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Manju Umare

Horror Thriller


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Manju Umare

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लाइब्रेरी का रहस्य

लाइब्रेरी का रहस्य

6 mins 561 6 mins 561

ये बात उन दिनों की है जब हम यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे थे।एक छोटे से शहर में रहने वाले हम जिसके खानदान में पहली लड़की बड़े शहर में रहकर वो भी किसी कॉलेज में नहीं यूनिवर्सिटी में पढ़ रही थी बात तो बहुत बड़ी थी।अब छोटे शहर में रहने वालों को न बड़े शहर वाले किस तरह ट्रीट करते हैं सबसे छुपा तो है नहीं।बस यही सब हम भी रोज़ झेलते। पहले दिन ही मैडम ने क्लास में आने नहीं दिया क्योंकि हम दो मिनट लेट थे। पूरा लेक्चर क्लास के बाहर अटेंड किया।जब दूसरे लेक्चर में क्लास में आए तो सब लोग ऐसे देख रहे थे जैसे हम किसी का मर्डर करके आएं हो।खैर जैसे तैसे हमने क्लासेस अटेंड की उस दिन तो ऐसा लग रहा था कि हमनें वहां एडमिशन लेकर गलती तो नहीं की?? फिर मन में एक बात याद आई कि वहां पढ़ने का निर्णय तो हमारे अकेले का था तो किसी की क्या जरूरत और वहां हमें हमारी सबसे अच्छी दोस्त भी तो मिलने वाली थी। हमारी किताबें।☺️

उस दिन ऑफिस में जाकर हमने लाइब्रेरी वगैरह की जानकारी ली और लाइब्रेरी कार्ड बनवाने के बाद अपनी लाइब्रेरी पहुंच गए। यूनिवर्सिटी की लाइब्रेरी हमारी सोच से भी बड़ी थी।हर मंजिल पर पहुंचने पर हमारी खुशी बढ़ रही थी कि कब हम अपने विषय के सेक्शन में पहुंचेंगे। लाइब्रेरी की चौथी मंजिल पर हमारे विषय की किताबें थी जैसे ही हम वहां पहुंचे दरवाजे बंद थे।लॉक नहीं थे बस टिके हुए थे और चूंकि लाइब्रेरी थी तो शांति थी चारों तरफ। हमने दरवाजा खोला चर्रररर की आवाज के साथ दरवाजा खुला और हम अंदर आए। चारों तरफ किताबें ही किताबें हम तो खुश हो गए इतनी खुशी तो एडमिशन मिलने के समय भी नहीं हुई थी सच में। जैसे कोई बिछड़ा हुआ मिल गया हो हम हर जगह जाकर किताबें देखने लगे तभी अचानक से हमसे लगभग तीन चार रैक छोड़ कर आख़री रैक से किताबें अचानक गिरने की आवाज़ आने लगी। हमने यही सोचा कि वहां हमारे अलावा तो कोई है नहीं फिर अचानक ऐसे कैसे किताबें गिरने लगी ।हम हिम्मत करके आगे बढ़े और वहां पहुंचे तो हमने देखा वहां कोई नहीं था और ना ही कोई किताब गिरी थी। हमें अगल बगल देखा तो वहां कोई नज़र नहीं आया।

तभी हमारी नजर आखरी रैक के सबसे ऊपर वाले हिस्से पर देखा तो कुछ पल देखते रह गए। वहां एक कबूतर का घोंसला था जिसमें छोटे छोटे बच्चे घोंसले के बाहर झांक रहे थे। शायद कुछ देर पहले जब वह आवाज हुई थी तब वहीं कबूतर वहां आए थे और बच्चों को दाना खिला कर उड़ गए।

हम कुछ किताबें निकलकर नीचे आ गए और अपने नाम से इशू करा कर वापस हॉस्टल लौट आए।रातभर जागकर जितना अधूरा काम था उसे पूरा किया और जो किताबें वापस करनी थी वो लेकर अपनी क्लास में आ गए।उस दिन पहली बार हमसे कुछ लोगों ने बातें की क्लास में। हमारे जैसे ही दो लोग और थे उनसे भी कोई बात नहीं करते थे।वो दोनों ने जब हमारे पास किताबें देखी तो हमसे पूछा कि हम वो किताब कहां से लाए?? हमने बताया कि कार्ड बनवाने के बाद पुस्तकें मिल जाएगी।बस उस दिन वो दोनों ने भी कार्ड बनवा लिए।

