STORYMIRROR

chandraprabha kumar

Romance Classics

4  

chandraprabha kumar

Romance Classics

कथा विरहिणी यक्षपत्नी की मेघदूत में

कथा विरहिणी यक्षपत्नी की मेघदूत में

6 mins
451


      यक्ष पत्नी के भाव वियोग में इस लालित्य और कोमलता से वर्णित किए गए हैं कि वे करुणामय बन गए हैं। यक्ष की पत्नी कवि कालिदास की अन्य नायिकाओं -शकुंतला , पार्वती, इन्दुमती और सीता -के समान ही है। उनसे किसी प्रकार हीन नहीं है। कालिदास ने यक्ष की प्रेयसी की विरहावस्था का वर्णन कर उसकी अन्तः प्रकृति का मार्मिक चित्र उपस्थित किया है। अपनी जिस प्रियतमा के विरह में यक्ष क्षीणकाय हो संदेश भेज रहा है वह प्रिया यक्ष को कितनी प्रिय है इसके वह स्वयं बताता है-

“ तां जानीथाः परिमितकथां जीवितं मे द्वितीयम्।”

    अर्थात् उसको मेरा दूसरा प्राण ही जानना । लोक में प्रतीयमान शरीरमात्र का द्वैत ही उनको द्वित्व उपाधि से विशिष्ट करता है, वस्तुतः वे अन्दर एक ही प्राण हैं। इस प्रकार संश्लिष्ट यक्ष पत्नी से स्वप्न में भी यक्ष का विरह असंभव था। परंतु पराधीन वृत्ति में कौन हस्तक्षेप कर सकता है। चक्रवाक और चक्रवाकी किसी भी अन्य उपाय विप्रकृष्ट नहीं होते, इस पर रात्रि के आते ही उन पर भी शाप का अवतार होता है। तभी चक्रवाकी अपने सहचर से दूर होती है। यक्ष पत्नी को भी इसी प्रकार यक्ष से वियोग सहना पड़ा है-

“दूरीभूते मयि सहचरे चक्रवाकीमिवैकाम्।”

    अर्थात् स्वप्न में भी पृथक् न होने वाले सहचर से दूर हो जाने से वह चकई के समान अकेली होगी। चकई के उपमान से शाप की व्यंजना करने में कालिदास ने अत्यंत सूक्ष्म ध्वनिकौशल का परिचय दिया है। चक्रवाती नित्य इस शाप को सहने से अभ्यस्त हो गई होगी ,परंतु यक्ष पत्नी पर पहले ही पहल यह विरहव्रज टूटा है (प्रथम विरहादुग्रशोकां सखीं ते)। इसलिए वह विरहविधुरा होते ही अत्यन्त दीन दशा को प्राप्त हो गई। इस सावधिक शाप को वह एक एक दिन करके बिता रही है,( दिवस गणना तत्परां )। पर ये दिन उत्कण्ठा के कारण वामन के चरणविन्यास की तरह सुदीर्घ हो रहे हैं-

“ गाढोत्कंठा गुरुषु दिवसेष्वेषु गच्छत्सु बालां।

जाता मन्ये शिशिरमथितां पद्मिनीं वान्यरूपाम्॥”

   अलका की सुरम्य और आनंदमयी नगरी में वही नारी दुखी और अकेली होगी। वियोग के इन दीर्घ दिनों में उस वियोगिनी प्रिया की दशा उसका कमलिनी के समान होगी जो पाला पड़ जाने के कारण बिलकुल मुरझा गयी हो। वह यक्षिणी कैसी है ,इसका वर्णन यक्ष करता है- “तन्वी श्यामा……..धातु।” वह कृशांगी है, उसकी दंत पंक्ति अत्यन्त नुकीली है, उसके ओष्ठ लालबिम्बाफल के सदृश हैं, उसकी गात्रयष्टि बीच में पतली है, उसके कटाक्ष चकित हरिणी के नेत्रों की स्पर्धा करते हैं , उसकी नाभि गंभीर है ,नितम्बभार से उसकी मन्थर गति है और स्तनभार से वह आगे को झुकी रहती है-इन लक्षणों के एकत्र समवाय से ऐसा प्रतीत होता है मानो वह अलकापुरी की युवतियों में विधाता की प्रथम रचना है। उसके सौन्दर्य की इयत्ता नहीं। अलका के सब ही यक्षों की गृहिणियां उत्तम है ( उत्तमस्त्रीसहायाः) । पर उसी अलका में यक्षिणी प्रथम स्थान की अधिकारिणी है । उसके अंगों में सौकुमार्य गुण भी है। उसको कवि ने बाला की पदवी दी है। 

