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करुणा की मूर्ति

करुणा की मूर्ति

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एक छोटे से गांव आ कड़ियां में किसान के परिवार में एक सात साल की लड़की अंध बन गई, उनकी माता उ ज़ाम और पिताजी बावन जी भाई की आँखों से अश्रु धारा बहने लगी, दुख के समंदर में डुबकी लगाई और उस अंध लड़की की पागलपन की तरह इलाज के लिए दौड़ ने लगे लेकिन उन्हें असफलता ही प्राप्त होता था, बहुत सारे डॉक्टर, मन्नत और भगवान को प्राथना की, वो लड़की देख नहीं सकती थी लेकिन सुन तो सकती थी, यह सब सुनकर वो भी बहुत दुखी हो जाती थी, उस ने मन ही मन निश्चय किया कि प्रज्ञा को खुद ही अंदर से प्रकट कर के अंधकार का सामना करना होगा, निराशा से निकलकर पढ़ाई कर के सिद्धि प्राप्त करने का निर्णय किया।

उस ने अपनी बात जब परिवार में बताई की मुजे पढ़ाई करनी है, अंध पाठ शाला में पढ़ाई कर ने के लिए जाना हे, तब उसकी माता का जी जल उठा, यह अंध लड़की को केसे भेज सकते हैं? रिस्तेदार बाबु भाई तथा भानजे भाई ने लड़की के मात पिता को समझाया और अंध पाठ शाला में पढ़ाई शुरू हुई, एक ही महीने में ब्रेल लिपि शिख लिया, सुर की साधना भी हासिल की, उसकी शिक्षिका पुष्पा बहन ने तो यह अंध' श्रुति को कहा कि तुमने तो मदर टेरेसा का रूप धारण कर लिया है, श्रुति ने अब उसके जेसी बहुत सारी प्रज्ञा चक्षु लड़कियों को समाल ने का काम शुरू कर दिया।

मीरा के गीत उन्हें बहुत ही पसंद थे, दर्द भरे गीतों सुनकर अपना मन हल्का कर लेती थी, निबंध प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त कर के विजय प्राप्त किया, किसी भी अंध लड़की तैरना नहीं जानती है किन्तु मुक्ता ने तैरना शिख लिया, अंध लड़के के साथ तरण प्रति योगिता मे प्रथम स्थान हासिल किया खादी बुनने लगी, अंतिम परिक्षा मे पाठ शाला में फर्स्ट क्लास प्राप्त किया, तब उसके मात पिता और भाई बहन बहुत ही खुश हो गए, उसके बाद उसे कनु भाई वडोदरा की अंध कन्या शाला में दाखिला दिला कर उसे वहा रखा गया, ब्रेल लिपि के साथ टाइप करना भी शिख लिया, अंध लोग सुई मे धागा केसे पिरोते है वो भी शिख लिया, पढ़ाई के दौरान प्रतियोगिता में भाग लेकर प्रथम स्थान हासिल करने लगी, काव्य प्रतियोगिता में भाग लिया और प्रथम स्थान प्राप्त किया, वो कविता उसे आज भी याद है,वो काव्य रचना अंधकार को दूर भगाने की शक्ति प्रदान करती है, बी ए तक पढ़ाई की, बहरे गूंगे और कम बुद्धि के बच्चों को समाल ने की तालीम प्राप्त कर लिया, वेकेशन मे मुंबई में अलग अलग कोर्स, पर्सनालिटी डेवलपमेंट, लीडर शीप, ट्रेनिंग, टेलीफोन ऑपरेटिंग सिस्टम भी शिख लिया, बेंगलुरु जाकर स्पोर्ट्स का कोर्स करने का अवसर मिला, बी ए तक पढ़ाई पूर्ण करके महात्मा लुइस ब्रेल की किताबों का अभ्यास किया। 

