लाल चुनरिया

लाल चुनरिया

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“मां मुझे भी लाल वाली चुन्नी ला कर दोगी, न जैसी दीदी को ला कर दी है लाल चुनरिया? बोलो?

जवाब दो मुझे कभी नहीं ला कर देती हो

“हां हां ला दूंगी एक तेरे लिए भी अब जाओ'' मां हंस रही थी, अपनी दीदी के जितने बड़ी तो हो जा छोटी-सी बच्ची है न अभी तो चुन्नी कैसे ओढ़ेगी, कपड़े तो संभाल नहीं पाती अभी चुन्नी कैसे संभालेगी!!!

रात दिन सुरभि को बस यही ख़याल रहता कि उसकी लाल चुनर माँ कब लायेगी फिर एक दिन सचमुच उसकी दीदी और माँ उसके लिए चुन्नी ले ही अाये...सुरभि ने जैसे ही चुनर देखी खुशी के मारे कूदने लगी...सुन्दर बच्ची ने जैसे ही चुन्नी को अपने तरीके से ओढ़ा सब जोर जोर से हंसने लगे|

सुरभि को लगा यह सब उसकी मज़ाक उड़ा रहे हैं वो रूअांसी हो उठी| चुनर फेंक कर और रोने लगी फिर माँ ने उसको चुप कराया...

“मेरी अच्छी बच्ची नहीं रोते सब तुम्हारा मज़ाक नहीं बना रहे मेरी रानी बिटिया इतनी सुन्दर है न इसलिए खुश हो रहे हैं| यह क्या सुरभि तो माँ के कंधे पर सर रख सो भी गयी!

चुन्नी को ओढ़ कर ही खेलना, खाना खाना न जाने क्यों सुरभि को चुन्नी इतनी पंसद थी उसको ओढ़ कर गाने गाती और नाचती रहती...माँ देखकर मुसकुराती रहती|

समय बीता सुरभि बड़ी हुई... शादी के बाद ससुराल में ढेरों चुनरिया थी उसके पास... सबसे ज़्यादा उसेे पंसद थी...सुहाग की लाल चुन्नी...

दिन था तीज का, पूजा कर सुरभि अपनी सहेलियों के साथ लाल चुनरिया ओढ़ झूला झूल रही थी, लहराती चुनरिया झूल से लिपट गयी, जब खुली तो फट गयी... वो अपलक देखती रही|.

आँख के आँसू रुकते न बनते थे...सबने कितना समझाया मनोहार करते रहे अपनी लाडली बहु का पर सुरभि फिर भी उदास ही रही | अब माँ तो शेष न थी और न वह कोई छोटी बच्ची जो मान जाती|

“सुरभि आज हमें जाना है चलो तैयार हो लो... अच्छी तरह से कही बाहर जाना है|"

पति ने उसके उदास चेहरे को देखकर कहा...

"हम कहाँ जा रहे हैं" सुरभि ने रास्ते में पूछा कोई जवाब न था... जहाँ पहुंचे वहाँ एक बड़ा मंदिर था... अंदर अंबा की विशाल सुंदर मूरत थी|

दोनो ने माँ को भेट चढ़ायी, सुरभि खुश लग रही थी माता रानी कितनी प्यारी लग रही है वह चहकने लगी...सुरभि को देख माँ भी मुस्कुरा रही थी|

और उदासी ..वो तो जा चुकी थी| मंदिर भक्तजन भजन गा रहे थे

‘लाल... लाल चुनरी सितारों वाली...’

सुरभि वापस जाने को थी कि पुजारी ने बुलाया... एक गोटे और सितारों से सजी चुन्नी, देते हुए कहा “यह लो बिटिया... माता रानी की यह लाल चुनरिया, आज से व्रत त्योहार के अवसर में तुम इस ही ओढ़ना|”

चुनर हाथ में पकड़ सुरभि ने उसे माथे से लगा लिया मन ही मन बोल उठी तुमने लाल चुन्नी वापस दे दी माँ!

सुरभि के चेहरे चमक देख पति का चेहरा भी दमकने लगा|


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