STORYMIRROR

Prashant Subhashchandra Salunke

Tragedy

3  

Prashant Subhashchandra Salunke

Tragedy

लाचार माँ बाप

लाचार माँ बाप

13 mins
322

आज की परस्थितियो के बारे में सोचता हुआ कमल बगीचे में कई बार देर तक बैठता था। पर आज का दिन वो खुद के बारे में सोचना छोड़ दूसरे के बारे में सोच रहा था! उसके सामने बैठे हुए एक बूढ़े के बारे में! देखने में वो बड़ा ही श्रीमत लग रहा था। पर वर्ताव लाचारो सा कर रहा था। वो अपने साथ कुछ अखबार लाया था। और अपने तन पर उस अखबार को लपेटकर गर्मी पाना चाहता था! कमल ने सोचा इतनी रात गए यह वृद्ध क्या इस बगीचे में सोने की सोच रहा है?

अचानक उसे याद आया की कल तो दशहरा है और उसे घर जल्द लौटना है! वो बाकड़े पर से उठकर अपने घर की तरफ लौटने लगा। उसकी सोच से वो बूढा हट ही नहीं रहा था!

वो मन में ही अपने आप को कोसने लगा। क्यों वो उस बूढ़े को कुछ पूछे बगर ही वापिस आया!! इस ठंड में उस बूढ़े को कुछ हो गया तो?तभी उसका ध्यान तेज बिजली की कड़ाके की आवाज़ से भंग हुआ। उसका घर अब पास में ही था। वो भागते अपने घर पहुँच गया।जोरो से दरवाज़ा ख़ट खटाया। अंदर से भागते हुए किसी के आने की आवाज़ आई। और धड से दरवाज़ा खोला उसकी पत्नी काजल ने "लो फिर बारिश शुरू हो गई! लगता है यह बारिश किसी की जान लेकर ही रहेगी।"

न जाने क्यों काजल के मुंह से अनायास नीकले यह शब्द कमल को बूढ़े के बारे में कहे गए हो एसा लगा!कमल घर में तोलिये से अपने बाल पोछते हुए बोला "माँ बापूजी ने खाना खा लिया?"

काजल बोली "हां उन्हें तो जल्दी खाने की आदत है। आप फटाफट तैयार हो जाओ में खाना परोस देती हूँ ।"

कमल की सोच फिर बूढ़े की तरफ गई। क्या उसने खाना खाया होगा?वो फट से काजल से बोला " तू खाना बाद में दे पहले छत्री ला।"काजल ने छ्त्री लाकर दी।

वो फटाक से बाहर निकल गया । काजल चिलाती रही "अजी इस तेज बारिश में कहा जा रहे हो?"

और विकास अपनी सोच में खोया हुआ बगीचे की और निकल पड़ा था। रास्ते भर में वो सोच रहा था। क्या वो बूढा अभी भी बगीचे में होगा? कोन होगा वो? क्यों इतना लाचार है? क्या होगी उसकी कहानी?।

***

कमल बगीचे के उस बेंच पहुँच गया था। मगर बेच पर वह बूढा अब नहीं था। अखबार के इधर उधर गिरे टुकड़े। उस बूढ़े की उपस्थिति को बयान कर रहे थे। कमल को बेहद अफ़सोस हुआ। न जाने उसे वो बूढा जाना पहचाना सा लग रहा था। अचानक उसे याद आ गया की वो बूढा तो सायरस कंपनी का मालिक शेठ और उसके मुँह से निकल गया "कांतिशेठ"

और पेड़ के पीछे से आवाज़ आई "कोन है भाई?"

आश्चर्य से उसने पेड़ के पास जा कर देखा तो कांति शेठ वही थे! बरसात से अपने आप को बचाने की ना काम कोशिश करते हुए! ठंडी से कापते हुए लाचार असहाय।

कमल ने उन्हें अपनी छत्री के नीचे ले लिया। और बोला "शेठ आप घर जाओ आप बारिश में भीग गए हो। अपने घर जाओ।"

बूढ़े ने हंस कर कहा "ना, बेटा ना में घर नहीं जाऊँगा।"

कमल ने पूछा "क्यों? चलिए में आप को घर छोड़ देता हुं।"

कांतिलाल ने चिढ कर कहा "नहीं में नहीं जाऊंगा। मेरा बेटा मुझे घर में रहेने नहीं देता।"