अब जीवन में नया मोड़ आया, सोनेरी स्वप्ना साकार करने के लिए सेवा का वेश धारण कर लिया, अपने जेसी अनेक प्रज्ञा चक्षु लड़कियों की जिंदगी संवर ने का द्रढ़ निश्चय किया, उसे पता था कि यह मामूली बात नहीं है, मार्ग मे कांटे आयेंगे तो उसे सह कर हँसमुख चेहरे के साथ आगे बढ़ कर उस प्रज्ञा चक्षु लड़कियों के जीवन में रोशनी डालने का काम शुरू किया, मैंने प्राप्त की हुई शक्ति को उनके लिए न्यौछावर कर देने का फैसला किया, उन्हें तालीम दूंगी, उन्हें अपने पेर पर खड़ा होने शिखा ना शुरू किया, अंध ज़न प्रगति मंडल से जुड़ी, संस्था आर्थिक रूप से कमजोर होने से वेतन की बात नहीं थी, लड़कियों को गृह विज्ञान की तालीम देना शुरू किया, अब श्रुति की उम्र इक्कीस साल हो गई, इस लिए उसे शादी देना होगा, लेकिन श्रुति ने बता दिया था कि उसके सेवा कार्य में कोई अवरोध नहीं आना चाहिए, बहुत समझाने के बाद मे प्रज्ञा चक्षु सुनील से मिलने के लिए राजी हुई, सुनील अमीर घराना का जैन परिवार का एक अच्छा सेवक था, वो शिक्षक था, एम ए बी एड तक पढ़ाई की थी, परिवार का अच्छा सा व्यापार छोड़कर उसने शिक्षक की नोकरी स्वीकर किया, श्रुति सुन्दर थी, वो दौनों की मुलाकात करायी गयी, श्रुति ने बताया कि मे शादी के लिए राजी हू लेकिन हम बच्चे को जन्म नहीं देंगे, उसे था कि ये सुनकर सुनील तैयार नहीं होगा, लेकिन सुनील ने उसे स्वीकार कर लिया, सुनील ने कहा कि हमे अपना वंश नहीं बढ़ाना है किन्तु प्रज्ञा चक्षु ओके जीवन को आबाद करना है, एक या दो नहीं लेकिन अनेक प्रज्ञा चक्षु ओके माता पिता बनने का सौभाग्य प्राप्त करना है, सुनील ने अपने परिवार को बात की तो उसका विरोध किया गया, लेकिन अंत में सम्मति दी गई, सुनील श्रुति से शादी करने के लिए राजी हो गया, शादी के समय बारात गांव में आई तब श्रुति के मात पिता बहुत ही खुश हो गए, शादी के समय सुनील की तनखा 900 रुपये थी, सुनील और श्रुति ने दान यात्रा के साथ सेवा यज्ञ शुरू कर दिया।

श्रुति ने प्रण लिया कि जब तक संस्था आर्थिक विकास प्राप्त नहीं करेगी तब तक पेर मे जुते नहीं पहनेंगी, जब पेर मे पत्थर लगे या कांटे लगे तब सुनील को चिल्ला कर बुलाती, लेकिन हिम्मत नहीं हारी और दान से जोली भार गई, माँ जेसी सास विजया और नंदी का भरपूर प्यार मिला, यकायक सुनील को साइटिका का दर्द हुआ उसे हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया, दो साल दवा ली, फिर भी सुनील को दर्द होता था, वो सह लेता था, प्रज्ञा चक्षु को तालीम देना का काम चालू रखा, उन्होंने तालीम के बाद शादी देना शुरू किया, करीब 32 प्रज्ञा चक्षु लड़कियों को शादी दी, उन्हों ने अपनी संस्था का सुंदर मकान भी बना लिया, सुनील नोकरी करता था और लड़कियों को तालीम भी देता था, श्रुति लड़कियों के लिए रोटी बनाती थी, उन्हें पता चले तो कहीं से भी प्रज्ञा चक्षु लड़कियों को अपनी संस्था मे ले आते थे, सुनील को एक साथ 230 लड़कियों के पिता बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। 

लड़कियों की शादी के लिए दूल्हा ढूढ़ना बहुत ही मुस्किल काम था, दान के प्रवाह के कारण लड़कियों की शादी कराने के लिए कोई मुस्किल नहीं था, अपनी संस्कृति लोगों तक पहुंचाने के लिए संस्था की ओर से पत्रिका शुरू की गई, संस्था की महक देश विदेश तक पहुच गई, श्रुति को राष्ट्र पति की ओर से स्त्री शक्ति अवॉर्ड के साथ एक लाख रुपये की धन राशि प्रदान की गई, वो राशि में ग्यारह हजार जोड़कर संस्था को दान कर दिया, सुनील और मुजे हम दौनों को एक साथ अवॉर्ड से सम्मानित किया गया, यहा सभी जाति की लड़कियों को प्रवेश दिया और उन्हें तालीम और शिक्षा देकर शादी करने के बाद संस्था से बाहर जाने की अनुमति दी जाती थी। 

प्रज्ञा चक्षु बहनों की क्रिकेट टीम भी बनाई जाती हैं, उन्हें ट्रेकिंग मे भी भेजा जाता था, माँ को लड़की प्यारी होती है ऎसे उन्हें भी ये प्रज्ञा चक्षु लड़की या बहुत ही प्यारी लगती, संस्था को दौनों ने नंदन वन बना दिया, ऊनी यही सेवा को देखकर उन्हें राष्ट्र पति पुरस्कार मिला, श्रुति कहती हैं कि, 

"खोल दो पंख मेरे कहता है परिंदा. 

अभी और उड़ान बाकी है, 

ज़मी नहीं है मंज़िल मेरी 

अभी पूरा आसमान बाकी है" 

अंध होने के बावजूद जो इंसान दो आंखे होने पर भी न कर सके ऎसा उम्दा कार्य कर के अपना पूरा जीवन समर्पित कर देती है और साथ साथ अपने पति को भी प्रतिज्ञा मे बंध देती है, उस करुणा मूर्ति को वंदन।


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