी मिल जाती।जेबीटी की परीक्षा में भी वो पूरे कस्बे में प्रथम आईं थी।उसे लगा शायद अच्छे भविष्य ने ज़िंदगी के दरवाजे पर दस्तक दी है।बहुत इच्छा थी कि किसी स्कूल में नौकरी कर ले पर बाबा ने इजाज़त नही दी। हाँ अब वे थोड़ा नरम जरूर हो गए थे उसके प्रति माँ के प्रति, उन्होंने अपनी जमीन भी अपने भाईयों से हिसाब कर के ले ली थी। किसी अन्य को ठेके पर दे दी थी।जिससे घर में चार पैसे भी आने लग गए

वो घर में बच्चों को टयूशंन पढ़ाती थी। बाबा से छिपा कर और माँ को बताकर प्राईवेट बी ए का फार्म भी भर दिया था। लग रहा था, लॉक डाउन में कुछ छूट मिली है ,तो शायद ये खुल भी जाएगा ।तभी एक बहुत बड़े व्यापारी घर से रिश्ता आ गया था उसके लिए। बाबा ने औऱ माँ ने तुरन्त हाँ कर दी थी। बिना किसी दहेज़ और खर्च के एक बड़े घर की बहू बन गई थी वो। पढ़ें लिखे पैसेवाले लोग थे। सब एक दूसरे की इज्जत करते थे ।घर में बहुत अच्छा माहौल था। बड़े जैठ के दो बच्चे भी थे। पति भी बहुत प्यार और मान देने वाले थे। उसे लगा कि लॉक डाउन का अंत हो गया। जो अच्छे भविष्य का सपना उसने देखा था उस के बिल्कुल करीब ही खड़ी थी।

एक दिन बड़े इसरार से अपनी योग्यताओं का हवाला देते हुए पति से नौकरी करने की इजाजत माँगी, तो उन्होंने बड़े ही रूखे स्वर में.कहा "लोग हमारे कंपनी में काम करते हैं और तुम बाहर नौकरी करने जाओगी। किस चीज की कमी है,तुम्हें यहाँ।"

"मैं पैसे के लिए नहीं बल्कि अपनी आत्मसंतुष्टि के लिए नौकरी करना चाहती हूँ।। मैं अपने ज्ञान को दूसरों में बांटना चाहती हूँ।"

बड़े भैया के बच्चों को पढ़ाओ मेडम जी और फिर थोड़ा कोशिश करते हैं कि जल्द ही अपने बच्चे भी हों,और आप के सम्पूर्ण ज्ञान से लाभान्वित हो सकें।चुहल करते हुए पति ने अपनी बाहों में कस लिया था। में समझ ग ई थी की ये एक और लॉक डाउन है।आज उन्नीस वर्ष बीत गए हैं। उसकी बेटी मेडिकल की पढ़ाई कर रही है और बेटा बारहवीं में है। उसने रसोई से घर की दहलीज के अंदर तक सीमित कर लिया था खुद को। यदाकदा बच्चों के स्कूल में जरूरत होती तो चली जाती,वो भी पति गाड़ी और ड्राइवर पहले ही भेज देते।

वक्त यूंही गुजर रहा था अब उसे भी इस लॉक डाउन की आदत पड़ चुकी थी।बाहर जाते तो जैसे घबराहट सी होती थी। बाबा नहीं रहे थे।माँ बूढ़ी हो चुकी थी।उन से मोबाईल पर लगभग दिन में दो बार बात कर लेती थी, उन की एक विधवा भतीजी भी उन्हीं के पास रहती थी दोनों को एक दूसरे का सहारा था। वो उन के पास भी साल में एक या दो बार ही जा पाती वो भी सिर्फ चंद घन्टों के लिए ही।

उसका बहुत मन करता कि घर के पास जो ये ऊंचा चबूतरा है वहाँ से छलांग लगाऊं एक बार नहीं कई बार, पर फिर कोई लक्ष्मण रेखा आड़े आ जाती।

अभी दस दिनों से अपने देश में ही नहीं लगभग तमाम विश्व में कोविड-19 यानि की कोरोना बीमारी फैलने से सरकार ने एहतियातन लोगों को अपने अपने घरों में ही रहने के आदेश दिएं है।ताकि इस लाइलाज बीमारी से बचाव हो सके।व्यवसाय ही नहीं, स्कूल कालेज सभी संस्थान बंद है। आसमान में इक्का दुक्का पक्षी जरूर नज़र आने लगे हैं , जिन्हें देखे हुए मुद्दत हो गई थी।सड़कें और गलियाँ बिल्कुल शाँत हैं।

पति सारा दिन फोन पर उलझे रहते हैं।कभी मोबाईल तो कभी लैंड लाईन, फिर भी यही कहते हैं,पागल कर दिया इस लॉक डाउन ने तो।बच्चे तो आनलाईन पढाई भी करते हैं। खेलते भी हैं, टीवी भी देखते हैं फिर भी बोरियत।

शाम को जब सब को चाय दूध देने कमरे में आई तो बेटे ने पूछा मंमी आप बोर नहीं हो रही इस लॉकडाउन से। पति की नजरें भी उसकी तरफ़ उठ गई थी।

"नही बेटा बिलकुल नहीं मुझे तो इसकी आदत पड़ी हुई है,क्योंकि मैं तो बचपन से ही लॉक डाउन हूँ ।"

"मतलब मम्मी ?"

"कुछ नहीं बेटा ,मैं तो सिर्फ मजाक कर रही थी।धीरज रखें थोड़े समय की दिक्कत है, जल्द खत्म हो जायेगी।बेटे के सिर पर हाथ फेर कर बाहर आ गई थी।सोच रही थी ये लॉक डाउन तो खत्म हो जाएगा,पर स्वंय उस का लॉक डाउन ?????


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