नोट बना सबक
नोट बना सबक
शीर्षक: नोट बना सबक
लेखक: विजय शर्मा एर्री
शाम का समय था। शहर की सबसे पुरानी गली—गणेश चौक—हल्की-हल्की रोशनी में डूबी हुई थी। चाय की दुकानों से उठती भाप, रिक्शों की खनक, और दुकानदारों की आवाज़ें मिलकर एक परिचित-सी धुन रच रही थीं। इसी गली में, पुराने बरगद के नीचे, रमेश रोज़ की तरह अपनी छोटी-सी किताबों की दुकान समेट रहा था।
रमेश की उम्र पैंतालीस के आसपास थी। चेहरा सादा, आँखों में थकान और भीतर कहीं एक अनकही बेचैनी। उसकी दुकान बड़ी नहीं थी—कुछ पुरानी किताबें, दो-चार मैगज़ीन, और अख़बार। पर उसी से उसका घर चलता था। घर में पत्नी सीमा और बारह साल का बेटा मोहित था।
उस दिन कुछ अलग था। रमेश ने जैसे ही गल्ले को बंद करने के लिए हाथ बढ़ाया, उसकी उंगलियाँ रुक गईं।
“अरे… ये क्या?” उसने खुद से कहा।
गल्ले में रखे पाँच सौ रुपये के नोटों में से एक नोट गायब था।
“मैंने तो पूरे पैसे गिने थे,” रमेश का माथा ठनक उठा। उसने फिर से गल्ला उलट-पलट कर देखा, जेबें टटोलीं, दुकान के कोने-कोने में नज़र दौड़ाई। लेकिन नोट कहीं नहीं था।
पाँच सौ रुपये उसके लिए मामूली रकम नहीं थी। उसी से मोहित की स्कूल फ़ीस, घर का राशन, बिजली का बिल—सब जुड़ा था।
घर पहुँचते-पहुँचते रमेश के चेहरे पर चिंता की रेखाएँ और गहरी हो चुकी थीं। सीमा ने पूछा,
“आज कुछ परेशान लग रहे हो।”
रमेश ने बात टालने की कोशिश की, पर अंततः सब बता दिया।
“एक नोट गुम हो गया है… पता नहीं कैसे।”
सीमा ने सांत्वना दी,
“हो सकता है कहीं गिर गया हो। भगवान पर भरोसा रखो।”
पर रमेश को चैन नहीं मिला। वह रात भर करवटें बदलता रहा। दिमाग़ में एक ही सवाल घूमता रहा—नोट गया कहाँ?
अगले दिन सुबह वह दुकान खोलने पहुँचा तो देखा, उसकी दुकान के सामने एक छोटा-सा काग़ज़ पड़ा है। उसने उठाया। उस पर लिखा था—
“जो खो गया है, वह सिर्फ़ पैसा नहीं है। सच्चाई खोजो।”
रमेश के हाथ काँपने लगे।
“ये क्या मज़ाक है?” उसने इधर-उधर देखा, पर कोई नहीं था।
दिन भर ग्राहक आते-जाते रहे, पर रमेश का ध्यान कहीं और ही था। शाम को उसने गली के कुछ दुकानदारों से पूछा। सबने अनभिज्ञता जताई। एक पानवाले ने कहा,
“भाई, यहाँ रोज़ सैकड़ों लोग आते हैं। कौन क्या उठा ले, क्या पता?”
तीसरे दिन फिर एक पर्ची मिली—
“नोट की कीमत पाँच सौ है, पर सच की कीमत उससे कहीं ज़्यादा।”
अब मामला रहस्यमय होता जा रहा था। रमेश ने तय किया कि वह सच्चाई तक पहुँचेगा।
उसने पिछले हफ्ते के दिन याद करने शुरू किए। तभी उसे याद आया—परसों एक बुज़ुर्ग उसकी दुकान पर आए थे। मैले कपड़े, काँपते हाथ। उन्होंने एक पुरानी किताब उठाई थी, पर पैसे नहीं थे। रमेश ने उन्हें डाँट दिया था,
“बिना पैसे किताब क्यों उठाते हो? यहाँ कोई मुफ़्त में नहीं देता।”
बुज़ुर्ग चुपचाप किताब रखकर चले गए थे। उस वक्त रमेश ने ध्यान नहीं दिया था, पर अब उसका दिल बैठने लगा।
क्या वही बुज़ुर्ग…?
शाम को रमेश ने गली के आख़िरी सिरे तक जाकर पूछा। एक चायवाले ने बताया,
“हाँ, एक बूढ़े बाबा यहीं रहते हैं। फुटपाथ पर।”
रमेश तेज़ी से वहाँ पहुँचा। बरसाती प्लास्टिक के नीचे, फटे कंबल में लिपटे, वही बुज़ुर्ग बैठे थे। रमेश ने हिचकिचाते हुए कहा,
“बाबा… आप परसों मेरी दुकान पर आए थे?”
बुज़ुर्ग ने सिर उठाया। आँखों में अजीब-सी चमक थी।
“हाँ बेटा। किताब देखने।”
रमेश ने सीधा सवाल किया,
“क्या आपने… मेरा नोट उठाया था?”
बुज़ुर्ग मुस्कराए।
“नोट? हाँ, मिला था। पर मैंने चुराया नहीं।”
“तो फिर?” रमेश की आवाज़ भारी हो गई।
बुज़ुर्ग बोले,
“तुम्हारी दुकान से निकलते वक्त ज़मीन पर पड़ा था। मैंने उठाया। सोचा, सही समय पर लौटा दूँगा।”
“और ये पर्चियाँ?” रमेश ने पूछा।
“वो तुम्हारे लिए एक परीक्षा थी,” बाबा ने शांत स्वर में कहा।
“मैं जानना चाहता था कि तुम सिर्फ़ पैसे को खोजोगे या अपने भीतर झाँकोगे।”
रमेश चुप हो गया।
बुज़ुर्ग ने आगे कहा,
“उस दिन जब तुमने मुझे डाँटा, मुझे दुख हुआ। पर मैं समझ गया—तुम भी परिस्थितियों के मारे हो। यह नोट मैंने नहीं, तुम्हारे ज़मीर ने गुम किया था।”
बाबा ने अपनी जेब से मुड़ा-तुड़ा पाँच सौ का नोट निकाला और रमेश की ओर बढ़ा दिया।
रमेश की आँखें भर आईं। उसने नोट नहीं लिया।
“बाबा, गलती मेरी थी। किताब… आप ले जाइए।”
बुज़ुर्ग मुस्कराए,
“आज तुमने सच्चाई पा ली। यही असली कमाई है।”
रमेश घर लौटा तो मन हल्का था। सीमा ने पूछा,
“मिल गया नोट?”
रमेश ने कहा,
“हाँ… और उससे भी ज़्यादा कुछ मिला।”
अगले दिन से रमेश की दुकान वही थी, पर रमेश बदल चुका था। अब वह हर ग्राहक को इंसान की तरह देखता था, सिर्फ़ ग्राहक की तरह नहीं।
बरगद के नीचे लगी उस दुकान पर अब सिर्फ़ किताबें नहीं बिकती थीं—वहाँ भरोसा, संवेदना और सच्चाई भी मिलती थी।
—समाप्त—
