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V. Aaradhyaa

Inspirational

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V. Aaradhyaa

Inspirational

लाडो के लिए समोसा जलेबी चाय

लाडो के लिए समोसा जलेबी चाय

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उसका अपने बाबूजी से बड़ा अनोखा रिश्ता था।

कभी बाबूजी दोस्त बन जाते तो कभी बड़ा भैया तो कभी माँ तो कभी बड़ी बहन की भूमिका में आ जाते।


मीता आज भी उदास सी अपने कमरे में बैठी थी।


तभी बाबूजी समोसे और जलेबियां लेकर आए और प्यार से अपनी लाडो को पुकारकर बोले,

"मीतू! देख मैं तेरे पसंद की जलेबियां और समोसे लेकर आया हूं। बस बेटी, फटाफट चाय बना ला। सब मिलकर खाते हैं! "

मीता के पिता गिरधारी जी आज अपनी बेटी की उदासी दूर करना चाहते थे। इसलिए अपनी बिटिया के चेहरे पर मुस्कान देखने की भरसक कोशिश कर रहे थे।


पर... मीता हमेशा की तरह चहकती हुई दौड़कर नहीं आई। वह धीरे-धीरे कदमों से चलकर आई और अपने पिता से समोसा और जलेबी का पैकेट लेकर रसोई में चली गई।

सबके लिए मीता की यह हरकत अप्रत्याशित थी। यही मीता शादी के पहले इतना चहकती रहती थी और समोसे और जलेबी देखकर तो नाचने ही लग जाती थी। फटाफट अदरक कूटके चाय बना लाती और सब को बुला लेती। फिर तीनों भाई बहन और माता पिता सब मिलकर चाय और समोसे जलेबी का लुत्फ उठाते।

पर...आज सब कुछ बदला-बदला सा था।


पग फेरे के बाद यह कोई चौथी बार मीता मायके आई थी। इस बार जब से वह ससुराल से आई थी बहुत उदास रहती थी , बिल्कुल बुझी बुझी सी।

"क्या बात है मीतू! तू इस बार जबसे सुसराल से आई है , उदास रहती है। तेरे ससुराल में सब ठीक है ना?

कई बार उसकी माँ कल्याणी जी ने जानने की कोशिश की।


उनके लिए बेटी के हृदय की थाह लेना बहुत मुश्किल हो रहा था।

चंचल बातूनी बिटिया ससुराल से खामोश होकर आए तो माँ को चिंता होना स्वाभाविक है।


पापा, मां, नीता, हो या भैया हो, घर में हर कोई पूछता कि,

"मीता! तुम इतनी गुमसुम क्यों हो? क्या बात है?"


लेकिन मीता सबकी बात को टाल जाती थी। चार दिन हो गए थे उसे ससुराल से आए हुए। इस बीच ना तो सास-ससुर और ननदों का कोई फोन नहीं आया था। हां... पति का फ़ोन ज़रूर एक बार आता था। पर मीता फिर भी उदास थी। चौथे दिन जब मीता बिल्कुल उदास होकर छत पर बैठी थी। तब उसकी माँ कल्याणी जी दो कप चाय लेकर वहां पहुंची और कोशिश करने लगीं कि बेटी के हृदय की थाह ले सकें।

"तू इतना उदास मत रहा कर बच्चे! बता तो सही क्या बात है? उनके इतना कहते ही मीता छोटी बच्ची की तरह उनकी गोद में सर रखकर रोने लगी।


"अरे...क्या हुआ बेटा?"

अब मीता से नहीं रहा गया उसने कहा,


"माँ, जब से मैं शादी करके उस घर गई हूं, मुझे लगता है उस घर में कोई मुझसे खुश नहीं है। ना तो मैं अच्छे से चाय बना बता पाती हूँ और ना खाना बना पाती हूँ। ऊपर से किसी को मेरे हाथ का बनाया खाना पसंद नहीं आता। मैं जब सफाई करती हूँ, किसी को पसंद नहीं आता वो रोज के कपड़े भी आयरन करते हैं। जबकि मैं संडे के संडे करती हूँ। ऐसे ही बहुत सारे काम हैं जिसमें मुझसे गलती हो जाती है। मेरी तरफ़ से ही सब गड़बड़ होता है!"


"बेटा! इसमें परेशान होने की कौन सी बात है ? शादी की शुरुआत में सभी लड़कियों को यह सब सहना पड़ता है। काम करने की आदत नहीं होने की वजह से जब अचानक काम करना पड़ता है तो गलतियां होनी स्वाभाविक है। धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा। तुम इसकी परवाह मत करो!"


