लालच बुरी आदत है
लालच बुरी आदत है
लालच
(हिंदी कहानी ~1500 शब्द)
लेखक: विजय शर्मा एरी
कहते हैं, लालच इंसान को अंधा कर देता है। वह आँखों पर ऐसी पट्टी बाँध देता है कि सामने खड़ा सच भी दिखाई नहीं देता। यह कहानी उसी लालच की है, जिसने एक हँसते-खेलते परिवार को भीतर से खोखला कर दिया।
गाँव का नाम था सोनपुर—नाम के अनुरूप मिट्टी उपजाऊ, खेत हरे-भरे और लोग सीधे-सादे। इसी गाँव में रहता था रघुवीर। मेहनती किसान, दो बीघा ज़मीन, एक छोटी-सी पक्की छत वाला घर और परिवार में पत्नी सरला, बेटा मोहन और बेटी गुड़िया। रघुवीर की दुनिया इन चारों में सिमटी थी। सुबह खेत, दोपहर हल्की नींद और शाम को बच्चों के साथ आँगन में बैठकर हँसी-मज़ाक—बस यही उसका सुख था।
पर सुख की आदत इंसान को चैन नहीं लेने देती। गाँव में एक दिन खबर आई कि पास के कस्बे में ज़मीन के दाम अचानक बढ़ गए हैं। शहर फैल रहा था, सड़क बनने वाली थी। कुछ लोगों ने दलालों के ज़रिये ज़मीन बेची और रातों-रात अमीर हो गए। नए कपड़े, मोटरसाइकिलें, बड़े मोबाइल—सब कुछ अचानक दिखने लगा।
रघुवीर के मन में पहली बार एक चुभन-सी उठी।
“मेहनत तो मैं भी उतनी ही करता हूँ,” उसने सरला से कहा, “पर देखो, लोग बिना खेत में पसीना बहाए अमीर हो गए।”
सरला ने सहजता से जवाब दिया, “जो है, उसी में खुश रहो। बच्चों की पढ़ाई, घर का सुकून—यही असली धन है।”
रघुवीर चुप हो गया, पर मन में एक बीज पड़ चुका था—लालच का बीज।
कुछ दिनों बाद गाँव में शेखर बाबू आए—शहर के बड़े दलाल। मीठी ज़ुबान, चमकदार गाड़ी और बड़े-बड़े सपने। उन्होंने बताया कि अगर रघुवीर अपनी ज़मीन बेच दे, तो उसे इतनी रकम मिल सकती है कि ज़िंदगी भर खेत में हल चलाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।
“सोचिए,” शेखर बाबू ने कहा, “आपका बेटा शहर में पढ़ेगा, बेटी अच्छे स्कूल में जाएगी, और आप आराम से रहेंगे।”
रघुवीर की आँखों में सपने तैरने लगे। उसने घर आकर सरला को सब बताया।
“नहीं,” सरला ने दृढ़ स्वर में कहा, “यह ज़मीन हमारे पुरखों की है। इसे बेचकर हम क्या रह जाएंगे?”
“पर सरला,” रघुवीर बोला, “सब कर रहे हैं। एक मौका है। हम पीछे क्यों रहें?”
सरला ने कुछ नहीं कहा, पर उसकी आँखों में डर साफ़ था।
लालच का दूसरा वार तब हुआ, जब मोहन ने कहा, “बाबूजी, अगर पैसे हों तो मैं शहर जाकर इंजीनियर बन सकता हूँ।”
रघुवीर का दिल भर आया। पिता होने का गर्व और बेटे के सपनों की चमक—दोनों ने मिलकर उसके विवेक को दबा दिया।
आख़िरकार, उसने आधी ज़मीन बेच दी।
पहले कुछ महीनों तक सब कुछ अच्छा लगा। नया फ्रिज, टीवी, मोबाइल, और बच्चों के लिए अच्छे कपड़े। रघुवीर खुद को बड़ा आदमी समझने लगा। गाँव में लोग उसे सम्मान से देखने लगे। वह अक्सर कहता, “समय के साथ चलना चाहिए।”
पर लालच कभी आधा नहीं होता।
शेखर बाबू फिर आए—इस बार पूरी ज़मीन का प्रस्ताव लेकर।
“अब तो आधी बेच ही दी है,” उन्होंने समझाया, “बाक़ी भी बेच दीजिए। दाम और बढ़ जाएंगे।”
सरला ने रोते हुए मना किया।
“रघुवीर, यह आख़िरी सहारा है। इसे मत बेचो।”
पर रघुवीर ने नहीं सुना। उसे लगने लगा था कि पैसा ही सब कुछ है।
पूरी ज़मीन बिक गई।
कुछ समय बाद असली तस्वीर सामने आने लगी। पैसा धीरे-धीरे खर्च होने लगा। शहर में पढ़ाई महँगी थी। मोहन का दाख़िला तो हुआ, पर वह अकेलापन झेल नहीं पाया। गलत संगत में पड़ गया। खर्च बढ़ता गया। रघुवीर शहर जाकर छोटे-मोटे काम करने लगा, पर उसकी उम्र और अनुभव खेतों तक ही सीमित था।
एक दिन खबर आई—मोहन पढ़ाई छोड़कर लौट रहा है।
रघुवीर के पैरों तले ज़मीन खिसक गई—पर अब ज़मीन थी ही कहाँ!
गुड़िया की पढ़ाई भी रुक गई। शहर का खर्च उठाना मुश्किल हो गया। सरला बीमार रहने लगी। घर में तनाव, ताने और खामोशी भर गई।
सबसे बड़ा झटका तब लगा, जब पता चला कि जिस ज़मीन पर सड़क बनने की बात थी, वह योजना रद्द हो चुकी है। जिन लोगों ने ज़मीन खरीदी थी, वे मुनाफ़ा कमा चुके थे। रघुवीर को मिली रकम अब बहुत छोटी लगने लगी।
एक शाम वह उसी खाली खेत के किनारे खड़ा था, जहाँ कभी उसकी फ़सल लहलहाती थी। हवा में सूखी मिट्टी उड़ रही थी। उसकी आँखों से आँसू बह निकले।
“मैंने क्या किया?” उसने खुद से पूछा।
उसे सरला की बातें याद आईं—बच्चों की हँसी, सादगी भरा जीवन, संतोष। सब कुछ उसने अपने हाथों से खो दिया था।
कई साल बीत गए। रघुवीर अब एक छोटे से किराए के घर में रहता था। मेहनत अब भी करता था, पर मन में शांति नहीं थी। उसने सीखा था—बहुत देर से—कि लालच इंसान को ऊँचा नहीं, बल्कि अकेला कर देता है।
एक दिन गाँव के स्कूल में उसे बच्चों को खेती के बारे में बोलने बुलाया गया। उसने मंच पर खड़े होकर कहा—
“बच्चों, सपने देखो, आगे बढ़ो। पर कभी लालच को अपने विवेक पर हावी मत होने देना। जो है, उसकी क़द्र करो। वरना जो सबसे क़ीमती है, वही हाथ से फिसल जाता है।”
बच्चे ताली बजा रहे थे, पर रघुवीर की आँखें नम थीं।
क्योंकि वह जानता था—यह सीख उसने अपनी पूरी ज़िंदगी की कीमत देकर हासिल की है।
संदेश:
लालच पलभर का सुख देता है, पर संतोष जीवन भर की शांति।
जो आज कम है, वह मेहनत से बढ़ सकता है—पर जो लालच में खो गया, वह अक्सर लौटकर नहीं आता।
