कव्वी माँ
कव्वी माँ
कोयल और कव्वी की प्रकृति अलग-अलग थी। कोयल दिन भर नर कोयल की मीठी वाणी सुनती रहती और कभी इस वृक्ष पर तो कभी उस वृक्ष पर चहकती रहती, वहीं कव्वी अपने घोंसले को तैयार करती रहती थीI कव्वी ने समय आने पर चार अंडे दिये और फिर बड़े जतन से वो उन्हें सेने भी लगीI उन्हीं दिनों में कोयल ने कव्वी की अनुपस्थिति में उसी के घोंसले में आकर दो अंडे दिए और कव्वी के दो अंडे नीचे गिरा दियेI
कव्वी को पता भी न चला, वो चारों अंडों को सेती रहीI समय पर उनसे चूज़े भी निकलेI कव्वा और कव्वी उन बच्चों का भली प्रकार से पालन-पोषण भी करने लगेI कोयल दूर बैठी रहती, कभी कभी देख भी लेती, परन्तु उनके पास तक नहीं आती थीI उसने अपने बच्चों को चुगाया तक नहींI वो "अंडे सेवे कोई, बच्चे लेवे कोई" की पूर्ण अनुगामी थीI
जब बच्चे घोंसले से बाहर आना सीख गए, तो कोयल हर बार की तरह उनके पास पहुंची, कुछ देर उनके साथ बैठी और उड़ीI लेकिन इस बार बच्चे उसके पीछे नहीं उड़ेI उसने हैरानी से मुड़ कर देखा तो एक बच्चा नीचे से चिल्लाया, "आप हमें प्यार देने में एक गृहिणी की बराबरी नहीं कर सकती...."