कल्याणी जी ने अपनी बेटी की बात पर मुस्कुराकर कहा,

"बेटा कुछ भी गड़बड़ नहीं है। हर नए घर में सेटल होने में टाइम लगता है। कोई भी चीज एक बार में सही नहीं हो जाती। तुम थोड़ा समय तो दो। तुम्हें थोड़ी मेहनत लगेगी। थोड़ा समय दो बेटा ! थोड़ा उन लोगों को भी समझने की कोशिश करो। धीरे धीरे सब कुछ ठीक हो जाएगा!"


"वह सब तो मैं सही कर लूंगी मां! लेकिन मैं जो भी काम करती हूं उनमें मेरी ननदें मीनमेख निकालती हैं। और कभी-कभी सास मेरी प्रशंसा करने भी लग जाती हैं तो मेरी दोनों ननदें आकांक्षा और अंकिता मेरी शिकायत करने लग जाती हैं। और कभी जो थोड़ी सी भी गलती हो जाती है तो उसे बढ़ा चढ़ाकर सास के गुस्से की आग में घी डालने का काम करती हैं!"


" यह बात भी बहुत बड़ी नहीं है मेरी बच्ची। जब तुम अपना काम बहुत अच्छे से करोगी कोई तब कोइ तुम्हारी चुगली नहीं कर पाएगा। क्योंकि तुम्हारे काम में कोई कमी निकाल ही नहीं पाएगा!"


" क्या मां तुम सही कह रही हो ? क्या ऐसा सच में हो पाएगा ? क्योंकि जब सास मुझे डांटती है या भला बुरा कहती हैं तो मैं देखती हूं निशांत का भी मुंह बन जाता है । कहीं ऐसा ना हो कि बार-बार मेरी गलतियां सामने आने से निशांत का प्यार मेरे लिए कम हो जाए। मैं उसका प्यार नहीं खोना चाहती मां! मैं उस घर में अपने पति के प्यार के सहारे ही तो हूं। अगर उसका प्यार भी मुझसे खो जाएगा तो...?


अगर मेरी इतनी गलतियां देखकर वह भी मुझसे नफरत करने लगेगा । तब मैं कैसे जीऊंगी ?"

कह कर और जोर से रोने लगी मीता।

वैसे तो कल्याणी जी से अपनी बेटी का रोना नहीं देखा जा रहा था। लेकिन उसे समझाना भी जरूरी था। इसलिए बिना भावुक हुए स्वर को संयत रखते हुए मीता के सिर पर हाथ फेरते हुए समझाने लगीं।


" देखो मीता बेटा! मैं तुम्हें पहले भी बोल चुकी हूं कि अभी काम में गलतियां होना स्वाभाविक है। इस पर दुखी होना इतना जरूरी नहीं है। क्योंकि तुम अभी अनाड़ी हो। उस घर के नियम कानून भी नहीं जानती। और रसोई के गुर भी नहीं जानती। तो बेहतर है कि ...


घर के जो काम तुम्हें नहीं आते या फिर जो नियम कानून नहीं समझ में आती वह सब अपने साथ से पूछ लिया करो। क्योंकि वह घर की मुखिया हैं, और बड़ी हैं , जब कोई बड़ा होता है और उन्हें उनके बड़प्पन का एहसास कराया जाता है। उन्हें पर्याप्त सम्मान दिया जाता है। तब वह भी अपने आप के प्रति जिम्मेदार हो जाते हैं । और छोटों के साथ खराब व्यवहार नहीं करते । जब तुम्हारी सास को यह लगेगा कि तुम उनकी जगह नहीं ले रही हो बल्कि उनसे बेटी की तरह सब कुछ पूछकर काम कर रही हो, और घर उनके अनुसार अभी भी चल रहा है तब उनका डरा हुआ मन तुम्हारे प्रति प्रेम और अपनेपन से भरना शुरू हो जाएगा!"


"मैं कुछ समझी नहीं मां! तुम कहना क्या चाहती हो ? नीता ने बड़ी उलझन भरी निगाह से मां को देखकर पूछा,


"बेटा ! मैं यह कहना चाहती हूं कि अपनी सास को पर्याप्त सम्मान दो। वह बुजुर्ग हैं, तो उन्हें बड़प्पन दो।और घर के महत्वपूर्ण निर्णय अपनी सास से पूछ कर लिया करो। इससे उन्हें तुम पर गुस्सा भी नहीं आएगा और उनका विश्वास तुम पर जमेगा!"