कमल ने यह सुन बहोत दुखी हुआ क्यों यह आज कल के लड़के अपने माँ बाप से दुश्मनों सा व्यवहाँर करते है। जिस बाप की ऊँगली पकड़ कर चलना सिखा उसी का हाथ पकड़कर उसे घर से बाहर निकाल देते है!उसका ध्यान टुटा। जब काँतीशेठ बोले "तू घर जा बेटे मुझ बूढ़े के लिए तू बारिश में मत भीग।"

कमल ने कहा "नहीं शेठ आपको शायद याद नहीं पन मैने आपकी 6 महीने रोटी खाई है। उस नमक का कर्ज चुकाना है। आप मेरे साथ चलिए।"

कान्तिशेठ ने हंस कर आसमान की तरफ देखा और बोला 24 साल जिसने मेरे घर पेट भरा उस लड़के ने मुझे भुला दिया और कहा "क्यों मजाक कर रहा है भगवान? जा बेटे जा घर जा ज्यादा बारिश में भीग मत अगर तेरे माँ बाप होंगे तो तेरी फ़िक्र कर रहे होंगे। तू उनकी फ़िक्र कर। उनकी सेवा कर में तेरे साथ नहीं आउंगा"

इतना बोल कर बूढ़े ने अपने मुँह पर अखबार रख दिया।

बारिश तेज हो रही थी। हाथ में छत्री लिए कमल भीग रहा था! उसके गाल पर टपकते पानी को वो समझ न सका की क्या समझे बरसात का पानी? या आंसू?

वो लाचारी से खड़ा सोच रहा था" क्या काँती शेठ उस गरीब के घर आएंगे? क्यों वे उसके घर आना नहीं चाहते?

*****

कमल नाराज़ सा वहाँ खड़ा रहा। कांति शेठ सो चुके थे या सोने का नाटक कर रहे थे! वो नाराज़गी से वहाँ से लौटने वाला ही था। तभी कांति शेठ बोले रुको भाई चलो में आता हुं तुम्हारे घर।कमल ने उन्हें उठने में मदद कीरास्ते भर में दोनों चुप थे कोई कुछ नही बोल रहा था, पानी की एक एक बूंद की आवाज़ साफ़ सुनाई दे रही थी! आखिर चुप्पी कांति शेठ ने तोड़ी। "बेटे तुम्हारे घर में तुम्हारे साथ कोन कोन रहेता है?कमल ने हंस कर कहा "एक बीवी है और एक बच्चा नाम छोटू वो मेरे साथ रहेता है।"

काँती शेठ ने पूछा "माँ बाप नही है?"

कमल "है न!!!"

कांति शेठ "वो तुम्हारे साथ नहीं रहेते?"

कमल "ना"

कांतिशेठ के चलते कदम गुस्से से थम गए आँखे लाल हो गई और वे सिर्फ इतना ही बोले "बेटे मुझे दया दिखाके अपने घर ले जाने का और दया दिखाने का नाटक मुझ पर नही चलेगा। तुझे क्या लगा की यह शेठ को में घर ले जाऊँगा उसकी सेवा करूँगा! मदद करूँगा बदले में वो खुश होंगे? शाबाशी देंगे क्यों? इनाम देंगे?

पैसे की लालच ने आज कितना इंसान को गिरा दिया है? गिरे हुए को उठा के घर ले जा रहे हो! और माँ बाप को साथ नही रखते जा।। बेटा जा, जो अपने माँ बाप का नहीं हुआ वो किसी और का क्या होगा? जो अपने माँ बाप को अपने साथ न रखे वो क्या किसी और को साथ रखेगा?"

कमल ने कहा "हां शेठ में अपने माँ बाप को अपने साथ नही रखता क्योकी। ."

कांति शेठ के कानो में जैसे किसीने गरम गरम तेल डाल रहा हो। एसे एक एक शब्द कान से गुजर रहे थे। वो बीच में ही बोले "हां हा बोल वो अनपढ़ है गवार है। मेरी बीवी पढ़ी लिखी है और वो बीवी के विचारो से ताल मेल नहीं रख सकते क्यों? माँ बाप को न रखने के हजारो बहाने करोगे तुम पर उन्हें समझने की एक भी कोशिश नहीं क्यों?"

