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Vijay Erry

Inspirational Others

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जादुई दवा

जादुई दवा

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मैं आपके लिए एक विस्तृत, रोचक और भावनात्मक कहानी तैयार करता हूँ। इसमें रहस्य, रोमांच और जीवन का संदेश होगा।  


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📖 जादूई दवा

✍️ लेखक: विजय शर्मा एरी  


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प्रस्तावना

कहानियाँ अक्सर हमें कल्पना की दुनिया में ले जाती हैं, जहाँ असंभव भी संभव हो जाता है। यह कहानी एक छोटे से गाँव की है, जहाँ एक साधारण लड़के को एक ऐसी दवा मिलती है जो उसकी ज़िंदगी बदल देती है। लेकिन हर जादू के पीछे एक कीमत होती है।  


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पहला अध्याय: गाँव का लड़का

गाँव "सुरजपुर" में अर्जुन नाम का लड़का रहता था।  

- वह गरीब किसान का बेटा था।  

- पढ़ाई में अच्छा था, लेकिन साधन कम थे।  

- उसका सपना था कि वह डॉक्टर बने और गाँव के लोगों का इलाज करे।  


लेकिन गरीबी और हालात ने उसके सपनों को धुंधला कर दिया।  


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दूसरा अध्याय: रहस्यमयी बूढ़ा

एक दिन अर्जुन जंगल से लकड़ियाँ काटकर लौट रहा था। रास्ते में उसे एक बूढ़ा साधु मिला।  

- साधु की आँखों में अजीब चमक थी।  

- उसने अर्जुन को एक छोटी शीशी दी और कहा—  

"यह जादूई दवा है। इसे सही समय पर इस्तेमाल करना। यह तुम्हारी ज़िंदगी बदल देगी।"  


अर्जुन हैरान था। उसने शीशी संभालकर रख ली।  


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तीसरा अध्याय: पहला प्रयोग

गाँव में एक बच्चा बीमार पड़ा। डॉक्टर दूर था और दवा उपलब्ध नहीं थी। अर्जुन ने हिम्मत करके उस बच्चे को जादूई दवा की कुछ बूंदें दीं।  

- चमत्कार हुआ।  

- बच्चा तुरंत ठीक हो गया।  

- गाँव वाले अर्जुन को देवता मानने लगे।  


अर्जुन को लगा कि अब वह सबकी मदद कर सकता है।  


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चौथा अध्याय: प्रसिद्धि और लालच

धीरे-धीरे अर्जुन पूरे इलाके में मशहूर हो गया।  

- लोग दूर-दूर से इलाज कराने आने लगे।  

- अर्जुन को सम्मान और धन मिलने लगा।  

- लेकिन उसके मन में लालच भी बढ़ने लगा।  


वह सोचने लगा कि इस दवा से वह अमीर बन सकता है।  


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पाँचवाँ अध्याय: दवा का रहस्य

एक रात, वही बूढ़ा साधु फिर आया। उसने कहा—  

"याद रखो, यह दवा हर बार काम नहीं करेगी। इसका जादू सिर्फ़ तब है जब तुम इसे निस्वार्थ भाव से इस्तेमाल करो। अगर लालच या स्वार्थ से दोगे, तो परिणाम भयानक होंगे।"  


अर्जुन ने सिर हिलाया, लेकिन मन में धन और शोहरत की चाह बढ़ती रही।  


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छठा अध्याय: गलती

एक व्यापारी ने अर्जुन को बहुत पैसे दिए और कहा कि उसकी बीमार पत्नी को ठीक कर दो। अर्जुन ने दवा दी, लेकिन इस बार जादू काम नहीं किया।  

- महिला की हालत और बिगड़ गई।  

- गाँव वाले अर्जुन पर गुस्सा हो गए।  

- उसकी प्रतिष्ठा गिरने लगी।  


अर्जुन को साधु की चेतावनी याद आई।  


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सातवाँ अध्याय: आत्मचिंतन

अर्जुन अकेला बैठा सोचने लगा।  

- उसने समझा कि जादूई दवा का असली अर्थ मदद करना है, न कि धन कमाना।  

- उसने तय किया कि अब वह दवा का इस्तेमाल सिर्फ़ ज़रूरतमंदों के लिए करेगा, बिना किसी स्वार्थ के।  


धीरे-धीरे उसका विश्वास लौट आया।  


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आठवाँ अध्याय: असली जादू

समय बीतता गया। अर्जुन ने पढ़ाई पूरी की और डॉक्टर बन गया।  

- अब वह बिना जादूई दवा के भी लोगों का इलाज करता था।  

- गाँव में अस्पताल खोला।  

- लोग उसे सच्चा मसीहा मानने लगे।  


उसने समझा कि असली जादू दवा में नहीं, बल्कि इंसान की नीयत और मेहनत में होता है।  


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उपसंहार

“जादूई दवा” ने अर्जुन को यह सिखाया कि ज़िंदगी में सबसे बड़ा जादू है—निस्वार्थ सेवा और सच्ची मेहनत।  

- लालच से जादू भी बेकार हो जाता है।  

- लेकिन ईमानदारी से किया गया काम हमेशा फल देता है।  


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