नया साल
नया साल
नया साल
31 दिसंबर 2025 की रात थी। शहर की सड़कों पर रोशनी थी, लेकिन उन रोशनियों के बीच कहीं-न-कहीं अंधेरा भी था—दिलों का, उम्मीदों का, रिश्तों का। हर तरफ “हैप्पी न्यू ईयर” के पोस्टर, मोबाइल पर चमचमाते मैसेज, सोशल मीडिया पर मुस्कुराते चेहरे… पर इन सबके बीच कुछ चेहरे ऐसे भी थे, जो मुस्कुरा तो रहे थे, लेकिन अंदर से टूटे हुए थे।
अनुज अपनी खिड़की के पास खड़ा था। सामने वाली इमारतों में पटाखों की रोशनी चमक रही थी। घड़ी की सुइयाँ बारह के करीब पहुँच रही थीं।
उसके मन में एक अजीब-सी खालीपन थी।
“एक और साल चला गया…”
उसने खुद से कहा।
2025 उसके लिए आसान नहीं था। नौकरी छूट गई थी, पिता की तबीयत खराब रहती थी, और जिन दोस्तों के साथ वह हर नए साल का जश्न मनाता था, वे अब अपने-अपने संसार में व्यस्त हो चुके थे। मोबाइल में ढेरों मैसेज आ रहे थे, लेकिन कोई ऐसा नहीं था जिसे वह सच में कॉल करना चाहता।
टीवी पर काउंटडाउन शुरू हो गया—
“Ten… Nine… Eight…”
अनुज ने टीवी बंद कर दिया।
उसे शोर से नहीं, खामोशी से बात करनी थी।
वह छत पर चला गया। ठंडी हवा चल रही थी। आसमान में आतिशबाज़ियाँ खिल रही थीं, जैसे कोई रंगीन सपने बिखेर रहा हो। तभी उसके फोन की घंटी बजी।
“हैलो…” “अनुज बेटा, नए साल की शुभकामनाएँ।”
आवाज़ माँ की थी।
अनुज की आँखें भर आईं।
“माँ… आप जाग रही हैं?” “हाँ बेटा, सोचा सबसे पहले तुझे ही फोन करूँ। नया साल है, भगवान करे ये साल तुझे फिर से मुस्कुराना सिखा दे।”
अनुज कुछ बोल नहीं पाया।
माँ की आवाज़ में विश्वास था—वही विश्वास, जो दुनिया की किसी मोटिवेशनल किताब में नहीं मिलता।
फोन रखने के बाद वह बहुत देर तक आसमान को देखता रहा। तभी उसने देखा—पास वाली छत पर एक बूढ़े अंकल खड़े थे। हाथ में अगरबत्ती, आँखों में शांति।
अनुज ने पास जाकर कहा,
“नमस्ते अंकल, नए साल की शुभकामनाएँ।”
अंकल मुस्कुराए,
“शुभकामनाएँ नहीं बेटा, आशीर्वाद दो… कि यह साल इंसान को इंसान बनाए।”
अनुज चौंक गया।
“ऐसा क्यों कह रहे हैं आप?”
अंकल बोले,
“हर साल नया आता है, लेकिन हम पुराने ही रहते हैं। वही ग़लतियाँ, वही दौड़, वही दिखावा। नया साल तभी नया होगा, जब हम खुद बदलें।”
ये शब्द अनुज के दिल में उतर गए।
रात के ठीक बारह बज चुके थे।
1 जनवरी 2026।
नीचे सड़क पर लोग नाच रहे थे, लेकिन अनुज की आँखों के सामने उसके बीते साल की फिल्म चल रही थी। उसने सोचा—
“अगर यही सब चलता रहा, तो 2026 भी यूँ ही निकल जाएगा।”
अचानक उसने एक फैसला लिया।
अगली सुबह—
सचमुच नए साल की पहली सुबह थी।
सूरज की किरणें खिड़की से अंदर आ रही थीं। अनुज ने पहली बार अलार्म से पहले आँख खोली। उसने मोबाइल उठाया—सोशल मीडिया खोला—और फिर बंद कर दिया।
आज उसे कुछ और करना था।
वह सीधे अस्पताल पहुँचा, जहाँ उसके पिता भर्ती थे। पिता की आँखों में बेटे को देखकर चमक आ गई।
“नया साल कैसा रहा?” पिता ने पूछा।
अनुज ने पिता का हाथ पकड़कर कहा,
“पापा, इस साल मैं भागूँगा नहीं… साथ चलूँगा।”
पिता की आँखें नम हो गईं।
अस्पताल से निकलकर अनुज पास के अनाथालय गया। बचपन में माँ अक्सर उसे वहाँ ले जाती थीं, लेकिन समय के साथ वह सब भूल गया था।
आज उसने बच्चों के साथ बैठकर खाना खाया।
एक बच्चे ने पूछा,
“भैया, आप फिर आओगे न?”
अनुज मुस्कुराया,
“हाँ, अब बार-बार आऊँगा।”
उसे लगा, जैसे उसके अंदर कोई टूटी हुई चीज़ जुड़ रही हो।
दिन ढलते-ढलते उसने एक छोटा-सा पोस्ट लिखा—
“नया साल सिर्फ कैलेंडर नहीं बदलता, अगर हम चाहें तो यह सोच भी बदल सकता है।”
यह पोस्ट वायरल नहीं हुआ, लेकिन जिसने भी पढ़ा, उसने दिल से पढ़ा।
कुछ दिनों बाद अनुज को एक छोटी-सी नौकरी मिली—कम पैसे, ज्यादा सुकून।
उसने शिकायत नहीं की।
वह हर सुबह खुद से कहता—
“आज बेहतर बनना है, कल से नहीं।”
धीरे-धीरे उसकी ज़िंदगी में रंग लौटने लगे।
मुस्कान बनावटी नहीं रही।
रिश्ते फिर से साँस लेने लगे।
साल के अंत में—
31 दिसंबर 2026 की रात फिर आई।
इस बार अनुज खिड़की पर अकेला नहीं था।
माँ-पापा उसके साथ थे।
टीवी पर काउंटडाउन चल रहा था।
“Ten… Nine…”
अनुज मुस्कुराया।
उसे पता था—
नया साल बाहर नहीं, उसके अंदर पैदा हो चुका है।
संदेश
नया साल तभी सच में नया होता है, जब हम बीते साल की गलतियों को सिर्फ याद नहीं, सीख बना लें।
2026 कोई जादू नहीं, एक मौका है—खुद को बेहतर बनाने का।
लेखक:
✍️ Vijay Sharma Erry