   वह प्रथम यौवन का अतिक्रमण कर द्वितीय यौवन में पदार्पण कर चुकी है। यक्षिणी मानिनी है और प्रणयकोप में दक्ष है। उसमें पद्मिनी के सब लक्षण विद्यमान हैं।वह थोड़ा बोलती ( परिमित कथा) और थोड़ा सोती( याममात्रं) है। ऐसी पत्नी को पाकर जो सब प्रकार भर्त्ता की अनुकूलवर्तिनी है ,यक्ष का अपने आप को सौभाग्यसंपन्न मानना नितान्त स्वाभाविक है, पर उसके वर्णन का कारण सुभगंमन्यभाव नहीं है। वस्तुतः प्रथमविरह में यक्षिणी की वैसी ही दशा हो गई होगी जैसा कि यक्ष ने अनुमान किया है। 

    विरह में यक्ष पत्नी के नेत्र रोते रोते सूज गए हैं (प्रबलरुदितोच्छूननेत्रं प्रियायाः)। ऊष्ण निःश्वासों से उसके अधरों का वर्ण फीका पड़ गया है। बिखरे केशों के कारण उसका अस्पष्ट दीख पड़ने वाला कमनीयमुखचन्द्र , मेघाच्छन्न चन्द्रमा के समान धुँधला और उदास ज्ञात होता है ।वह या तो देवताओं की पूजा में संलग्न देख पड़ती है, या कल्पना द्वारा यक्ष के विरह कृश शरीर का चित्र बनाती है, या पिंजरे में बैठी मधुरभाषिणी मैना से पूछती है कि -“हे सारिके ! क्या तुझे अपने प्रिय स्वामी की भी याद आती है। क्योंकि तुम तो उनकी प्रिय थी।”

   यक्षिणी प्रियतम के गुण कीर्तन के लिए अपने बनाए हुए रागों को गाना चाहती है ,वह प्रयत्न करने पर भी उसकी स्मृति मूर्च्छावश उसका साथ नहीं देती-

“उत्संगे वा मलिनवसने सौम्य विक्षिप्त वीणां

   मद्गोत्राकं विरचितपदं गेयमुद्गातुकामा ।

तन्त्रीमार्द्रां नयनसलिलं सारयित्वा कथंचिद्

   भूयो भूयः स्वयमपिकृतां मूर्च्छनां विस्मरन्ती॥”

    एक वर्ष के निश्चित वियोग की अवधि के कितने मास अब शेष बचे हैं, इसकी गणना के लिए यक्षिणी देहली पर चढ़ाए पूजा के फूलों को उठा उठाकर रखती है। यक्षिणी को अभिलाष और चिंता दोनों प्रकार की कामदशा ने अभिभूत कर रखा है। वह अपने चित्त में मिलन रात्रि के संभोग की अनेक प्रकार से कल्पना करके उसके आनंद का रसास्वादन करती है-

“ मत्संगं वा हृदयनिहितारम्भमास्वादयन्ती।”

   चित्रलेखन या वीणा बजाने आदि में व्यस्त यक्षिणी को दिन में वियोग उतनी पीड़ा नहीं देता ,पर रात्रि में मन- बहलाव के साधन न रहने से से वह गुरुतर शोक में डूब जाती है। चिंता से कृशकाय विरह शैय्या पर एक ही करवट पड़ी यक्ष पत्नी प्राची में कृष्ण पक्ष की क्षीण चंद्रकला की भाँति है-

“ आधिक्षामां विरहशयने संनिषण्णैकपार्श्वां,

 प्राचीमूले तनुमिव कलामात्रशेषां हिमांशोः।”

    पहिले जो रात्रि यक्ष के साथ इच्छानुसार भोगविलास में एक पल के समान बीत जाया करती थी वही रात्रि अब वियोग के कारण लम्बी प्रतीत होने से अवनिशयना यक्षिणी उष्ण अश्रुओं में बिताती है। 

