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Vijay Erry

Thriller Others

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Vijay Erry

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अंधविश्वास का भूत

अंधविश्वास का भूत

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यहाँ मैं आपके लिए एक मौलिक, विस्तृत और साहित्यिक शैली में लिखी गई कहानी प्रस्तुत कर रहा हूँ। इसमें अंधविश्वास की जकड़न, उसके परिणाम और अंत में जागरूकता का संदेश बुना गया है।  


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अंधविश्वास का भूत 

✍️ लेखक: विजय शर्मा एरी  


प्रस्तावना

भारत जैसे विविधताओं से भरे देश में जहाँ संस्कृति और परंपराएँ गहराई से जुड़ी हैं, वहीं अंधविश्वास भी समाज की जड़ों में पैठा हुआ है। यह कहानी एक गाँव की है, जहाँ लोग अंधविश्वास के कारण अपने जीवन को कठिनाइयों में डालते हैं।  


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कहानी


1. गाँव और उसका माहौल

पंजाब के एक छोटे से गाँव "रामपुरा" में लोग मेहनती थे। खेतों में काम करना, पशुपालन करना और मेलों में जाना उनकी दिनचर्या थी। लेकिन इस गाँव की सबसे बड़ी समस्या थी—अंधविश्वास।  

गाँव के बुजुर्ग कहते थे कि अगर उल्लू छत पर बैठ जाए तो घर में विपत्ति आती है, अगर बिल्ली रास्ता काट दे तो काम बिगड़ जाता है, और अगर कोई बच्चा रात को रोए तो उस पर "भूत-प्रेत" का साया है।  


2. मुख्य पात्र

इस गाँव में एक परिवार रहता था—रामलाल, उसकी पत्नी सुशीला और उनका बेटा मोहन। रामलाल पढ़ा-लिखा था, लेकिन गाँव के दबाव और परंपराओं के कारण वह भी कई बार अंधविश्वासों में फँस जाता।  

मोहन, जो दसवीं कक्षा में पढ़ता था, विज्ञान का शौकीन था। उसे किताबों से पता चलता था कि अंधविश्वास का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं होता।  


3. घटना की शुरुआत

एक दिन गाँव में अचानक एक बच्चा बीमार पड़ गया। उसका बुखार बढ़ता गया। डॉक्टर को बुलाने की बजाय गाँव के लोग "झाड़-फूँक" वाले बाबा को बुलाने लगे। बाबा ने कहा—  

"इस बच्चे पर चुड़ैल का साया है। इसे ठीक करने के लिए हमें रात भर मंत्र पढ़ने होंगे और बलि देनी होगी।"  


रामलाल का मन खिन्न हुआ। वह जानता था कि बच्चे को डॉक्टर की ज़रूरत है, लेकिन गाँव के लोग बाबा की बात मानने लगे।  


4. मोहन का विरोध

मोहन ने पिता से कहा—  

"पिताजी, यह बीमारी है। इसे डॉक्टर ही ठीक कर सकता है। अगर हम बाबा की बात मानेंगे तो बच्चे की जान जा सकती है।"  

रामलाल असमंजस में था। एक ओर गाँव का दबाव, दूसरी ओर बेटे की तर्कपूर्ण बातें।  


5. अंधविश्वास का असर

गाँव वाले बाबा की पूजा-पाठ में लग गए। उन्होंने बच्चे को दवा देने से मना कर दिया। रात भर मंत्रोच्चार हुआ, बलि की तैयारी हुई। लेकिन बच्चे की हालत बिगड़ती गई।  

सुशीला रोने लगी—"क्या भगवान यही चाहता है कि हम बच्चे को बिना इलाज के मरने दें?"  


6. मोड़

मोहन ने हिम्मत दिखाई। वह चुपके से बच्चे को साइकिल पर बैठाकर शहर के अस्पताल ले गया। डॉक्टर ने तुरंत इलाज शुरू किया। कुछ ही घंटों में बच्चे की हालत सुधरने लगी।  

गाँव वाले जब यह देखे तो हैरान रह गए। बाबा की पोल खुल गई।  


7. जागरूकता की लहर

रामलाल ने गाँव की पंचायत में सबको बुलाकर कहा—  

"आज हमने देखा कि अंधविश्वास के कारण हम बच्चे की जान लेने वाले थे। हमें समझना होगा कि बीमारी का इलाज डॉक्टर ही कर सकता है, न कि झाड़-फूँक।"  

मोहन ने सबको समझाया कि उल्लू, बिल्ली, या रात का रोना किसी अशुभ संकेत नहीं होते। ये सब प्राकृतिक घटनाएँ हैं।  


8. बदलाव

धीरे-धीरे गाँव में बदलाव आने लगा। लोग डॉक्टर को बुलाने लगे, बच्चों को स्कूल भेजने लगे। बाबा का प्रभाव कम हो गया।  

रामलाल ने गर्व से कहा—"मेरे बेटे ने हमें अंधविश्वास से बाहर निकाला। यही असली शिक्षा है।"  


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निष्कर्ष

यह कहानी हमें यह सिखाती है कि अंधविश्वास केवल डर और भ्रम फैलाता है। विज्ञान और तर्क ही हमें सही दिशा दिखाते हैं। समाज तभी आगे बढ़ेगा जब हम अंधविश्वास की जंजीरों को तोड़कर ज्ञान और विवेक को अपनाएँगे।  


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