लीक से हटकर
लीक से हटकर
मां ! मैं अभी और पढ़ना चाहती हूं। आप बोलो न बापू को, मेरी पढ़ाई बंद न करवाएं। बोलोगी न मां ! उन्नति अपनी मां के गले से लिपटती हुई बोली।
पढ़ तो ली बारहवीं तक,अब हम कहां से पढ़ाएं, तुझे दिखता नहीं, तेरे बापू औरमैं दिन-रात बोझा ढोते हैं,तब तुम लोगों का पेट भर पाता है। अब तेरी पढ़ाई के लिए पैसा कहां से लाए ? पता तो है तुझे,फिरतेरे भाई भी तो पढ़ रहें हैं,तू समझती क्यों नहीं ? (उन्नति के मां-बाप ईंट-गारा ढ़ो कर परिवार का पेट पाल रहे थे)
मैं सब समझती हूं मां, अब मैं भी कुछ काम कर लूंगी ,पर पढ़ाई से न रोको, मैं जीवन में कुछ करना चाहती हूं। नहीं,कल ही तेरे बापू तेरे ब्याह की बात कर रहे थे,अब तू सयानी है,इस झोपड़पट्टी में कब क्या घट जाए कह नहीं सकते,तेरे हाथ पीले हो जाएं तो हमें चैन आए।
उन्नति हतप्रभ रह गई-ब्याह!क्या कह रही हो मां!अभी मुझे बहुत कुछ करना है,जब तक दोनों भाई समझदार न हो जाएं और उन्हें अपना कर्त्तव्य समझ न आ जाए तब तक तो बिल्कुल भी नहीं। यहां मैं न मानूं आप दोनों की बात।
अरे तो क्या कर लेगी तू!हम लोग जिस समाज और माहौल में रह रहें हैं, वहां ये सारी बातें बेकार है, हमने तुझे पढ़ाया ताकि तू अपना सही-गलत समझ सके, नहीं तो तुझे भी घरों में चौका-बर्तन ही करना पड़ता।
और रही तेरे भाइयों की बात ,तो अब उन्हें मेहनत-मजदूरी करके घर-खर्च में हाथ बंटाना चाहिए। हमसे जितना बन पड़ा किया अब तु ये पढ़ाई हमें मत पढ़ा। समझी!
मां बड़बड़ाने लगी और उन्नति अपने भविष्य की चिंता में डूब गई,उसे कैसे भी करके ग्रेजुएट तो होना ही है और काम्पटेटिव एग्जाम की तैयारी करनी है,चाहे जो भी हो
बापू से बात करूंगी आज।
(झोंपड़पट्टी में पढ़ाई-लिखाई से ज्यादा मेहनत-मजदूरी को तवज्जो दी जाती थी,जितने हाथ कमाने वाले होते जिंदगी उतनी ही सुकून से बीतती, लेकिन उन्नति के मां
बाप नहीं चाहते थे कि उनके बच्चे ईंट-गारा ढोएं और इससे ज्यादा सपना उन्होंने देखा नहीं था, बस कुछ नया करें, इसलिए बच्चों को बारहवीं तक पढ़ा रहे थे)
उसे मालूम चल गया था कि मां-बाप उसे कालेज तो नहीं जाने देंगें,कैसे अपने आगे की पढ़ाई करे ? पैसा भी तो चाहिए, कहां सेआएगा पैसा ? लेकिन उसका निश्चय भी दृढ़ था,उसने सोच लिया था कि आगे की पढ़ाई चाहे प्राइवेट करनी पड़े, वो पढ़ेगी भी और पैसा कमाकर माता-पिता की मदद भी करेगी।
