एक सच
एक सच
एक सच
लेखक: विजय शर्मा एरी
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प्रस्तावना
जीवन के मंच पर जो दिखाई देता है, वह अक्सर सच नहीं होता। असली कहानी तो पर्दे के पीछे छिपी होती है। यह कहानी एक नाट्य-मंडली, उसके कलाकारों और उनके जीवन के रहस्यों की है—जहाँ मंच पर हँसी और तालियाँ गूंजती हैं, लेकिन पर्दे के पीछे आँसू, संघर्ष और सच्चाई छिपी होती है।
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पहला दृश्य: रंगमंच की चमक
दिल्ली के एक पुराने थिएटर में हर शाम नाटक होता था। दर्शक तालियों से गूँज उठते, कलाकार झुककर अभिवादन करते।
मुख्य कलाकार आरव था—युवा, प्रतिभाशाली और दर्शकों का चहेता। मंच पर उसकी अदाकारी सबको मंत्रमुग्ध कर देती। लेकिन पर्दे के पीछे उसका जीवन उतना ही जटिल था।
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दूसरा दृश्य: आरव का संघर्ष
आरव का बचपन गरीबी में बीता था। पिता मजदूर थे, माँ सिलाई करती थीं। आरव का सपना था अभिनेता बनना। उसने छोटे-छोटे मंचों पर काम किया, अपमान सहा, लेकिन हार नहीं मानी।
आज वह थिएटर का सितारा था, लेकिन उसके भीतर अब भी असुरक्षा और अकेलापन था।
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तीसरा दृश्य: सिया की कहानी
नाटक की नायिका सिया थी—सुंदर, आत्मविश्वासी और दर्शकों की प्रिय। मंच पर वह आरव की प्रेमिका का किरदार निभाती थी।
लेकिन पर्दे के पीछे उसकी कहानी अलग थी। सिया एक अनाथालय में पली थी। उसे हमेशा लगता था कि लोग उसे केवल उसकी सुंदरता के लिए चाहते हैं, उसके दिल को कोई नहीं देखता।
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चौथा दृश्य: निर्देशक का रहस्य
नाटक का निर्देशक, देवेंद्र, कठोर स्वभाव का था। मंच पर अनुशासन चाहता था। लेकिन पर्दे के पीछे वह कलाकारों से ईर्ष्या करता था। उसे डर था कि कहीं आरव और सिया की लोकप्रियता उसकी पहचान को ढक न दे।
उसके भीतर एक छिपा हुआ द्वंद्व था—कला के प्रति प्रेम और प्रसिद्धि खोने का भय।
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पाँचवाँ दृश्य: पर्दे के पीछे का सच
एक रात नाटक के बाद, जब दर्शक चले गए, थिएटर में सन्नाटा था। आरव और सिया मंच पर बैठे थे।
आरव ने कहा,
"सिया, लोग हमें मंच पर देखकर खुश होते हैं, लेकिन क्या कोई जानता है कि हम अंदर से कितने टूटे हुए हैं?"
सिया ने आँसू पोंछते हुए कहा,
"पर्दे के पीछे की कहानी कभी किसी को नहीं दिखती। शायद यही हमारी नियति है।"
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छठा दृश्य: विश्वासघात
देवेंद्र ने धीरे-धीरे आरव और सिया के बीच दरार डालनी शुरू की। उसने अफवाहें फैलाईं कि आरव सिया को पीछे करना चाहता है।
सिया का मन डगमगाने लगा। मंच पर उनकी जोड़ी अब भी चमकती थी, लेकिन पर्दे के पीछे अविश्वास बढ़ रहा था।
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सातवाँ दृश्य: सच्चाई का सामना
एक दिन आरव ने देवेंद्र को पर्दे के पीछे सुना। वह किसी से कह रहा था,
"अगर आरव और सिया अलग हो जाएँगे, तो नाटक की सफलता मेरे नाम होगी।"
आरव ने सिया को सब बताया। सिया ने चुपचाप उसकी आँखों में देखा और कहा,
"अब मैं समझ गई हूँ। असली दुश्मन हम नहीं, बल्कि वह है जो पर्दे के पीछे खेल खेल रहा है।"
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आठवाँ दृश्य: अंतिम नाटक
उस रात नाटक का अंतिम प्रदर्शन था। दर्शक खचाखच भरे थे। मंच पर आरव और सिया ने ऐसा अभिनय किया कि लोग रो पड़े।
लेकिन पर्दे के पीछे उन्होंने निर्णय लिया—यह उनका आखिरी नाटक होगा। वे अब इस छलावे का हिस्सा नहीं बनेंगे।
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उपसंहार
आरव और सिया ने थिएटर छोड़ दिया। उन्होंने एक नया जीवन शुरू किया—जहाँ वे मंच पर नहीं, बल्कि असली जीवन में अपनी कहानी लिख रहे थे।
देवेंद्र अकेला रह गया। थिएटर की रोशनी बुझ गई।
और यही था पर्दे के पीछे का सच—जहाँ चमक के पीछे छिपे आँसू और संघर्ष सामने आए।
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संदेश
“पर्दे के पीछे” हमें यह सिखाती है कि जो हम देखते हैं, वह हमेशा सच नहीं होता। हर चमक के पीछे अंधेरा होता है, हर मुस्कान के पीछे दर्द। असली साहस वही है जो उस पर्दे को हटाकर सच्चाई का सामना करे.