" वह तो फिर भी ठीक है मां! वह कभी डांटती हैं तो कभी कभी प्यार भी करती हैं। पर यह जो दोनों ननदें हैं ना। यह दोनों एकदम जासूस की तरह मेरे पीछे पड़ी रहती हैं।इनका क्या करूं? "


"अभी अभी तो कहा था ना मैंने बेटा! कि.....


बड़ों को सम्मान देने के साथ छोटों को प्यार दिया जाता है। तो तुम्हें दोनों ननदों को प्यार देना होगा। अपने किसी किसी काम में इन्हीं भी शामिल किया करो। और साथ ही तुम्हें थोड़ा त्याग करना पड़ेगा। क्योंकि यह घर की बेटियां हैं और भाभी के आने से इन्हें लगता है कि इनकी जगह छीनने वाली हैं। इसलिए वह तुमसे ऐसा व्यवहार कर रही हैं। वह जब यह देखेंगी कि तुम उन दोनों को भी प्यार कर रही हो और उसके भैया को उनसे नहीं छीन रही हो। तब वह दोनों तुम्हारी चुगली नहीं किया करेंगी और तुम पर विश्वास करने लगेंगी। और उनको तुमसे कोई शिकायत का मौका नहीं मिलेगा।


दरअसल ....घर की बेटियां जब देखती हैं कि भाभी आ गई हैं और भैया बदल रहा है फिर उन्हें अपने भाई का स्वाभाविक प्रेम और लगाव खत्म होता हुआ दिखता है तो इसी से असुरक्षित होकर और दुखी होकर वह अपनी भाभी की चुगली और शिकायत करने लग जाती हैं!"


"ओह मां! तो यह बात है आकांक्षा और अंकिता के मुझसे नाराज होने की। मुझे लगता था कि मैं ही बुरी हूं। मुझे काम नहीं आता और मैं फूहड़ हूं इसलिए वह दोनों सास के गुस्से में आग का काम करती हैं!"


मीता ने मासूमियत से कहा तो उसकी मां को अपनी भोली बिटिया पर बहुत ही प्यार आया। उन्होंने मीता क्या माथा चूमते हुए आगे कहा,


"देख मेरी लाडो! तुम ऐसी गलती मत करना जैसी गलतियां लगभग हर नवविवाहिता करती हैं। जैसे कि तुम लोग कहीं भी घूमने जाओ तो तुम्हें थोड़ा त्याग करना पड़ेगा कि कभी-कभी उनको भी साथ लेकर जाओ। कभी तुम और निशांत बाजार हाट या कहीं और जाओ तो अपनी ननदो के लिए कोई ना कोई गिफ्ट लेकर जरूर आओ। हो सके तो सास-ससुर के लिए भी कोई उनके काम का कोई सामान लेकर आया करो। इससे घर में सब प्रसन्न होंगे और तुम्हें बहुत दिल खोलकर अपनाएंगे।और ननदे तुम्हारी चुगली तुम्हारी सास से करना छोड़ छोड़ देंगी और तुम्हारी बुराई भी नहीं किया करेंगी!"


दोनों छोटी ननदों को अपनी छोटी बहनों की तरह प्यार दो। फिर देखना पूरा परिवार एक सूत्र में बंध जाएगा और तुम्हें वह लोग बाहर से आए हुए नहीं समझेंगे। बल्कि अपने ही परिवार का एक अंग समझेंगे और अगर कभी सास डांटेगी भी तो सिर झुका कर सुन लिया करना। वह बड़ी हैं, तुम्हारे भले के लिए ही कहेंगी। और जब दोनों ननद को तुम प्यार करोगी तो वह दोनों भी तुम्हारे खिलाफ नहीं जाएंगी और सास के गुस्से में और तुम्हारी चुगली करके भी डाल कर नहीं भर पाएंगी! "


"वाह.…मां! यह तो तुमने मुझे बहुत ही अच्छा अच्छा टिप्स दिया है। अब तो मैं ससुराल में सब को खुश रखूंगी और चाहे मैं कैसा भी खाना बनाऊं, सबको पसंद आएगा और लोग मेरी तारीफ करेंगे!"