कांति शेठ के होठ भीचे थे। मुठ्ठी बंद

***

कमल हंस रहा था।

वह बोला "कांति शेठ मेरी पूरी बात सुनो आप ने पूछा की तेरे साथ कोन रहेता है? मैने कहा मेरे बीवी और बच्चे, ठीक है अब माँ बापूजी को में कभी यह नहीं कहेता की वे मेरे साथ रहेते है। बल्कि हम उनके साथ रहेते है। वो मेरे मोहताज नही। हम उनके मोहताज है। मेरे लिए तो मेरे माँ बाप ही सर ताज है।"

कांति शेठ यह सुन थोड़ा नर्म हुए और बोले "वाह बेटा वाह सही में तूने लाख टके की बात की।।अब तो तेरे घर आने के लिए में खुद उतावला हुं। मुझे भी तेरे उस माता पिता के दर्शन करने है। जिसने तुझे यह संस्कार दिए है।और कितनी दूर है तेरा घर?"

कमल "बस यह रहा आ ही गया"

कांति शेठ ने देखा। एक घर की बाहर चिंतित एक औरत, एक बच्चा और चार बूढी आँखे थी! कान्तिशेठ ने मुस्कुराकर कमल की और देखा और पूछा "लगता है आ गया तेरा घर!"

काजल दोड़ते आई और बोली "अजी कहा चले गए थे आप?"

कमल "बताता हुं तुम घर चलो".घर पहुँच कर कांति शेठ का कमल ने परिचय करवाया। काजल ने उनके पैर छुवे। फिर कमल बोला" यह मेरे बापूजी है मोहनभाई और माता कमलाबेन,और बापूजी यह है कांतिशेठ "इनके पुत्र ने इन्हें घर से निकाल दिया है।"

मोहनभाई यह सुन बड़े दुखी हुए और बोले "बड़ा नीच है वो"

यह सुन कांतिशेठ बोले "ना ना घर से नही निकाला है। वो मुझे घर में रहने नहीं देता!!

और अपने माथे का पसीना पोछा, यह देख कमल बोला "छोटू जरा पंखा तो चालू कर देख शेठ को गर्मी हो रही है।"

यह सुन कांति शेठ ने गुस्से से कहा "नही नहीं पंखा नही मुझे चिड है इस शब्द से पता नही एसी के होते हुए भी लोग अपने घरो में यह पंखा क्यों लगवाते है!!!"

मोहनभाई की गरीबी मगरुरी पर आ गई वे बोले "शेठ हम गरीब है इस लिए पंखे को घरो में रखते है। और हा हमारे घरो में चार पंखे है फिर भी बिजली का बिल बचाने हम एक पंखे के नीचे ही सोते है। शायद इसीलिए आज हम सब एक छत के नीचे एक साथ रहेते है!'

कमल को लगा परीस्थिती कुछ बिगड़ रही है उसे काबू में लाने के लिए वो पिताजी को कोने में ले जाकर बोला "पिताजी कांतिशेठ के दिमाग पर सदमे का असर हुआ है। उसका आभास शुरू से ही मुझे हो चुका है। बगीचे में फाड़े गए पेपर, बात को समझे बिना गुस्सा होना, पर मुझे उन्हें कुछ भी कर उनके घर वापिस भेजना है। उसके बेटे को समजाना है। आप कृपा कर उनकी बातो पर ध्यान मत दे। जो बन्दा करोडो की प्रोपर्टी से रोड पर आ गया हो वो होश हवास तो खोयेगा ही न।।।!

पिताजी अब परीस्थिती समझ चुके थे" वे बोले तो अब तू क्या करेगा? उसके बेटे को कैसे समजाएगा? क्या तेरे कहेने से वो इस पागल को अपने घर में रखेगा?

कमल गहरी सोच में पड़ गया।

कांति शेठ पंखे को घुर रहे थे।

***

सुबह से घर में पूजा पाठ। चल रहा था। दशहरे की खुशियाँ सभी मना रहे थे। सभी काम निपटाके कमल कांति शेठ के पास आया। वे हंस कर बोले "आओ कमल जानते हो आज के दिन सत्य की असत्य पर विजय हुइ थी।

कमल बोला "और देखना शेठ आने वाला समय भी भारत वर्ष के लिए इतना ही महत्वपूर्ण होगा।"

कांति शेठ ने पूछा "वो कैसे?"