उसने झोपड़पट्टी के बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया,पैसा तो ज्यादा नहीं मिलता था क्योंकि वहां पढ़ना लिखना बेफिजूल की बात मानते थे,बड़ी मुश्किल हुई, बच्चों के माता-पिता को ये समझाने में कि पढ़ाई के क्या फायदे हैं जो ये बात समझ गए उन्होंने अपने बच्चों को पढ़ने भेज दिया। कुछ तो मुफ्त में ही बच्चे पढ़वा रहे थे।
कुछ समझदार थे और अपनी हैसियत के हिसाब से पैसे पकड़ा देते थे। हां, एक बात अच्छी हुई कि बच्चों में पढ़ने के लिए इंट्रेस्ट बढ़ गया। जितना भी पैसा आता, उससे छोटे-छोटे खर्चे पूरे होने लगे थे। गरीब के खर्चे भी कितने कम होते हैं,मंहगी चीजों से उसका दूर तक वास्ता नहीं होता। ट्यूशन अच्छी चल निकली और घर के हालात में भी बदलाव आया, फिर मां-बाप की सोच में भी। उन्नति का ग्रेजुएशन कंप्लीट हुआ। मास्टर्स की तैयारी के साथ बैंक की सर्विस के लिए तैयारी शुरू कर दी। घर का माहौल पढ़ाई-लिखाई का होने के कारण दोनों भाई भी उन्नति के ही पदचिन्हों का अनुशरण कर रहे थे। एक बी.काम के अंतिम वर्ष में और दूसरा बारहवीं में था। उन्नति को लग रहा था कि इस तरह तो बैंक के एग्जाम में निकलना मुश्किल है, उसे किसी भी तरह से एक मोबाइल फोन लेना था, जिससे वह सिलेबस और संबंधित विषय की जानकारी प्राप्त कर सकें। बड़ी जोड़-तोड़ के बाद तीन हजार रुपए में उसने फोन लिया और यूट्यूब के शिक्षण संबंधी विडियो देखने चालू किए।
करंट अफेयर्स की जानकारी भी अच्छी मिलने लगी और जी के की समस्या का समाधान भी हो गया। चौबीस घंटे में चार घंटे की ही नींद लेती। सुबह चार बजे से पढ़ना शुरू करती, फिर मां का हाथ बंटाती। उसके बाद चार घंटे ट्यूशन चलती। शाम को घर का काम निपटा कर दोनों भाईयों के साथ पढ़ने बैठ जाती। बारह बज जाते सोते-सोते।
आज सुबह से ही उसका मन नहीं लग रहा था,क्या होगा ? वह सफल होगी ? मेल खोलते -बंद करते उसका समय निकल रहा था। ट्यूशन पढ़ाते हुए उसे ध्यान ही नहीं रहा और तभी छोटा भाई उछलता हुआ गले से लिपट गया । 'दीदी आप सेलेक्ट हो गई हो। आपको एक हफ्ते में ज्वाइन करना है। '
क्या कह रहा है तू!दिखा!और उन्नति की आंखें डबडबा आई। अरे दीदी,आज तो पार्टी होगी ,आपकी जाब लग
गई, देखना मैं भी आपकी तरह मेहनत करूंगा।
अब ट्यूशन का काम दोनों भाई देखते थे और उन्नति बैंक जाने लगी थी, लेकिन उसका मन संतुष्ट नहीं था,अभी और आगे जाना है। आईएएस बनना है -अब यह सपना
उसकी आंखों में पलने लगा था । उसने तैयारी शुरू कर दी,अपने इस सपने को उसे सच जो करना था। अब उसने सोच लिया था कि सबसे पहले खुद का घर लेना है और मां-बाप को मजदूरी करने से रोकना है।
