Dr Jogender Singh(jogi)

Inspirational


4.5  

Dr Jogender Singh(jogi)

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खूब पढ़ना बेटा

खूब पढ़ना बेटा

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मैं मानो हवा में उड़ रहा हूँ , डिसेक्शन हॉल के बाहर गैलरी में तेज़ी से चला जा रहा हूँ । सामने अर्पिता आ रही है ,“कैसा हुआ वाइवा ? उसने रस्मी अन्दाज़ में पूछा ।

“ ठीक हुआ , मैंने भी जवाब देने की रस्म अदा की । वो अशिमा के साथ है , दोनो मेरा उत्तर सुन कर धीरे से मुस्कुरा दी । मैं तेज़ी से आगे बढ़ गया ।मुझे अपने दिल की धड़कन साफ़ सुनाई दे रही थी , धाड़ धाड़ मानो कोई सुपरफ़ास्ट ट्रेन सीने में धड़धड़ाती हुई जा रही हो । कॉलेज के मेन गेट तक आते आते धड़कन सामान्य हो पायी । दरअसल आज अनाटमी का वाइवा था , मेरा पहला ।

 मेरा दाख़िला मेडिकल कॉलेज में देर से हुआ था , आल इण्डिया परीक्षा के माध्यम से । उस वर्ष अदालत के निर्णय के बाद आल इण्डिया कोटे के दाख़िले हो पाये थे । मेरा और चार और

सहपाठियों का दाख़िला बाक़ी सभी साथियों के तीन महीने बाद हुआ था । हिंदी माध्यम से पढ़ कर आने की वजह से अंग्रेज़ी में मेडिकल की किताबें पढ़ना एक दुरूह कार्य था । उस पर अनाटमी के अध्यापक मिस्टर बनर्जी का ग़ुस्सा , भरी क्लास में मारने लगते । लगभग छः फ़िट क़द , लम्बे लहराते बालों वाले बनर्जी सर दिखते तो एकदम हीरो थे , आवाज़ भी बुलंद थी , पढ़ाते भी बहुत अच्छा थे , परंतु सही उत्तर न देने पर उनके अंदर किसी खलनायक की आत्मा प्रवेश कर जाती । फिर तो भगवान ही मालिक , जो हाथ में आता उसी से मार देते । मारने के बाद दुःखी भी होते , पर फिर क्या फ़ायदा ?

हम पाँचों देर से दाख़िले वालों को सिर्फ़ अस्थियों के बारे में पढ़ने को बोला गया था । परंतु मैं मांसपेशियों के बारे में भी पढ़ कर गया था । बनर्जी सर ने जो कुछ भी अस्थियों के बारे में पूछा मैंने सब बता दिया ।वो ख़ुश नज़र आए , मैंने हिम्मत करके डरते हुए बोल दिया “ मांसपेशियों के बारे में भी स्टडी की है सर ” ।” अच्छा ! ठीक है तो पूछ लेते हैं ।वो मुस्कुराते भी हैं , मुझे तभी पता चला ।उन्होंने आसान से चार सवाल पूछे , जिनका उत्तर मैंने आसानी से दे दिया ।” शाबाश , कितने भाई / बहन हो ? 

“ सर चार ”

तुम सबसे बड़े हो ? 

"नहीं सर , बड़ी बहन है , उसके बाद मैं ।"

"पिताजी क्या करते हैं ? "

"सर आर्मी में थे , अब खेती करते हैं ।"

"ठीक , खूब पढ़ना बेटा , ऐसे ही ।शाबाश । "

उनके मुँह से निकला एक वाक्य “ खूब पढ़ना बेटा ” मानो मेरी ज़िंदगी का सूत्र बन गया । पूरे एम॰ बी॰ बी॰ एस॰ के दौरान में मेहनत से पढ़ाई करता रहा । फिर एम॰ डी॰ में भी मन लगा कर पढ़ाई की । आज भी जब लैपटॉप लेकर पढ़ने बैठता हूँ बनर्जी सर की आवाज़ कानों में गूँज जाती है “ खूब पढ़ना बेटा ” । उस दस नंबर की परीक्षा ने मेरी जिंदगी बदल दी ! 



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