कसक
कसक
"दिल्ली" दिलवालों का शहर माना जाता है। न जाने इस प्रेमनग्री में कितने ही दिल मिलें और बिछड़े होंगे। अंश और प्रिया की अनोखी कहानी भी इस दिल्ली शहर से जुड़ी हुई है।
अंश के माता-पिता पेरिस में रहते थे और अंश अपना स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के लिए, दिल्ली, अपने चाचा के यहां रहने आया। प्रिया भी अपनी स्नातक की पढ़ाई के लिए शिमला से दिल्ली, अपने मौसी के घर रहने आई।
दोनों ही विज्ञान के छात्राएं थे और दिल्ली विश्वविद्यालय में दाखिला ली। प्रिया ने अंश को पहली बार विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित एक प्रतियगिता में देखा था। प्रिया को अंश पहली नज़र में ही पसंद आ गया। क्यों कि दोनों के विषय अलग-अलग थे, तो प्रिया अंश के बारे में अपने तरीके से जानने की कोशिश की। जितना ही प्रिया अंश के बारे में जानने लगी, अंश उसे उतना ही पसंद आने लगा। प्रिया छुप-छुपकर अंश को देखती थी पर कभी भी उसके सामने नहीं आई न ही अपने जज्बातों का राज़ खोला। अंश और प्रिया की पहली बात-चीत तब शुरू हुई जब एक प्रतियोगिता में दोनों को एंकरिंग के लिए चुना गया। एंकरिंग अभ्यास के दौरान दोनों में अच्छी दोस्ती हो गई।
अंश तीन-चार दिनों से विश्वविद्यालय में नज़र नहीं आया तो प्रिया को उसकी चिंता होने लगी, तो उसने अंश को दो-तीन बार फ़ोन किया पर अंश ने फ़ोन नहीं उठाया न ही कोई मेसेज का उत्तर दिया। फिर अगले दिन अंश आया तो प्रिया ने देखा कि उसके हाथों में बैंडेज था तो प्रिया की आंखें भर आई। प्रिया अपने जज्बातों को बहुत ही मुश्किल से अंश से छिपा रही थी ताकि अंश को न पता चले कि प्रिया उससे बेहद प्यार करती थी और उससे उसका एक छोटा सा खरोंच का दर्द भी बर्दाश्त नहीं होता था।
दोनों में दोस्ती काफ़ी गहरी होने लगी तो प्रिया ने एक दिन हिम्मत जुटाकर अंश को अपने दिल की बात बोलने गई। अचानक अंश को एक लड़की के साथ कैंटीन में हाथ पकड़कर बैठा देख मानो प्रिया के सारे सपने टूट गए। उसने अंश को बिना कुछ बोले चुप-चाप वहां से रोती हुई अपने घर चली गई। घर आकर प्रिया सारी रात रोती रही यह सोचकर कि "क्या अंश को इतने दिनों में मेरी आंखों में उसके लिए जो बेशुमार प्यार है, वो कभी दिखा ही नहीं?" "क्या उसने कभी मेरे प्यार को महसूस किया ही नहीं?" "या फ़िर वो सब जानता था, फ़िर भी उसने मेरा दिल तोड़ा?" प्रिया को सबसे ज़्यादा दुःख इस बात का हुआ कि अंश ने प्रिया के बार-बार पूछने पर भी यह झूठ बोला कि, "वो किसी रिलेशनशिप में है ही नहीं।" धीरे-धीरे प्रिया अंश से बात करना कम कर दी।
प्रिया का अंश के प्रति प्यार बहुत ही गहरा और सच्चा था इसलिए उसने अपने दिल को यह बोलकर मनाने की कोशिश की, "क्या सिर्फ़ पाना ही प्यार है? क्या इंतज़ार प्यार नहीं?" "क्या उसकी खुशी में खुश होना प्यार नहीं?" क्योंकि प्रिया के लिए अंश का प्यारा सा मुस्कान सबसे अनमोल था। प्रिया का मानना था, "अगर मैं अंश से प्यार करने के बदले कुछ मांगू तो वो तो सच्चा 'प्यार' नहीं, 'सौदा' हो जाएगा।" वो रात-रात अंश के लिए रोती रही पर कभी भी अंश को खबर तक नहीं होने दी।
प्रिया उस दिन अपने जज्बातों और आसुओं को नहीं रोक पाई, जिस दिन अंश पढ़ाई खत्म करके हमेशा के लिए अपने माता-पिता के पास पेरिस जा रहा था। प्रिया आंखों में आसूं लिए अंश के दोनों हाथों को पकड़कर बोली, "शायद तुमसे ज़िंदगी में फ़िर कभी न मिल पाए।" प्रिया अंश को यह बोलते हुए गले से लगाकर बहुत रोई और रोते-रोते बोली "मैं हमेशा तुम्हारा इंतज़ार करूंगी। अगर ज़िंदगी के किसी भी मोड़ पर तुम्हें मेरे प्यार का एहसास हो और तुम्हें मेरी ज़रूरत हो तो मुझे याद करना, मैं तुम्हारे फ़ोन का हमेशा इंतज़ार करूंगी।"
साल बीतते गए और दोनों को बहुत अच्छी नौकरियां मिल गई।
प्रिया के लिए इंतज़ार की घड़ी, दिन से महीने, महीने से साल तक लंबी होती गई पर अंश का ना ही कोई फ़ोन और ना ही कोई मेसेज आया।
प्रिया इंतज़ार करती रही और अंश के तस्वीरें से अपना कमरा सजाती रही। प्रिया अंश के तस्वीरों और बीते लम्हों के सहारे अपनी पूरी जिंदगी बीता देना का फ़ैसला किया क्योंकि प्रिया को पता था कि वो अपने हिस्से का प्यार अंश से कर चुकी थी और दुबारा वो कभी किसी से ऐसा प्यार नहीं कर पाएगी।
ऐसा कर प्रिया हम सबके के लिए प्यार का अनमोल सीख दे गई कि, "सच्चा प्यार आपसे कुछ नहीं मांगता सिर्फ़ प्यार करने वाले इंसान की ख़ुशी मांगता है।"
और ऐसे ही सबके दिलों के पन्नों में एक और कसक भरी प्रेम कहानी छप गई।