मीता उछलकर बच्चों की तरह ताली बजाकर बोली। तब तक उसके पापा गिरधारी जी भी आ चुके थे। और छोटी बहन और भाई नीता और नितेश भी बैठक में आकर बैठ गए थे। जब मां नीता को और भी गंभीर बात समझा रही थी।


कल्याणी जी ने अब गंभीर होकर कहा,

"ऐसा...नहीं है बेटा! जब तुम अच्छा खाना नहीं बनाओगी तो लोग न तो तुम्हारी तारीफ़ करेगें और न ही तुम्हें पसंद करेंगे। घर गिरस्ती की कुछ गूढ़ बातें तुम्हें सीखनी पड़ेगी। तभी तुम एक परफेक्ट बहू बनोगी। याद रखो कामकाजी हो या घरेलू हो, घर का काम आना ही चाहिए। और घर का काम करने में कोई शर्मिंदगी महसूस नहीं करनी चाहिए । स्त्री को गृहणी या गृहलक्ष्मी कहलाने में खुद अपने प्रति सम्मान की भावना आनी चाहिए। कोई भी मन में अपने आप को कमतर समझने की भावना नहीं होनी चाहिए। घर संभालना और रिश्तो को संभालना कोई छोटा काम नहीं है! "

आज मीता अपनी मां की बात बहुत ध्यान से सुन रही थी और समझने की भी पूरी कोशिश कर रही थी।

कल्याणी जी को भी पता था कि मीता एक दिन में सब कुछ नहीं सीख जाएगी। कोई चमत्कार नहीं हो जाएगा। बस धीरे-धीरे उसे घर गृहस्थी के कामों में पारंगत होकर ससुराल की बागडोर संभालनी होगी। और रिश्तो को निभाते निभाते खुद को साबित करना होगा तभी उसे सबकी इज्जत और प्यार मिलेगा। पहल अगर मीता करेगी तो उसके ससुराल वाले भी उसके गुणों से प्रभावित होकर उसे प्यार जरूर करने लगेंगे। इस तरह एक हंसते खेलते परिवार का निर्माण करने में घर की बहू मीता का भी अहम योगदान होगा।


अब धीरे-धीरे कल्याणी जी मीता को रोज़ थोड़ा रसोई का काम सिखाती। थोड़ा घर संभालना सिखाती। कुछ दिनों में उनकी लाडली बिटिया में काफी बदलाव आ गया था। अब उसकी सोच भी बदल रही थी।


एक दिन उसके पति निशांत का फोन आया तो मीता ने बहुत हुलसकर फोन उठाया और खिलखिलाते हुए बोली,


"आज मुझे भी आपकी बहुत याद आ रही थी। मम्मी जी और आकांक्षा, अंकिता कैसी हैं। उनकी भी याद आती है। जबसे यहां आई हूं, उन्होंने तो कोई फोन ही नहीं किया?"


अब निशांत थोड़ा शर्मिंदा होते हुए बोला,


"मम्मी और दोनों बहनें तुम्हें बहुत याद करती हैं!"


उस दिन शाम को मीता के पास उसकी सास का फ़ोन आया और दोनों ननदों ने भी उससे खुब बातें की और उसे जल्दी आने को भी कहा।


उनसे बात करके मीता एकदम खुशी से गदगद हो गई।


इसके ठीक दो दिन बाद निशांत का फ़ोन आया कि वह उसको लिवाने आ रहा है।

"अरे... बेगम! इस नाचीज़ के बारे में भी ज़रा सोचो। बेचारे का तो तुम्हारे बिना मेरा मन ही नहीं लगता। तो हम अपनी बेगम को लेने आ रहे हैं!"


निशांत की रोमांटिक बातें सुनकर वह जोर से शरमा गई।


मां की सीख सच में बहुत काम आई थी कि पति के साथ घर में पूरे परिवार को अपनाओ।वह उत्साह से ससुराल जाने की तैयारी कर रही थी।


अब उसे शादी के बाद अपनी नई जिम्मेदारी का एहसास हो रहा था।

उसे अब इस नई जिम्मेदारी में मिठास के रुप में पति का प्यार का अनुभव हो रहा था। जो उसके मायके आने पर उसे इतना याद कर रहा था और जब तब उसे फोन करता रहता था।


मीता समझ रही थी कि,


हर लड़की को शादी के बाद अब दो घरों में दो भाग में जिन्दगी जीनी पड़ती है।


मायके में अलग सी बेपरवाह सी ज़िंदगी। और फिर ससुराल में भी एक अलग ज़िंदगी जीनी पड़ती है।


जिन्दगी खुश होकर जीना हो तो उसके लिए थोड़ी तैयारी करनी जरूरी है।

ससुराल में हर नए रिश्ते को अपनाना पड़ता है। तभी वह रिश्ता अपना बनता है और घर भी अपना लगता है। बस ....

ये मंत्र याद रखने की जरूरत है।


बड़ों का मान सम्मान और छोटों को प्यार,

इससे सुखी रहता हर घर परिवार "


(समाप्त)



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