कर्त्तव्य-परायणता
कर्त्तव्य-परायणता
राघवन की सनक से पूरा शहर वाकिफ था।पहले वे सनकी या पागल कहलाते थे, लेकिन धीरे-धीरे लोगों ने उनकी सनक का सम्मान करना शुरू कर दिया।आखिर उनकी सनक का राज क्या था और क्या थी उनकी सनक ,जिसके लिए उन्हें कई सम्मान भी मिल चुके थे।
राघवन की उम्र उस समय कोई अटठावन साल की रही होगी,जब उनके जीवन में वह काला दिन आया।उनका तीन प्राणियों का छोटा-सा परिवार था।वे,उनकी पत्नी और पुत्र। सब कुछ बढ़िया चल रहा था।वे स्वयं दो साल में रिटायर होने वाले थे ।पुत्र साफ्टवेयर इंजीनियर बन कर मल्टीनेशनल कंपनी में कार्यरत था।अब उसके विवाह की तैयारियां चल रही थीं। परिवार में जमकर खुशियां बरस रहीं थीं।कहते हैं ना- कि खुशियों को नजर लग जाती है, यहां भी वही हुआ।बारिश के चलते शहर की सड़कों पर गड्ढे हो गए थे और दुर्घटनाएं बढ़ गई थीं।
उस दिन जमकर बारिश हुई थी ,राघवन का पुत्र चैतन्य आफिस में फंसा हुआ था ।बारिश बंद होने पर उसने मोटरसाइकिल निकाली और घर की ओर चल पड़ा,पानी के जमाव के कारण गड्ढा नहीं दिखा और वह दुर्घटना ग्रस्त हो गया।महीना भर कोमा में रहने के बाद उसने सदा के लिए दुनिया को अलविदा कह दिया।
राघवन और उनकी पत्नी पत्थर बन गए थे।इकलौते पुत्र को खोने का सदमा क्या होता है ,यह उन्हें देखकर ही समझा जा सकता था।उनकी पत्नी अपना होशोहवास खो चुकी थीं।राघवन को पत्नी को सम्हालने के लिए अपने सीने पर पत्थर रखना पड़ा। लेकिन उनका मन अवसाद से घिर गया था।
सड़क का हर गड्ढा उन्हें अपने पुत्र का हत्यारा प्रतीत होता।ऐसे में उन्होंने एक प्रण लिया कि वे सड़क के हर गड्ढे को अपने खर्चे से स्वयं ही भरेंगे।अब जहां भी कहीं गड्ढा दिखता ,राघवन वहां अपनी गाड़ी लेकर पहुंच जाते और सामान निकालकर गड्ढा भरने लगते। लोग उन्हें सनकी कहते ,मजाक बनाते , यहां तक कि पागल भी कह देते। धीरे-धीरे लोगों को उनकी सनक का उद्देश्य पता चला तो सभी उनका सम्मान करने लगे।
उनका साथ देने के लिए कई लोग भी आगे आने लगे।न जाने कितनी जिंदगियां उजड़ने से बच गईं।अब उनकी यह सनक उनका कर्तव्य बन चुकी था।सड़क के गड्ढों को
भरने का यह काम उनका आज भी जारी है।यह उनकी अपने पुत्र को सच्ची श्रद्धांजलि है।