घर के हालात में बहुत बदलाव आ चुका था। माता-पिता अपने बच्चों की तरक्की से बड़े खुश थे। मां अब घर में रहती थी लेकिन पिताजी ने साफ कह दिया था कि वे घर पर नहीं बैठेंगे। घर-परिवार के लोग उनके बच्चों की तरक्की से खुश कम जलते ज्यादा थे।
आए दिन यही कहते "जवान लड़की की कमाई का रहे हैं,ब्याह -शादी की परवाह ही नहीं है। पिता ऐसी बातें सुनते तो उनका ईगो आहत होता और सारा गुस्सा बच्चों पर निकल जाता। उन्नति बापू को समझाती कि वे लोगों की बातें न सुने । लेकिन पिता तो मानते ही नहीं थे ,बस लड़के देखें जा रहे थे।
अब तेरी शादी हो जाए तो गंगा नहा लें।
उन्नति को डेढ़ साल हो गया था, नौकरी करते हुए। आज बैंक में बहुत काम था। क्लोजिंग चल रही थी। सुबह भी जल्दी आ गई थी। न खाने का समय था,न कुछ देखने का। उसे तो काम की मगजमारी में ये भी ध्यान न रहा कि आज सिविल सेवा परीक्षा का परिणाम आने वाला है, बहुत मेहनत की थी उसने,बैंक और पढ़ाई में वह खुद को ही भूल गई थी, दिनभरकाम और रात भर पढ़ाई,आधी भी नहीं रह गई थी,ऊपर से पिताजी ने ब्याह की बात करके उसको परेशान कर रखा था,अपने से कम पढ़े-लिखे से कैसे कर ले वह ब्याह ? वह जिस समाज से और जिस परिवेश से ताल्लुक रखती थी, वहां ग्रेजुएट होना ही आईएएस के बराबर था और मजदूरी करने वाले मां-बाप बच्चों को मजदूरी में ही बच्चों का भविष्य देखने लगते हैं,इतना समय पढ़ाई में गंवाने की जगह जल्दी से जल्दी चार पैसे कमाना ज्यादा अच्छा माना जाता है। वह तो उन्नति की जिद थी कि अपने भाईयों और खुद के भविष्य की नई नींव रख पाई थी, नहीं तो उसका ब्याह हो जाता और वह किसी घर में झाड़ू-पौंछा कर रही होती और
भाई बेलदारी। ऊपर से ये पिताजी जब देखो तब ब्याह के पीछे पड़े रहते हैं,अरे हो जाएगा ब्याह... पहले सब सैटल तो हो जाए। सोचते-सोचते उन्नति की निगाह घड़ी पर गई,अरे नौ बज गए रात के...अब तो बाबूजी कल ही किसी के पल्ले बांधने की जिद्द करेंगे। उसने पर्स उड़ाया और घर जाने के लिए निकल पड़ी ,तभी दीपक (उसका कलीग)ने मोटरसाइकिल उसके पास रोक दी,उन्नति !
चलो मैं छोड़ देता हूं,इतनी रात में तुम्हारे एरिए में अकेले जाना सेफ नहीं है। गुंडे-बदमाशों के किस्से रोज ही पेपर में पढ़ लेता हूं।
हां दीपक ! वहां शिक्षित नहीं होना चाहता कोई ,सब पढ़ने से नफ़रत करते हैं,अधिकतर प्राइमरी पास हैं, बहुत कम है जिन्होंने दसवीं की है। चोरी-चकारी,बेलदारी में अपना भविष्य देखते हैं, वहां के लोग।
उन्नति ! तुम वो इलाका क्यों नहीं छोड़ देती हो,किसी अच्छी जगह घर ले लो।
हां दीपक ! थोड़ा फाइनेंशियल प्राब्लम है अभी,बात चल रही है,अगर लोन मिल जाता है तो..!