कमल "वो एसे शेठ की देश को बरसो बाद एक काबिल प्रधानमंत्री मिलेगा श्री नरेन्द्र मोदी के रूप में!!!"

कांति शेठ ने एक गहरी साँस लेते कहा "बस देश को जैसे सरदार वल्लभभाई के मामले में रंज रहा खेद रहा एसा खेद न रह जाए। किसी बेवकूफ की गलती का परिणाम देश को न भुगतना पड़े बेटे इस बात का ध्यान तुम नोजवानो की ही रखना है। खेर अब आगे क्या सोचा है?

कमल "बस अब आपके घर जाएंगे। आज के जेसा शुभदिन और कोनसा होगा?"

कांतिशेठ ने डरकर कहा"अरे नहीं! वहाँ मुझे मेरा बेटा मुझे रहेने नहीं देता। में नही जाऊँगा।"

कमल बोला "शेठ आपका लड़का इतना जालिम है की उसकी बात से ही आप इतना डर जाते है?"

कांति शेठ बोले "ना ना मेरा लड़का तो एकदम राम जेसा है, मुझे पूछे बगर वो खाना तक नहीं खाता! हमेशा पिताजी पिताजी करता रहेता है! मेरे बेटे के बारे में एसे अनाब शनाब मत बोलो। वो तो मेरी जान है। बस आजकल वो रूठा है मुझसे! इसलिए बाकी मेरा बेटा तो।"

कांतिशेठ बोल रहे थे और कमल सोच रहा था "सच में माँ बाप वो माँ बाप है! बच्चा चाहे कितना भी बुरा क्यों न हो कोई दो चार शब्द भी गलत कह दे तो बुरा मान जाएंगे! क्या कहे इसे प्यार या पक्षपात?

***

कमल ने अब कांति शेठ के घर में जाने की तैयारी कर ली थी। उसके पिताजी ने उसे कैसे समजाना है क्या करना है। सब बता दिया था। रिक्षा आ गई थी। कमल उसे पता समजा चुका था। कांति शेठ उसमे बैठ चुके थे। माँ बाप के पैर छू कमल एक पूण्य मिशन पर निकल चुका था! कांति शेठ "देख बेटा मुझे इधर ही किधर छोड़ दे, तू समझता क्यों नही में घर नहीं जाना चाहता।

कमल "क्यों क्यों नहीं जाना चाहते? क्योकि आप का बेटा आप को रहने नही देता? आप चलिए तो सही। में समझाऊं ऊंगा उसे।

कांति शेठ "वो किसी की बात नहीं सुनता। अपनी माँ की भी नहीं! वो नहीं मानेगा। बड़ा जिद्दी है। तू क्यों मेरे लिए अपना अपमान करवाने पर तुला है? लौट जा बेटा लौट जा।

कमल शांति से बैठा था उसे अपने इश्वर पर भरोशा था। कांति शेठ बेचेन थे क्योकि उन्हें अपने बच्चे पर भरोसा था!!!"

तभी रिक्षा रुक गई। रिक्षा वाला बोला "लोजी आ गया घर"

कमल ने रिक्षा से उतरकर पैसे दिए।

और घर की और देखा। देखा तो आँखे खुली की खुली रह गई। वो बड़ी हवेली थी। बहोत बड़ी!! चारो और बाग़ बीच में हवेली।

एक दीवार की और आ कर वो रुक गया। और अचरज से दीवार को देखने लगा। दीवार को बहोत से छेद थे।

कांती शेठ ने यह देखकर बोले "मेरा बेटा जब मायूस होता है। तब इस दीवार पर गोलिया चलाता है।

कमल ने आश्चर्य से पूछा "और जब गुस्सा होता है तब?

कांति शेठ ने दूसरी दीवाल पर ऊँगली दिखाई। कमल ने पलट कर देखा तो वो पसीने पसीने हो गया। सारी दुनिया उसे घुमती नजर आई। उसने सोचा यह कांतिशेठ को घर पहोचाने के चक्कर में कही में उपर पहुँच न जाऊ!!!!

***

कमल ने देखा दीवार पर कई तरह के जानवर के सर लटक रहे थे। अच्छी तरह से फ्रेम किए हुए वो चहरे उनके साथ हुए अत्याचार की जुबानी थे।

तभी कांतिशेठ बोले "चलो, डरो नहीं 6 महीने से मेरे बेटे ने बंदूक को हाथ तक नहीं लगाया है। वो वही उस अलमारी में है।

कमल को कुछ राहत मिली। वो कांतिशेठ के पीछे पीछे घर के दरवाजे तक पहुँच गया। दरवाज़ा खुला था!

