अपार्टमेंट नंबर 101
अपार्टमेंट नंबर 101
अपार्टमेंट नंबर 101
(सस्पेंस थ्रिलर हिन्दी कहानी | लगभग 1500 शब्द)
लेखक: विजय शर्मा एरी
बरसात की उस रात शहर कुछ ज़्यादा ही खामोश था। सड़कें खाली थीं और स्ट्रीटलाइट्स की पीली रोशनी पानी में डूबकर काँप रही थी। टैक्सी होटल सनशाइन इन के सामने आकर रुकी।
आरव ने भीगा हुआ बैग उठाया और रिसेप्शन की ओर बढ़ा।
“एक कमरा चाहिए… एक रात के लिए,” आरव ने धीमी आवाज़ में कहा।
रिसेप्शन पर बैठा अधेड़ आदमी, जिसका चेहरा झुर्रियों से भरा था, अचानक रुक गया। रजिस्टर बंद करते हुए उसने बिना आँख उठाए पूछा—
“नाम?”
“आरव मल्होत्रा।”
आदमी ने रजिस्टर में नाम लिखा, फिर अचानक उसकी उँगलियाँ ठिठक गईं।
“आपको… कौन सा कमरा चाहिए?”
आरव ने कंधे उचकाए, “कोई भी चलेगा।”
कुछ सेकंड की खामोशी के बाद रिसेप्शनिस्ट ने चाबी आगे बढ़ाई।
“रूम नंबर 101।”
चाबी लेते ही आरव को अजीब सी सिहरन महसूस हुई, जैसे किसी ने ठंडी उँगलियों से उसकी रीढ़ छू ली हो।
1
रूम नंबर 101 ग्राउंड फ्लोर के आख़िरी सिरे पर था। गलियारा लंबा और संकरा था, दीवारों पर पुराने फ्रेम लगे थे जिनमें धुंधली तस्वीरें थीं। आरव जैसे-जैसे आगे बढ़ता गया, उसे लगा तस्वीरों की आँखें उसका पीछा कर रही हैं।
कमरे का दरवाज़ा खुलते ही हल्की सी बदबू आई—सीलन और पुराने लकड़ी की।
कमरा साधारण था—एक बेड, एक अलमारी, खिड़की, और सामने दीवार पर एक बड़ा सा आईना।
आरव ने बैग रखा, जैकेट उतारी और बिस्तर पर बैठ गया। सफ़र की थकान के बावजूद नींद नहीं आ रही थी। बाहर बारिश तेज़ हो चुकी थी।
तभी—
ठक… ठक…
दरवाज़े पर दस्तक।
आरव चौंक गया। घड़ी देखी—रात के 11:45।
दरवाज़ा खोला तो बाहर कोई नहीं था। बस गलियारे की लाइट झिलमिला रही थी।
“शायद भ्रम,” आरव ने खुद से कहा और दरवाज़ा बंद कर लिया।
लेकिन जैसे ही उसने पीठ मोड़ी—
आईने में उसे किसी परछाईं की झलक दिखी।
2
आरव ने तेज़ी से पलटकर देखा—कमरा खाली।
दिल की धड़कन तेज़ हो चुकी थी।
उसने आईने की ओर देखा। अपनी ही शक्ल, लेकिन आँखों के नीचे काले साये कुछ ज़्यादा गहरे लग रहे थे।
“बस थकान है,” उसने बड़बड़ाया।
आरव बेड पर लेटा ही था कि मोबाइल की स्क्रीन अपने आप जल उठी।
एक अनजान नंबर से मैसेज आया—
“रूम 101 में मत सोओ।”
आरव उठ बैठा।
“ये मज़ाक किसने किया?” उसने नंबर डायल किया—स्विच्ड ऑफ।
उसी पल बाथरूम से पानी टपकने की आवाज़ आई।
3
आरव ने हिम्मत जुटाई और बाथरूम का दरवाज़ा खोला। नल पूरी तरह बंद था, फिर भी पानी फर्श पर फैल रहा था।
और फिर—
शीशे पर उँगलियों से लिखा एक शब्द उभर आया—
“भागो।”
आरव के हाथ काँपने लगे।
“ये सब क्या है?” उसने चीखकर कहा।
अचानक कमरे की लाइट बुझ गई।
अंधेरे में एक ठंडी साँस उसके कान के पास महसूस हुई—
“तुम आ ही गए…”
आरव ने पीछे मुड़ने की कोशिश की, लेकिन जैसे पैर ज़मीन से चिपक गए हों।
4
अचानक लाइट वापस आ गई।
कमरा फिर सामान्य था। न पानी, न लिखा हुआ शब्द।
आरव हाँफ रहा था। उसने तुरंत रिसेप्शन पर फोन किया।
“हैलो! ये रूम 101 में कुछ गड़बड़ है!”
दूसरी तरफ वही भारी आवाज़—
“सर… क्या आपने आईने में देखा?”
“क्या मतलब?”
“जो देखना था… वही दिखेगा,” कहकर फोन कट गया।
आरव का माथा ठंडे पसीने से भर गया।
5
रात के एक बज चुके थे।
आरव कमरे से बाहर निकलने ही वाला था कि दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया।
आईने में अब उसकी परछाईं नहीं थी।
उसकी जगह कोई और खड़ा था—
उसके जैसा ही, लेकिन आँखों में अजीब सी खालीपन।
“तुम कौन हो?” आरव चिल्लाया।
आईने वाली आकृति मुस्कुराई—
“मैं वही हूँ… जो तुम बनते जा रहे हो।”
आईने से एक हाथ बाहर निकला।
6
आरव चीखता हुआ पीछे हटा और गिर पड़ा।
उसका सिर बेड से टकराया और सब अंधेरा हो गया।
7
सुबह की धूप में उसकी आँख खुली।
वह रिसेप्शन के सामने कुर्सी पर बैठा था।
“आप ठीक तो हैं सर?” रिसेप्शनिस्ट ने पूछा।
“मैं… मैं रूम 101 में था,” आरव ने हकलाते हुए कहा।
रिसेप्शनिस्ट का चेहरा सख़्त हो गया।
“सर… होटल में रूम नंबर 101 है ही नहीं।”
“क्या?! पर… चाबी…”
रिसेप्शनिस्ट ने एक पुरानी फाइल खोली।
“दस साल पहले आग लगी थी। रूम 101 में एक आदमी की मौत हुई थी। कहते हैं… वो खुद से भाग रहा था।”
आरव की साँस अटक गई।
8
आरव बाहर भागा। टैक्सी ली और शहर छोड़ दिया।
लेकिन…
आज भी जब वह आईने में देखता है, कभी-कभी उसकी परछाईं देर से हिलती है।
और रात के सन्नाटे में, उसके फोन पर एक मैसेज आता है—
“रूम नंबर 101 अभी भी खाली है…”
समाप्त