  यक्षपत्नी के नेत्र चन्द्रमा की किरणों को, जो गवाक्ष मार्ग से रात्रि के समय उसके भवन में प्रवेश करती हैं ,और जिन्हें कभी वह प्रीति से देखा करती थी, देखने के लिए आगे बढ़ते हैं। चन्द्रमा शिशिरदीधीति है, विरहिणियों के संताप ज्वर को शान्ति देने से वह उद्दीपन सामग्री है। उसकी रश्मियाँ यक्षिणी को पूर्व समय का स्मरण कराती हैं, इसलिये एक बार उसके मन में वही पूर्व प्रीति जागृत होती है परंतु विषय - द्वेष के कारण उसके नेत्र फिर लौट आते हैं। बेचारी विरहिणी यक्ष पत्नी बरौनियों में निरंतर आँसू के बड़े बड़े बूंद भरे रहने के कारण मेघाच्छन्न दिवस में स्थल - कमलिनी की भांति न जागती ही है , न सोती ही-

“चक्षुः खेदात्सलिलगुरुभिः पक्ष्माभिश्छादयन्तीं

साभ्रेऽह्नीव स्थलकमलिनीं न प्रबुद्धां न सुप्ताम्॥”

       यक्षिणी के ओष्ठ आशिशिर निःश्वासों से विवर्ण हो गये हैं। उसने अंगराग लगाना और केशों का संस्कार करना छोड़ दिया है- “शुद्धस्नानात्परुषमलकम्।” प्रत्यक्ष में न सही किसी प्रकार पति का संभोग प्राप्त हो जाये इसीलिये बारम्बार वह उन नेत्रों में निद्रा चाहती है जिनमें निद्रा का स्थान आँसुओं से रुंघा हुआ है। यक्ष पत्नी त्रिवेणी की रचना करके केशकलाप में पत्रावली की योजना नहीं करती, वरन् उसने सब केशों को एक साथ बिना डोरे के ही लपेटकर वेणी बना ली है, जो अत्यंत रूखी और स्थान स्थान पर ऊँची नीची है तथा छूने में कठिन है, और कोमल गंडस्थल के पास से अयमित नखों के द्वारा यक्षपत्नी से हटायी जाती है ।

   विरह में यक्षपत्नी ने आभूषण उतार कर रख दिए हैं ( सा सन्यस्ताभरणमबला पेशलं धारयन्ती), वह अपने पेशल गात्र को भाँति भाँति के दुखों से शय्या के उत्संग पर रखे हुए किसी प्रकार धारण करती है। वह जलद को भी नवीन जलरूपी अश्रुओं के बहाने के लिये विवश कर देगी। क्योंकि मृदु हृदय वाले व्यक्तियों की चित्तवृत्ति प्राय करुणा से भरी होती है।

     मुख पर छा जाने वाले केश यक्षिणी के कोरों के प्रसार को रोकते हैं । वियोग में यक्षिणी ने मधु- पान करना छोड़ दिया है (प्रत्यादेशादपि च मधु नो विस्मृतभ्रूविलासम् )। इसीलिए यक्ष अनुमान करता है कि यक्षिणी अपना भ्रूविलास भूल गई होगी। अंजन की चिकनाई से रहित, उस मृगाक्षी का वाम नेत्र कुशल संदेश लेकर जलद के पहुँचने पर फड़क उठेगा और ऐसा प्रतीत होगा जैसे सरोवर में मछली के फड़फड़ाने से हिलता हुआ नीलकमल शोभा पाता है। 

    यक्ष मेघ को परामर्श देता है कि यदि वह यक्षिणी को सोती हुई ( लब्धनिद्रा सुखा) पावे तो याममात्र के लिये अपनी गर्जना बंद रखे। अन्यथा अकालप्रयुक्त स्तनित वचनों से यक्षिणी की निद्रा भंग होकर कथंचित् स्वप्न में मिले हुए स्वामी के कंठ के भुजलतोपगूहन का सुख क्षणमात्र में ही विलीन हो जाने का भय है। 

       इस तरह यक्ष के विरह में यक्ष पत्नी की क्या दशा होगी इसका वर्णन यक्ष मेघ से करता है , जिसे वह अपना संदेश वाहक बनाकर अलकापुरी अपना प्रिया के पास भेज रहा है। 

     


      


Rate this content
Log in

Similar hindi story from Romance