अब तो हमारी क्लास के बाद का बचा हुआ समय हम अपनी लाइब्रेरी में ही बिताया करते किताबें पढ़ने में।पर उस जगह एक अजीब सी आवाज़ होती रहती हम कभी समझ ही नहीं पाते थे कि आखिर वो आवाज़ कहां से आ रही है और किस चीज़ की है। हां एक और बात हम नोटिस करते थे कि वहां की किताबें जो पहले एक जगह होती दूसरे दिन कहीं और पहुंच जाती थी।

हम यही सोचते कि कोई हमारी तरह ही वहां पढ़ने आया होगा।

समय आगे बढ़ता गया और अब हमारी क्लास के सभी लोग हमसे बहुत घुल मिल गए थे उसका कारण जिन मैडम ने हमें पहले ही दिन क्लास में नहीं आने दिया था अब वही हमारी तारीफ करते हुए थकती नहीं थी और सबसे बड़ी बात नोट्स सिर्फ हमारे पास थे और परीक्षा के समय काम आने वाले थे। हमने सबको अपने नोट्स दिए। आखिर आदत से मजबूर थे तो मदद तो करनी ही थी खैर हम फिर भी लाइब्रेरी जाया करते थे।

एक दिन हम सभी के साथ अपनी क्लास पूरी करके वापस लौट रहे थे। बातों बातों में ही हमने हमारी एक फ्रेंड को यह बताया कि उस लाइब्रेरी में अजीब सी आवाज आती रहती है। वह चौंक गई उसने हमसे पूछा"क्या तुम वहां जाती हो ??

हमने कहा "हां !!"

तब एक दूसरी फ्रेंड ने हमें बताया कि हम वहां ना जाए वहां कुछ है जो ठीक नहीं है बहुत लोगों से सुना है कि वहां कुछ अजीब अजीब सा घटित होते रहता है कभी रैक बदल जाती हैं कभी किताबें इधर से उधर हो जाती है कभी कुछ गिरने की आवाज सुनाई देती है ,कभी किसी की बातें करने की आवाज आती है, और भी बहुत कुछ बताया गया है उस जगह के बारे में उन लोगों ने बार-बार हम से रिक्वेस्ट की कि हम वहां ना जाए अगर हमें जरूरत हो तो वह दूसरी लाइब्रेरी से हमारा कार्ड बनवा देंगे लेकिन हम उस जगह ना जाए हमें इन चीजों पर पहले विश्वास नहीं था लेकिन कुछ चीजें जो हमने उन्हें नहीं बताई थी और उन्हीं के बारे में जब उन्होंने हमें बताया तो हमें भी लगा कि उस जगह में कुछ तो अजीब है हम दूसरे दिन फिर वहां गए और हमने अपनी दो तीन किताबें अलग-अलग रैक में अलग-अलग सेक्शन में रख दी और उनके नंबर नोट करके वापस आ गए। दूसरे दिन हम फिर पहुंचे और हमने अपनी किताबें ढूंढना शुरू की। हमारे आश्चर्य का ठिकाना ना रहा। सचमुच में वह रैक बदले हुए थे और हमारी किताबें जहां हमने रखी थी वहां नहीं थी बल्कि जहां से हमने पहले उठाई थी वहां पर रखी हुई थी हम जल्दी-जल्दी नीचे आए और हमने अटेंडेंट से पूछा कि

" कोई फोर्थ फ्लोर में जो सेक्शन है वहां गया था क्या हमारा कुछ सामान वहां छूट गया था इसीलिए हम पूछ रहे हैं।"

हमने बहाना बनाया ।तब उन लोगों ने बताया कि

"वहां सीसीटीवी कैमरा लगा हुआ है दरवाजे के बाहर ।आप चेक कर लीजिए।"

हमने चेक करके देखा तो हमारे निकलने के बाद से लेकर उस समय जब हम दूसरे दिन वहां आए तब तक वहां कोई नहीं गया था। हम कुछ बोल ही नहीं पाए क्योंकि हमें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि ऐसा रहस्य भी उस रहस्यमई लाइब्रेरी में छिपा हो सकता है ।आखिर ऐसा क्या था उस रहस्यमई लाइब्रेरी में जो ऐसा कुछ घटित होता था ???हम उसके बाद कभी वहां अकेले नहीं गए ।हमेशा अपनी सहेली के साथ ही जाया करते थे। तो यह कहानी थी हमारी यूनिवर्सिटी की रहस्यमई लाइब्रेरी की।



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