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Sheela Tiwari

Abstract Tragedy


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Sheela Tiwari

Abstract Tragedy


कहानी-फूल से कैक्टस

कहानी-फूल से कैक्टस

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अगे भाग फुलिया दी आवे छै(अरे भागो फूला दीदी आ रही है)

ऐसा कह हम सब भाग खड़े होते थे बचपन में। मन में एक डर बसा था फूला दीदी का। फूला दीदी जब चलती तो उनकी चप्पल चटाक-चटाक आवाज शांति को भंग करती थी। गोरा वर्ण व तेवर सख़्त सफेद साड़ी पहने भारी भरकम शरीर चेहरे पर दीप्ति आभा थी। पर उनको देखते हम सब उन्हें भाग खड़े होते।

कहानी यों शुरू होती है कि फूला दीदी एक जमींदार परिवार की लाडली बिटिया थी। बड़े शौक से दस साल में ब्याह दी गयी। चाँद सी बेटी जेवरों व कपड़ो से लाद दी गई। पिता जी ने अनेकों प्रकार के लज़ीज़ पकवान बनवाए। शाही भोज की चर्चा खूब हर तरफ गूंजी। पर तक़दीर कुछ और खेल खेल रही थी। उनके नसीब के सितारे काले बादलों में सदा के लिए छिप गए। उनके पति जो खुद मात्र 15 साल के थे, बीमारी से स्वर्ग सिधार गए। विधि का कितना क्रूर मज़ाक था। एक रेगिस्तान जहाँ सिर्फ धूप थी,मृगमरीचिका खुशी बन गयी । उसके पीछे दौड़ने पर भी मिलने वाली नहीं थी।

फूला दीदी बाल्यकाल में ही बाल विधवा हो गई। जिसने अभी पति को जी भर देखा ही नहीं, खुद अभी बच्ची थी उसकी माँग सूनी हो गई। कितनी अजीब कहानी थी उनकी। जिसने अभी बचपन भी ठीक से न जाना, विवाह क्या है, ससुराल कैसा होता है नहीं जाना और विधवा हो गई। सादे वस्त्र में डाल दिया गया उनका शरीर।

जमींदार परिवार से थी, माँ-बाप ने अपने पास ही रख लिया। अब शुरू हो गया उनके साथ बुरा व्यवहार। हर शुभ चीज में उन्हें दूर रखा जाता। बचपना में कुछ गलती होती तो सबके ताने सुनने पड़ते। जवानी में कदम वैधव्यता को ओढ़ते शुरू किया। सब लड़कियाँ रंग-विरंगा वस्त्र पहनती, फूला दीदी का भी मन मचलता पर उनके लिए हर रंग सफेद हो चुका था। जीवन के इस नीलेपन से जवानी की शोखि़यत को समझना मुश्किल था। अल्हड़ सी दौड़ती घूमती और अपनी माँ से बड़ी मासूमियत से पूछती ..बताओ मैं क्यों नहीं सज सकती। मुझे नहीं पहननी सादे कपड़े । मुझे भी सजना है अपनी बहनों की तरह। माँ के कलेजे पर पत्थर आ बैठता। धीरे-धीरे परिस्थितियों से समझौता करना पड़ा। छुप कर आईने में सर पर दुपट्टा रख दुल्हन बनती, बिंदी लगाती एक सुनहरे ख्वाब में अपने प्रियतम को याद कर गाने गुनगुनाती। ख़्वाबों की दुनिया में फूलों सा कोमल सपना पलक बंद कर देखती। कोई आता तो ध्यान टूटता झट सब कुछ छुपा दरवाजा खोलती । शोक में माता-पिता के गुजर गये और अब आने वाला कल और भयंकर था। हर बात पर रोक-टोक ने फूला दीदी को झगड़ालू बना दिया। हर बात पर झगड़े करती सबसे। कभी दूध दुहने वाले से लड़ आती कि तुम दूध चुरा कर ले गया, कभी नौकर-चाकर से। अपनी भाभी को तो कुछ समझती ही नहीं थी और भाभी भी इनको बुरा बनाने में लगी रहती मानो फूला दीदी उनके सर पर चढ़ कर बैठी हो। ननद-भौजाई एक दूसरे से मुँह फेरे रहती।

अब सब धीरे-धीरे फुसफुसाते कि फुलिया डायन छै (फूला दी डायन है)। किसी का तबियत खराब होता इल्ज़ाम फूला दीदी पर आता। धीरे-धीरे लोगों की नज़र में पक्का डायन बन गयीं। कोई बोलता ..आज राती देखलिए डायन सिखै छेले। बस यही सब मैं बचपन में सुनती तो हम सब के कोमल मन में भय का साया पीछा करता फूला दीदी को देख कर । उनके चप्पल की चटाक-चटाक आवाज सुन भाग जाती एक अज्ञात भय से। गाँव-घर सब लोग औझा गुनी करते फूला दीदी के मंतर को कम करने।

कितनी स्वार्थी दुनिया है,कमजोर औरत को बदनाम करते। बाल विधवा जिसमें उसका कोई क़सूर नहीं था सबकी ताने सुन-सुन कर विद्रोही हो गई थी। तरह तरह की कहानियाँ रचते सब फूला दीदी के विरुद्ध। ज्यादा बीमार किसी का बच्चा हो जाता तो उसे मारने दौड़ते कि मेरा बच्चा जल्दी ठीक कर नहीं तो काट दूँगा। बेचारी डर से सांकल कमरे का लगा तब गाली देती। कितनी विकट परिस्थिति में जी रही थी। हिक़ारत भरे सबकी नज़रों का सामना करते-करते अपने माँ-बाप पर कोसती, गाली देती अपने भाई को जिसने अपने जमींदारी अंदाज में उसे ससुराल नहीं जाने दिया। क्या होता बात सुनती पर अपने ससुराल में रहती। लाड़ प्यार में जो पली थी पर आज वो गाँव की खतरनाक डायन बन गयी थी।

धीरे-धीरे भाई भी गुजर गया। अब फूला दीदी बारूद की ढेर बन गई थी। बिना कारण भी सबको बैठे-बैठे गालियाँ दागते रहती। हर कोई उनसे त्रस्त था। एक भोली सी बच्ची को समाज ने जलते अंगार बना कर छोड़ा।

समय बदलने लगा,सब शहर की रुख करने लगे। बच्चे पढ़ाने हेतु जाना जरूरी था। अचानक घर खाली हो गया। अकेली बच गयी फूला दीदी। अब चुप रहने लगी पर चलती तो अभी भी चप्पल बजते चटाक-चटाक। अकेलेपन में कुछ नौकर चाकरों के साथ जीवन कट रहा था। दूध की छाली के लिए कभी-कभी झगड़ा कर ही लेती। अचानक एक दिन गिर पड़ी पैरो में काफी चोट आये। चोट लगने से अब बेसहारा पड़ी रहती। कोई अपना नहीं था। उन्हें टेटनस हो गया और कष्टपूर्ण मौत हुई। रोने वाला कोई न था। फूला दीदी के शव को जब जलाया जा रहा था तो उनकी चिता तुरंत जल गई। लोग व्यंग से कहते, छाली मलाई खाया शरीर था जो तुरंत जल गई। मेरा तो ये कहना है कि फूला दीदी में कुछ सांसारिक प्रेम नहीं था अग्नि ने उन्हें तुरंत अपने में समा लिया। और खत्म हो गई फूल से कैक्टस बनने की कहानी जो समाज ने उनको दिया था।


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