घर आ गया था,पिता की भृकुटी टेढ़ी हो रखी थी,एक फोटो पटक दी सामने...देख ये लड़का खुद की दुकान है,बीए पास है, जमीन-जायदाद भी है,तेरे लिए तय कर दिया है मैंने। अब कोई ना नुकुर नहीं।
पर पिताजी ! सुनो तो।
पिताजी सोने जा चुके थे और उसकी नींद उड़ चुकी थी। वह बिना खाना खाए बिस्तर में लेट गई, मोबाइल उठाया, नोटिफिकेशन में मैसेज था कि किन्हीं कारणों से आज रिजल्ट डिक्लेयर नहीं हुआ, कल दोपहर तीन बजे परिणाम जारी होगा। चयनित अभ्यर्थियों को सूचना मेल द्वारा प्रेषित की जा रही है।
वह घबराकर उठ बैठी ..क्या वह चयनित में होगी,पेपर तो अच्छे हुए थे, लेकिन उसे खुदपर यकीन नहीं हो पा रहा था। सोचते-सोचते न जाने कब आंख लग गई।
सुबह उठी ,मन खराब था, पिताजी ने कहा आकर-छुट्टी ले आज की। वो लोग दोपहर में आ रहे हैं।
मैं जा रही हूं। आप उन्हें मना कर दें। मैं यह शादी किसी भी कीमत पर नहीं करूंगी।
कहते हुए वह नहाने चली गई और तैयार हो बैंक के लिए निकल गई। तीन बजे परिणाम घोषित हुए,अरे उन्नति
बधाई!तेरा नाम न्यूज में। तू तो आईएएस बन गई यार। बैंक के सभी सहकर्मी बधाई दे रहे थे। वह जड़ थी,कितने पापड़ बेले थे उसने ,आज परिणाम सामने था।
अब उसे साक्षात्कार के लिए जाना था। वह बैंक से निकली और घर पहुंची। देखा भीड़ लगी थी, पिताजी मिठाई बांट रहे थे।
क्या इन्होंने मेरा रिश्ता पक्का कर दिया। नहीं मानेंगे ये।
वह पैर पटकती अंदर पहुंची तो देखा -लोग बधाई दे रहें हैं,सब यही कह रहे थे कि बिटिया हो तो उन्नति जैसी.. परिवार की किस्मत ही बदल दी।
थोड़े ही दिन में उन्नति की पोस्टिंग हो गई। गाड़ी,बंगला, नौकर-चाकर सब मिल गया था। पिता फूले नहीं समा रहे थे। भाई का भी सीए का परीक्षा-परिणाम आने वाला था।
और दूसरा इंजीनियरिंग कर रहा था। उन्नति की सोच ने और भीड़ से हटकर किएगए फैसले ने पूरे परिवार की किस्मत बदल दी थी। जो सुनता वहीं दांतों तले उंगली दबा लेता। जहां लोग कीड़ो-मकौडों ही जिंदगी जीने को मजबूर हो, जहां सपने देखना भी सजा से कम न हो, वहां एक लड़की ने बड़ी ही सूझबूझ से अपना और अपने भाईयों का नसीब बदल दिया था। उसने दिखा दिया था दुनिया को कि यदि इंसान ठान लें तो रास्ते निकल ही आते हैं।
मेहनत कैसे लोगों के नसीब बदलती है,गर वह हालात को समझकर बदलने के उद्देश्य से की जाए। कूड़े के ढेर से एक-एक पायदान चढ़ कर आज उन्नति यहां पहुंची थी। उसकी लाल बत्ती की गाड़ी जब झोपड़पट्टी में पहुंची तो मेला सा लग गया। लोग आश्चर्य से देख रहेथे। अपने माता-पिता और भाईयों के साथ उन्नती अपने नए घर की ओर चल दी। इतना सम्मान, इसकी कल्पना करना भी मुश्किल था उसके पिता के लिए।
घर में प्रवेश करते हुए पिता के कदमों की बोझिलता को उसने महसूस किया। वह उठकर उनके पास पहुंची-बापू आप खुश नहीं हो क्या ?
बेटा ! मुझे माफ़ कर दे। मैंने समाज के बहकावे में आकर तेरे पैरों में बेड़ियां बांधनी चाही। तेरे पंख कतरने चाहे। तूने मेरी सारी भ्रांतियों को तोड़ दिया। आज मेरे जैसा खुशनसीब बाप कोई ही हो शायद। बापू तुम माफी क्यों मांग रहे हो, हम तो बड़े ही खुशनसीब है जो आप जैसा पिता मिला।
आज ये जो कुछ भी है,आप की बदौलत। आपने बारहवीं तक न पढ़ाया होता तो मैं कुछ कर पाती। आपने सबसे अलग सोचा और मैंने सबसे अलग करके दिखाया।
अब हंसो बापू और हां अब आप बेलदारी करने नहीं जाओगे। अब आप घर संभालो। सब हंसने लगे थे।