कांति शेठ ने अंदर जाकर अपने बेटे को आवाज़ दी। जग्गु, जग्गू बेटे जग्गू

कोई आवाज़ नही।

कमल बोला "शेठ लगता है वो बाहर गया होगा।

कांतिशेठ ने हंस कर कहा "घर में होगा तब भी वो जवाब नहीं देगा। मैने कहा था न की वो किसी की नहीं सुनता।

तभी एक औरत कमरे से बाहर आई। और बोली। अजी आ गए आप कहा गए थे? क्यों मुझे परेशान करते है। घर से क्यों भाग जाते है?"

कांति शेठ ने कहा "तुझे पता नही में क्यों बाहर जाता हुं? क्या तुझे भी बताना पड़ेगा की मेरा बेटा मुझे घर में रहेने नहीं देता?"

तभी शेठानी की नजर कमल पर गई। "आप की तारीफ़?"

कमल "जी। में.वो.आपके बेटे जग्गु से मिलना चाहता था।"

शेठानी ने गुस्से से कहा"नाम मत लो उस हरामी का। जो दुःख उसने हमे दिया है। वो कोई दुश्मन को भी न दे।"

और वो फुट फुट कर रो पड़ी।

कमल का ध्यान अचानक एक कोने पर गया। तो उसने देखा कोई उनकी बाते सुन रहा था। अँधेरे में खड़ी उस आकृति को जब कमल ने पहचान लिया। तब उसकी आँखे खुली की खुली रह गई। वो सिर्फ इतना ही बोल सका "वो वो, जग्गू। "

***

कमल ने कहा " वो जग्गू की बीवी है न?"

शेठानी ने उस कोने में देखा और बोले "हां, बेटी वहाँ क्यों खड़ी है सामने आ"

कमल उसे सोचते हुए देख रहा था। उसके सारे प्रश्नों के उत्तर अब उसे मिलने वाले थे। जो वो चुप चाप बेहती आँखों से सुनने वाला था।

शेठानी बोली "बेटे आज से ठीक 6 महीने पहले मेरा बेटा जग मोहन (जग्गू) मायूस सा घर लोटा था। उसकी आँखे कह रही थी की वो अंदर से रो रहा था। मैने उसे बहोत पूछा पर वो कुछ न बोला। दुसरे दिन सुबह जब हम उठे तो जग्गू को छत के पंखे से लटका पाया था। उसने आत्महत्या कर ली थी!! कारण बहोत छोटा था। उसने अपने दोस्त से कुछ पैसे उधार लिए थे। और शेर बजार में लगाये थे। शेर बजार टूट गया और साथ मेरा जग्गू भी! वो बहोत घमंडी था। बाप पर जान छिड़कता था। घर पर बात बताने से घबराया और आखरी कदम उठा लिया।वो सिर्फ बोलता पैसो के ढेर लग जाते।

बेटा जग्गू तो छुट गया पर हम आज भी तील तील मर रहे है! रोज मर रहे है। यह वो घाव बर्दाश नही कर सके उन्हें आज भी लगता है। उनका बेटा जिन्दा है। पागलो सी उसे आवाज़ देते है। सर पटकते है। घर में उसकी हमने एक तस्वीर भी नही रखी! क्योकि वे उसे देख देख कर रोते। आज भी उन्हें घर में हर जगह उनका लाडला जग्गू ही दिखाई देता है। इसलिए वो घर से दूर भागते है। और कहते है "मेरा बेटा, मुझे घर में रहेने नही देता। बहोत याद आता है!"

शेठानी रो रही थी। सफेद साडी में अपनी गीली आँखे छुपाये उनकी बहू चुपचाप अपने भविष्य के बारे में सोचती खडी थी। और कांति शेठ वो दीवार के पंखे को घुर रहे थे!!!

और कमल भारी मन से यही सोच रहा था क्यों लोग खुदगर्ज होकर खुदख़ुशी कर लेते है? और पीछे पुरे परिवार को उम्रभर के लिए रोने के लिए छोड़ देते है।।।।क्यों?


Rate this content
Log in

Similar hindi story from Tragedy